लेखक की दुनिया : कुछ गैरशास्त्रीय टिप्पणियाँ- १
लेखक की भावुकता
लेखन प्रथमत: लेखक की प्रतिक्रिया है। किसी बात के प्रति, अपने परिवेश के प्रति, किसी बात के प्रति या किसी घटना के प्रति । रचनात्मक लेखन में इसके एकपक्षीय होने की संभावना होती है । हम चाहे तो इसे पक्षधरता कह लें। कुछ लोग इसे पक्षपात भी कह सकते हैं ।
लेखक भावुक होता है । लेखक को भावुक होना चाहिए । लेखक की भावुकता वह चिंगारी है जिससे रचना का जन्म होता है । लेकिन भावुकता की कुछ सीमा भी होनी चाहिए । यदि भावनाओं में क्रोध भी शामिल हो, तब मुश्किल और ज्यादा है । तर्क से भावों को नहीं समझा जा सकता, भावों से तर्क को नहीं काटा जा सकता । बात इतनी ही है । विह्वलता कैसी भी हो, अच्छी नहीं होती।
लेखक को भावों में गोते लगाना चाहिए, लेकिन पानी से बाहर निकल का साँस लेने की भी जरूरत होती है । आसपास नजर दौड़ाने की भी जरूरत है । लेखक को अर्जुन की तरह सिर्फ 'मछली की आँख ' देखने वाला नहीं होना चाहिए । शायद इसलिए, कि लेखन बहुत ज्यादा लक्ष्य साध कर नहीं हो सकता । एक दिशा में बढ़ना तो तय किया जा सकता है , लेकिन रास्ता और मंजिल शायद ही पूर्वनियोजित रह पाते हैं ।
अति भावावेश में आकर कही गई बात हो सकता है कि किसी एक पक्ष के प्रति मानवीय व्यवहार को अवरुद्ध कर दे । लेखक को कहने से ज्यादा लिखकर बात करनी चाहिए । लिखी हुई बात ज्यादा पक्की होगी । कम-से-कम इस खयाल से कि उस लेखक को वह बात सिद्ध करनी पड़ सकती है या उस बात पर उससे सवाल - जवाब किया जा सकता है । एक और बात यह कि लेखक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो बात वह कहने या लिखने जा रहा है, उसे वह सार्वजनिक तौर पर भी कह सके । एकांत में कही गई बात, खास तौर पर समीक्षात्मक/ आलोचनात्मक ज्यादा ही व्यक्तिगत ( हमला ) मान ली जा सकती है ।
स्टैंड अप कॉमेडी का दारोमदार भी लेखन पर ही होता है । यह किसी कार्टूनिस्ट द्वारा बनाए गए कैरीकेचर के समान ही है । कार्टून में किसी उभरी हुई चीज को और भी, अनुपात से कहीं ज्यादा, उभार दिया जाता है ताकि जो बात कही जानी है, वह खूब उभर कर सामने आए ।
बातों को साफ - साफ उभार कर कहना लेखन की विशेषता है । भावों को संप्रेषित करने के लिए तो ठीक है, लेकिन क्या यह व्यवस्था पर टिप्पणी करने, या किसी नियम या परिस्थिति की समीक्षा करने के लिए भी कारगर उपाय सिद्ध हो सकता है ?
जैसा कि ऊपर भी कहा गया है, लेखन प्रथमत: लेखक की प्रतिक्रिया है । स्वाभाविक रूप से प्रतिक्रिया उस बात पर ज्यादा होगी, जो ज्यादा उभर कर सामने आई है। ऐसे में उस प्रतिक्रिया के क्रोध या व्यथा से सहमत तो हुआ जा सकता है, लेकिन क्या यह पूर्ण प्रतिक्रिया / अभिव्यक्ति भी है ?
हाल - फिलहाल की दो घटनाएँ/ बातें इस सम्बन्ध में देखी जा सकती हैं -
1. भारत के प्रधानमंत्री ने जनता से सात बिंदुओं पर अपील की है।
2. मृत बहन के खाते के निपटारे ( मृतक के खाते का) के क्रम में एक आदिवासी युवक का अपनी बहन के शव को लेकर बैंक पहुॅंच जाने के घटना की अखबारों में रिपोर्टिंग ।
इन दोनों ही बातों पर लेखकों ( स्टैंड अप कॉमेडी सहित) की धारदार प्रतिक्रियाएँ ( टिप्पणी, कविता, कॉमेडी शो आदि) आईं । इन प्रतिक्रियाओं ने आम जन के आक्रोश या उस आदिवासी युवक की व्यथा को बखूबी रेखांकित किया । लेकिन क्या यह भाव से तर्क को काटना नहीं हुआ ? क्या अर्थव्यवस्था को लेकर प्रकट की गई चिंताएँ एकदम ही निराधार हैं ? क्या तेल की कीमतें, सोने का आयात, विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति -- इन सब का भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव सिर्फ अभी का मामला है ? अपील या घोषणा की टाइमिंग या तरीके पर आपत्ति हो सकती है, पर इसकी आवश्यकता भी क्या बेमानी है ? इसी तरह , क्या उस आदिवासी युवक को बैंक के द्वारा वैसा करने को कहा गया था ? क्या मृतक के खाते की राशि के भुगतान के लिए नियमानुसार दस्तावेज अपेक्षित नहीं होते ? यह बिल्कुल हुआ होगा कि ठीक से समझाने में लापरवाही बरती गई हो ? व्यथित मन की प्रतिक्रिया में यह extreme कदम उठाया गया होगा । लेकिन इसमें सारा समाज दोषी नहीं है क्या ? हम सिर्फ व्यवस्था पर दोष देकर बरी नहीं हो जा सकते ।
लेखन का काम दोष देखना भी है, उसे सुधारने के लिए कुछ करना भी है । दोषारोपण सिर्फ पहला काम है, यदि है तो । अंतिम काम नहीं ।
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