मंगलवार, 19 मई 2026

माँ !

 

माँ !

माँ

बचपन की भूख-प्यास 

जरूरत हर आम, खास 

पहचानती है 

माँ सब जानती है

होती है हर क्षण की खबर 

कहे, न कहे कुछ भी अगर 

भले ही हम कितने बड़े हो गए हों 

मगर फिर भी 

हर खुशी, हर आघात 

छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी हर एक बात 

बोली से, नज़रों से हमारी 

छानती है 

माँ सब जानती है ।

 

घर आया मैं

माँ कहती है

दो-चार दिनों को भी आ जाया करो

अच्छा लगेगा पापा को भी

 

और साहब हमने तो नौकरी की है

फुर्सत ही नहीं मिलती

इस बार जोड़-जाड़ के हिसाब छुट्टियों का, काम का

कि कुछ हर्ज ना हो

आया हूँ घर बड़ी देर में

 

चमक उठी हैं माँ की आँखें

तरावट आ गई है पापा के चेहरे पर

और किया नहीं है कुछ खास इन दो दिनों में

बस आराम ही हुआ है

भरपूर...

 

निकलते वक्त कहा माँ ने

आया करो

जो कहा नहीं, पर जो दिखा एकदम साफ-

अच्छा लगा! बहुत अच्छा लगा।

और अपना हाल

गूँगा क्या बताए गुड़ का स्वाद !                  

 

माँ की हँसी

माँ

तुम कब हँसी थी

खुलकर पिछली बार ?

 

कब

गुनगुनाया था कुछ

कब

बनाए थे ढेरों पकवान ?

कब बुलाए थे

घर भर मेहमान

कब मनाई थी -

होली-दिवाली

तीज-त्योहार

कब उत्सव हुआ था पिछली बार ?

 

माँ

तुमने

कब की थी आशा

हमसे पिछली बार...?

 

बेटे चाँद को बुखार आया है

आधा मुँह ढके

मुरझाया पड़ा

चाँद

 

हवा

गुमसुम

उदास

 

रात

परेशान

जगी-जगी

 

बेटे चाँद को

बुखार आया है

माँ रात क्या करे ! 

 

माँ ही कर सकती है  

माँ

बच्चों की

तारीफ़ नहीं करती बहुत

कहीं टोक न लग जाए !

मन-ही-मन

करती रहती है दुआ

और

शिकन भर भी कहीं

दिख जाए, तो

मानने लगती है मन्नतें

 

बच्चों की ही तरफ़

हमेशा

होती है खड़ी

अपने सुख-दुख

गिले-शिकवे

भूल कर सब

 

माँ

सब समझ सकती है

उपस्थिति मात्र से ही

दुख हर सकती है

और

ज़रूरत पड़े

तो

भीतर ही भीतर

कट सकती है

मर सकती है

 

माँ

जो कर सकती है

वह

बस माँ ही कर सकती है !

 

माँ का गुस्सा

क्या कह दिया है

गुस्सा दिला दिया है

माँ ने

जैसे झाड़ू उठा लिया है

सब झाड़ दिए जाएँगे !

 

क्या करते रहते हो दिन भर

पढ़ते तक नहीं ढंग से

एक काम नहीं होता तुमसे

 

हर मौके पर डटी हूँ

रात-दिन रहती हूँ खटती

मरती-खपती !

 

सब जाओ

चले जाओ

 

क्या बात हो गई है

पूछना चाहा पिता ने

 

आप चुप करें

बस अखबार ही पढ़ें

दुनिया भर को देखें

एक घर के सिवा !

 

चलता रहा एकालाप

माँ का -

 

घर, बाहर

दिन, रात

सब्जी, दूध

रोटी, भात

माता,पिता

कुल,परिवार

अच्छा,बुरा

खोटा, खरा

हिसाब-किताब

सब करो,सब करो

करते रहो, करते रहो

 

एक आवाज़

किस-किस की बात !

 

नदी में

आती है बाढ़

कुपित होती हैं

देवी कभी

 

मगर

जीवनदायिनी कौन !

शक्तिदायिनी कौन !

दया की वाहिनी कौन !

 

माता सम बस माता !

माता सम बस माता !

 

हालचाल

माँ

बीमार है
या दुखी है
मुश्किल है पता करना

उसे
कहने की
नहीं आदत
हमें पूछने की,
सुनने की !!          

***

माँ को

कुछ होता है
किसी को कुछ पता नहीं होता

एक
माँ ही होती है
जिसे
सबकुछ पता होता है   

धुरी

माँ

धुरी होती है

बाकी-
परिधि
त्रिज्या
व्यास
परिमाप ;
बहुत हुआ
तो बल
'
सेंट्रीपीटल'
या 'सेंट्रीफ्यूगल' !! 

