बुरलेल जी की पाती १
आदरणीय एस पी साहब,
कहनाम यह है सर कि आपका रोल हमको बहुत अच्छा लगता है । वर्दी - उर्दी पहनकर जब आप निकलते हैं तो हमारे जैसे कितने ही लोग मुँह बाए खड़े रह जाते हैं । कभी श्रदा में, कभी आश्चर्य में और ज्यादातर एक भय में । पुलिस का भय से कोई न कोई संबंध है तो जरूर । भय को लोग इज्जत बोलकर इज्जत बचा देते हैं ! सर, वैसे भी देश के दूसरे और दुनिया के तीसरे सबसे भारी एग्जाम को पास करके आप लोग यहाँ तक पहुँचते हैं । कभी कभी तो देश के सबसे भारी और दुनिया के दूसरे सबसे भारी एग्जाम को पास कर के, चार साल में पढ़- लिख के आपलोग फिर तीसरे सबसे भारी एग्जाम को भी पास कर लेते हैं । ऐसी बात जब - जब हम पढ़ते - सुनते हैं , तब - तब हमको लगता है कि ज्ञानी लोग ठीक ही कहते हैं कि हमारे देश की सभ्यता पाँच हजार साल पुरानी है ।
सर ,आपलोग तो ऐसे ही एकदम स्मार्ट लगते हैं । उस पर से गाड़ी, बॉडीगार्ड, बंदूक,सायरन -- ये सब आपके स्मार्टनेस को और बढ़ा देते हैं । आपको शायद अंदाजा नहीं होगा कि लोग आपसे कितना मिलना चाहते हैं । चाय - नाश्ता करने के लिए नहीं सर, अपने काम के लिए, किसी जरूरत के लिए । किसी परेशानी में ही आप की याद आती है हमें । लेकिन सर आपसे मिलने की प्रक्रिया कठिन है । यह भी सही है कि आप भी कितने लोगों से मिल पाएँगे। लेकिन सर एक बात कहनी है -- आप तो खुद ही इतने ऊँचे पद पर आसीन हैं , आपको खुद को बड़ा जताने की कितनी जरूरत है । अभी उसी दिन एक वृद्ध प्रोफेसर आपसे मिलने आए थे । आपके स्टाफ ने उनका टिपटिपिया फोन बाहर रखवा लिया । सुरक्षा के कारणों से सही ही होगा । लेकिन अंदर आपके बड़े से कमरे में, आपकी उमर के दोगुने से भी ज्यादा उमर के प्रोफेसर हाथ जोड़े खड़े निवेदन करते रहे । आप समझ नहीं पा रहे थे कैसे रिएक्ट करें ।आप वैसे ही बैठे रह गए, वे वैसे ही करबद्ध खड़े । हम आपको दोष नहीं दे रहे हैं । हो सके तो आप भी सोचिएगा कि ऐसी स्थिति के जिम्मेदार कौन हैं । प्रजा तो है ही, विधायिका और कार्यपालिका भी है । जनता हमेशा नत - विनत ही खड़ी रह जाती है । आप या और भी साहब लोग ठीक से बात भी कर लेते हैं तो हम धन्य - धन्य हो जाते हैं । चौराहे की लालबत्ती को हाकिमों की गाड़ी न काटे, या उनके लिए सिग्नल न बदला जाए तो जनता वैसे हाकिमों को बड़ेदिलवाला मान लेती है। जनता की इतनी निरीहता अच्छी है क्या ? आप तो जैसे- जैसे ऊपर बढ़ेंगे, जनता और जमीन से दूर होकर कागजों - फाइलों के नजदीक होते जाएँगे। आप लोग देश के मौर - मुकुट हैं । आपको हम बड़ी अपेक्षा के साथ देखते हैं । इन दिनों समाज के हर तबके के चाल - चरित्र में गिरावट आई है ,जिसका एक बड़ा कारण है भ्रष्टाचार। आपका महकमा भी अछूता नहीं रह गया है । हमारी हैसियत तो नहीं है कि हम कुछ सीख दे सकें । वैसे भी जब सारे लोग भ्रष्ट हो जाएँ तो फिर कोई भी भ्रष्ट नहीं माना जाता । जानते हैं ,यह हमारा निराशावादी स्वर है । लेकिन अब यही है सर !
आप बोलिएगा भी कि हम क्या बोले जा रहे हैं । बात यह है सर कि देश के एक वृद्ध प्रोफेसर को देश के सबसे योग्यतम अधिकारियों में से एक से मिलने के लिए चिरौरी करनी पड़े, इंतजार करना पड़े और जब मिलने का मौका आए तो इतना झुक के अपनी बात रखनी पड़े कि लगे रीढ़ की हड्डी ही नहीं है शरीर में , तब बड़ी निराशा- सी होने लगती है । मन डूबने लगता है। जानते हैं कि हर तरफ यही हाल है। हम कोशिश करेंगे कि सबको चिट्ठी लिखें । बचपन से वर्दी और बाघ - छाप बैच लगाने का बड़ा शौक रहा है, इसलिए पहली पाती एक वर्दी वाले को !
एक फिल्म के एक गीत के ही दो वर्जन याद आ रहे । सुनिए --
हर तरफ जुर्म है बेबसी है
सहमा सहमा सा हर आदमी है
इसी गीत के दूसरे version की ये पंक्तियाँ--
हम न सोचें हमें क्या मिला है,
हम ये सोचें किया क्या है अर्पण
फूल खुशियों के बांटें सभी को,
सबका जीवन ही बन जाए मधुवन
बाकी सब कुशल - मंगल ।
शेष फिर,
सिद्ध - प्रसिद्ध
उर्फ बुरलेल जी
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