शनिवार, 30 मई 2026

हँसोत लीं...

 

 हँसोत लीं...

 

हँसोत  लीं,  हँसोत  लीं

भर  जिनगी  हँसोत  लीं

 

करल-धरल,   होई  का

लरल-भिरल,  होई  का

थरिया बा भरल  रखल

भकोस लीं, भकोस लीं

 

रउआ   के    सोहें   जें

रउआ   के    मोहें   जें 

उनका   ना,  बाकी  के

बकोट लीं, बकोट  लीं

 

सब  जे  बा   रउए   के

होखी    जे    रउए   के

अँधार  सब  जहान  के

रउआ  सब  इजोत  लीं

 

आपन  लाभ- लोभ  से

डिगीं  तनिक न छोभ से

 मन  के सुनीं औरि न

मन  में  तनि कचोट लीं

 

बाँटल  बा   बात   बुरा

सवारथ    तेज   छुरा

छुरवे    के    तेजी    से

खसोट लीं,  खसोट लीं

 

हाँ, सीधा  जन  के मुँह

चाटेला     कुत्तवो    नु

सीधापन   के   जल  में

खुद के खुद न  बोथ लीं


1 टिप्पणी:

  1. भोजपुरी में भी आपकी गति चकित करने वाली है। क्या ही मारक व्यंग्य है इस कविता में !
    मुझे तो इस कविता में वह धुन सुनाई पड़ी जो नुक्कड़ नाटकों के गीतों के लिए बनाई जाती है।

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