ध्यातव्य : १
मन खुश हो तो बाकी ( नापसंद) बातें इग्नोर कर दी जाती हैं।
बाकी ( नापसंद) बातों को इग्नोर कीजिए। मन खुश हो जाएगा, एक न एक दिन जरूर।
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जिंदगी लक्षणा या व्यंजना में पूछती है और चाहती है कि हम उत्तर अभिधा में दें।
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कई बार एकदम साफ दिख रही, सबको समझ आ रही बातों का भी कहा जाना जरूरी होता है।
कुछ बातों का मर्म उनके कहे जाने में छिपा होता है ।
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कर्मों का हिसाब भी जरूरी नहीं कि जहाँ किया गया हो, वहीं हो जाए। वह किसी भी स्थान पर किसी भी रूप में मिल जा सकता है। कोर बैंकिग में जमा किए गए पैसों की तरह । कहीं जमा कीजिए, कहीं निकाल लीजिए ।
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कर्मों का हिसाब अकाउंट पेयी चेक से ही होता है, कर्ता के नाम के।
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किसी से
अपेक्षा रखिए मत
किसी की
उपेक्षा करिए मत
सुखी रहेंगे
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दुःख का कारण बाहर नहीं, अंदर है ।
दुःख का निवारण बाहर नहीं , अंदर है ।
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क्रोध असंतोष का लक्षण है।
क्रोध कमजोरी की निशानी है ।
क्रोध अपने से कमतर माने जाने वालों के प्रति उद्गार है।
क्रोध स्वयं रोग है, न कि उपचार है।
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बस एक व्यक्ति मेरी बात को अच्छा मान ले।
बस एक व्यक्ति मेरे काम को अच्छा मान ले।
बस एक व्यक्ति मुझको अच्छा मान ले...
वह एक व्यक्ति आप स्वयं हैं।
उत्तरदायी बनिए।
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आदमी को किसी और से ज्यादा compare नहीं करना चाहिए। अपना better version बनने की कोशिश करते रहना चाहिए।
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आपको शक्तियाँ मिली हैं तो आपके व्यवहार में जिम्मेदारी भी स्वतः आनी चाहिए।
अपने privilege को अहंकार न बनने दें।
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पूर्वग्रह वैमनस्य में नहीं बदलना चाहिए।
व्यक्तिगत पसंद/ नापसंद सामूहिक क्रियाकलाप में बाधा नहीं पहुँचाना चाहिए। समूह की नीति व्यक्तिगत सोच से अलग हो सकती है।
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कोई भी व्यक्ति उतना अच्छा नहीं होता, जितना वह प्रदर्शित करता है।
कोई भी व्यक्ति उतना बुरा नहीं होता, जितना वह दिखता है।
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लोग व्यक्तिगत छवि को हर हाल में चमकाना चाहते हैं।
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कोई आपके पैर छूता हो तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आपकी इज्जत भी करता हो।
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