घर के भाग !

माँ का हँसना

जरूरी है

जीवन के
जीवंत होने के लिए

सब
झिक-झिक
चिक-चिक
अपनी जगह

हँसती है माँ
तो घर हँसता है
हँसते हैं
घर के भाग !! 

संस्कृति

 माँ

बेटियों से
कर लेती है
सुख-दु:ख साझा

पीढ़ियों से
चली आ रही बात
बढ़ जाती है
इस तरह

पीढ़ी-दर-पीढ़ी
बनती है
संस्कृति       

धूप दिखाती माँ  

 धूप दिखाती हुई माँ

भोर जगाती हुई माँ

तिरते हुए मद्धम स्वर

शुद्ध हो जाता है घर

 

गुनगुनाती हुई सुबह को

मैथिली में

गुनगुनाती हुई माँ


सोमवार, 18 मई 2026

कुछ छंद में - ४

कुछ छंद में - ४  

सबको दुख ने घेरा है

सबको दुख ने घेरा है

मेरा दुख, पर, मेरा है

नहीं टूटता बंधन है

नहीं छूटता फेरा है

 

सपने सारे टूट गए

संगी-साथी छूट गए

दुनिया की चालों ने भी

कैसे- कैसे पेरा है  !

 

कितना सुख था सोने में !

इक धोखे में होने में !

काहे खुद को छेड़ा है !

जीवन एक बखेड़ा है !

 

'मैं' ही 'मैं' का घेरा है

'मैं' ही 'मैं' का फेरा है

'मैं' छोड़े फिर जाने, जग

पल दो पल का डेरा है

 

जो  भी सीधा- सादा है

सबने उसको नाधा है

चूर-चूर कर दिल उसका

सबने उसे बिखेरा है

 

किससे क्या उम्मीद करें

क्या किसको ताकीद करें

क्या, कुछ मैंने जोड़ा है?

आखिर क्या हक मेरा है ?!

 

मन ही है जो गलता है

मन ही है जो ढलता है

मन ही पीतल, काँसा है

मन ही ,और, ठठेरा है  

 

सब फिज़ूल का रोना है

हो जाए जो होना है

जिसको पूँजी सौंपी थी

निकला वही लुटेरा है!

 

अपने दुख को क्या कहना

अपने दुख को क्या कहना

अपने  सुख में क्या बहना

दुनिया ऐसी दुनिया है

इसके फेरे क्या रहना

 

कोई मन में ना झाँके

आँख उठा के ना ताके

है मुद्दे की बात यही

अपने अपना सब सहना

 

दूर करीबी बेमानी

यही बात है समझानी

सब के सब ही नकली हैं

क्या अपने क्या बेगाने

 

अपने से खुश हो रहना

जो मन भाए सो करना

सब के सब मसरूफ़ यहाँ

किसी भरोसे मत रहना       

                                 छंद - ४


शनिवार, 16 मई 2026

लेखक की भावुकता

 लेखक की दुनिया : कुछ गैरशास्त्रीय टिप्पणियाँ- १


               लेखक की भावुकता 



लेखन प्रथमत: लेखक की प्रतिक्रिया है।  किसी बात के प्रति, अपने परिवेश के प्रति या किसी घटना के प्रति । रचनात्मक लेखन में इसके एकपक्षीय होने की संभावना होती है । हम चाहे तो इसे पक्षधरता कह लें।  कुछ लोग इसे पक्षपात भी कह सकते हैं ।


लेखक भावुक होता है । लेखक को भावुक होना चाहिए । लेखक की भावुकता वह चिंगारी है जिससे रचना का जन्म होता है । लेकिन भावुकता की कुछ सीमा भी होनी चाहिए । यदि भावनाओं में क्रोध भी शामिल हो, तब मुश्किल और ज्यादा है । तर्क से भावों को नहीं समझा जा सकता, भावों से तर्क को नहीं काटा जा सकता । बात इतनी ही है । विह्वलता कैसी भी हो, अच्छी नहीं होती। 


लेखक को भावों में गोते लगाना चाहिए, लेकिन पानी से बाहर निकल का साँस लेने की भी जरूरत होती है । आसपास नजर दौड़ाने की भी जरूरत है । लेखक को अर्जुन की तरह सिर्फ  'मछली की आँख ' देखने वाला नहीं होना चाहिए ।  शायद इसलिए, कि लेखन बहुत ज्यादा लक्ष्य साध कर नहीं हो सकता । एक दिशा में बढ़ना तो तय किया जा सकता है , लेकिन रास्ता और मंजिल  शायद ही पूर्वनियोजित रह पाते हैं । 


