सोमवार, 18 मई 2026

कुछ छंद में - ४

कुछ छंद में - ४  

सबको दुख ने घेरा है

सबको दुख ने घेरा है

मेरा दुख, पर, मेरा है

नहीं टूटता बंधन है

नहीं छूटता फेरा है

 

सपने सारे टूट गए

संगी-साथी छूट गए

दुनिया की चालों ने भी

कैसे- कैसे पेरा है  !

 

कितना सुख था सोने में !

इक धोखे में होने में !

काहे खुद को छेड़ा है !

जीवन एक बखेड़ा है !

 

'मैं' ही 'मैं' का घेरा है

'मैं' ही 'मैं' का फेरा है

'मैं' छोड़े फिर जाने, जग

पल दो पल का डेरा है

 

जो  भी सीधा- सादा है

सबने उसको नाधा है

चूर-चूर कर दिल उसका

सबने उसे बिखेरा है

 

किससे क्या उम्मीद करें

क्या किसको ताकीद करें

क्या, कुछ मैंने जोड़ा है?

आखिर क्या हक मेरा है ?!

 

मन ही है जो गलता है

मन ही है जो ढलता है

मन ही पीतल, काँसा है

मन ही ,और, ठठेरा है  

 

सब फिज़ूल का रोना है

हो जाए जो होना है

जिसको पूँजी सौंपी थी

निकला वही लुटेरा है!

 

अपने दुख को क्या कहना

अपने दुख को क्या कहना

अपने  सुख में क्या बहना

दुनिया ऐसी दुनिया है

इसके फेरे क्या रहना

 

कोई मन में ना झाँके

आँख उठा के ना ताके

है मुद्दे की बात यही

अपने अपना सब सहना

 

दूर करीबी बेमानी

यही बात है समझानी

सब के सब ही नकली हैं

क्या अपने क्या बेगाने

 

अपने से खुश हो रहना

जो मन भाए सो करना

सब के सब मसरूफ़ यहाँ

किसी भरोसे मत रहना       

                                 छंद - ४


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