मंगलवार, 5 मई 2026

फिर कही बात...३

 फिर कही बात...3

(बतर्ज़े-ग़ज़ल)


दर्द  अपना  बता  कर   क्या  होगा

अब किसी को रुला कर क्या होगा


आइनों को हटा कर क्या होगा

बेवजह मुस्कुरा कर क्या होगा


मैं जो हूँ अब हूँ, तुम जो हो,  हो

यहाँ रिश्ता बना कर क्या होगा


मेरी नज़र में तुम  क्या  हो, अभी

ये किसी को बता कर क्या होगा


तुमसे पहले कुछ कहाँ  यक़ीं  था

तुम नहीं,आज़मा कर क्या होगा


***


क्या कहें कि क्या माजरा है

सच  तो  उनको  भी  पता है


लब हैं कि हँस  रहे  हैं  बहुत

दिल है कि बहुत दुख रहा है


अभी है सब, अभी सब खतम 

जीवन  का   क्या   आसरा  है


***


दिल में ज़हर हर तौर है

पेशे-नज़र कुछ  और है


भरोसा   वे     दिलाते   हैं

अपनी खबर कुछ और है


न सहो, कह ही डालो अब

बाकी  अगर  कुछ  और है 


कब  जाँ  निसार   करता   है 

कि नया  बशर  कुछ  और है

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