अति भावावेश में आकर कही गई बात हो सकता है कि किसी एक पक्ष के प्रति मानवीय व्यवहार को अवरुद्ध कर दे । लेखक को कहने से ज्यादा लिखकर बात करनी चाहिए । लिखी हुई बात ज्यादा पक्की होगी । कम-से-कम इस खयाल से कि उस लेखक को वह बात सिद्ध करनी पड़ सकती है या उस बात पर उससे सवाल - जवाब किया जा सकता है । एक और बात यह कि लेखक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो बात वह कहने या लिखने जा रहा है, उसे वह सार्वजनिक तौर पर भी कह सके । एकांत में कही गई बात, खास तौर पर समीक्षात्मक/ आलोचनात्मक ज्यादा ही व्यक्तिगत ( हमला ) मान ली जा सकती है ।


स्टैंड अप कॉमेडी का दारोमदार भी लेखन पर ही होता है । यह किसी कार्टूनिस्ट द्वारा बनाए गए कैरीकेचर के समान ही है । कार्टून में किसी उभरी हुई चीज को और भी, अनुपात से कहीं ज्यादा, उभार दिया जाता है ताकि जो बात कही जानी है, वह खूब उभर कर सामने आए । 


बातों को साफ - साफ उभार कर कहना लेखन की विशेषता है । भावों को संप्रेषित करने के लिए तो ठीक है, लेकिन क्या यह व्यवस्था पर टिप्पणी करने, या किसी नियम या परिस्थिति की समीक्षा करने के लिए भी कारगर उपाय सिद्ध हो सकता है ? 


जैसा कि ऊपर भी कहा गया है, लेखन प्रथमत: लेखक की प्रतिक्रिया है । स्वाभाविक रूप से प्रतिक्रिया उस बात पर ज्यादा होगी, जो ज्यादा उभर कर सामने आई है।  ऐसे में उस प्रतिक्रिया के क्रोध या व्यथा से सहमत तो हुआ जा सकता है, लेकिन क्या यह पूर्ण प्रतिक्रिया / अभिव्यक्ति भी है ? 


हाल - फिलहाल की दो घटनाएँ/ बातें इस सम्बन्ध में देखी जा सकती हैं - 


1. भारत के प्रधानमंत्री ने  जनता से सात बिंदुओं पर अपील की है।

2. मृत बहन के खाते के निपटारे ( मृतक के खाते का)  के क्रम में एक आदिवासी युवक का अपनी बहन के शव को लेकर बैंक पहुॅंच जाने के घटना की अखबारों में रिपोर्टिंग ।


इन दोनों ही बातों पर लेखकों ( स्टैंड अप कॉमेडी सहित) की धारदार प्रतिक्रियाएँ ( टिप्पणी, कविता, कॉमेडी शो आदि) आईं । इन प्रतिक्रियाओं ने आम जन के आक्रोश या उस आदिवासी युवक की व्यथा को बखूबी रेखांकित किया । लेकिन क्या यह भाव से तर्क को काटना नहीं हुआ ? क्या अर्थव्यवस्था को लेकर प्रकट की गई चिंताएँ एकदम ही निराधार हैं ? क्या तेल की कीमतें, सोने का आयात, विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति -- इन सब का भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव सिर्फ अभी का मामला है ? अपील या घोषणा की टाइमिंग या तरीके पर आपत्ति हो सकती है, पर इसकी आवश्यकता भी क्या  बेमानी है ?  इसी तरह , क्या उस आदिवासी युवक को बैंक के द्वारा वैसा करने को कहा गया था ? क्या मृतक के खाते की राशि के भुगतान  के लिए नियमानुसार दस्तावेज अपेक्षित नहीं होते ? यह बिल्कुल हुआ होगा कि ठीक से समझाने में लापरवाही बरती गई हो ? व्यथित मन की प्रतिक्रिया में यह extreme कदम उठाया गया होगा । लेकिन इसमें सारा समाज दोषी नहीं है क्या ? हम सिर्फ व्यवस्था पर दोष देकर बरी नहीं हो जा सकते ।


लेखन का काम दोष देखना भी है, उसे सुधारने के लिए कुछ करना भी है । दोषारोपण सिर्फ पहला काम है, यदि है तो । अंतिम काम नहीं । 



मंगलवार, 5 मई 2026

फिर कही बात...३

 फिर कही बात...3

(बतर्ज़े-ग़ज़ल)


दर्द  अपना  बता  कर   क्या  होगा

अब किसी को रुला कर क्या होगा


आइनों को हटा कर क्या होगा

बेवजह मुस्कुरा कर क्या होगा


मैं जो हूँ अब हूँ, तुम जो हो,  हो

यहाँ रिश्ता बना कर क्या होगा


मेरी नज़र में तुम  क्या  हो, अभी

ये किसी को बता कर क्या होगा


तुमसे पहले कुछ कहाँ  यक़ीं  था

तुम नहीं,आज़मा कर क्या होगा


***


क्या कहें कि क्या माजरा है

सच  तो  उनको  भी  पता है


लब हैं कि हँस  रहे  हैं  बहुत

दिल है कि बहुत दुख रहा है


अभी है सब, अभी सब खतम 

जीवन  का   क्या   आसरा  है


***


दिल में ज़हर हर तौर है

पेशे-नज़र कुछ  और है


भरोसा   वे     दिलाते   हैं

अपनी खबर कुछ और है


न सहो, कह ही डालो अब

बाकी  अगर  कुछ  और है 


कब  जाँ  निसार   करता   है 

कि नया  बशर  कुछ  और है

सोमवार, 4 मई 2026

ध्यातव्य

 

ध्यातव्य : १

( कुछ सोचने योग्य...)


मन खुश हो तो बाकी ( नापसंद) बातें इग्नोर कर दी जाती हैं। 

बाकी ( नापसंद) बातों को इग्नोर कीजिए। मन खुश हो जाएगा, एक न एक दिन जरूर। 


***


जिंदगी लक्षणा या व्यंजना में पूछती है और चाहती है कि हम उत्तर अभिधा में दें।    


***


कई बार एकदम साफ दिख रही, सबको समझ आ रही बातों का भी कहा जाना जरूरी होता है। 


कुछ बातों का मर्म उनके कहे जाने में छिपा होता है । 


***


कर्मों का हिसाब भी जरूरी नहीं कि जहाँ किया गया हो, वहीं हो जाए। वह किसी भी स्थान पर किसी भी रूप में मिल जा सकता है। कोर बैंकिग में जमा किए गए पैसों की तरह । कहीं जमा कीजिए, कहीं निकाल लीजिए ।


***


कर्मों का हिसाब अकाउंट पेयी चेक से ही होता है, कर्ता के नाम के। 


***


किसी से 

अपेक्षा रखिए मत

किसी की

उपेक्षा करिए मत 


सुखी रहेंगे


***


दुःख का कारण बाहर नहीं, अंदर है । 

दुःख का निवारण बाहर नहीं , अंदर है । 


***


क्रोध असंतोष का लक्षण है। 

क्रोध कमजोरी की निशानी है । 

क्रोध अपने से कमतर माने जाने वालों के प्रति उद्गार है। 

क्रोध स्वयं रोग है, न कि उपचार है। 


***


बस एक व्यक्ति मेरी बात को अच्छा मान ले। 

बस एक व्यक्ति मेरे काम को अच्छा मान ले। 

बस एक व्यक्ति मुझको अच्छा मान ले... 


वह एक व्यक्ति आप स्वयं हैं। 

उत्तरदायी बनिए।          


***


आदमी को किसी और से ज्यादा compare नहीं करना चाहिए। अपना better version बनने की कोशिश करते रहना चाहिए।


***


आपको शक्तियाँ मिली हैं तो आपके व्यवहार में जिम्मेदारी भी स्वतः आनी चाहिए। 

अपने privilege को अहंकार न बनने दें। 


***


पूर्वग्रह वैमनस्य में नहीं बदलना चाहिए। 


व्यक्तिगत पसंद/ नापसंद सामूहिक क्रियाकलाप में बाधा नहीं पहुँचाना चाहिए। समूह की  नीति व्यक्तिगत सोच से अलग हो सकती है। 


***


कोई भी व्यक्ति उतना अच्छा नहीं होता, जितना वह प्रदर्शित करता है। 

कोई भी व्यक्ति उतना बुरा नहीं होता, जितना वह दिखता है। 


***


लोग व्यक्तिगत छवि को हर हाल में चमकाना चाहते हैं। 


***


कोई आपके पैर छूता हो तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आपकी इज्जत भी करता हो। 


***




रविवार, 3 मई 2026

फिर कही बात ...2

 फिर कही बात ...2


मन को तुम्हारे टटोले हुए हैं

अब आँखें अपनी खोले हुए हैं


रात और दिन का फ़र्क कुछ नहीं

करेंगे वही जो बोले हुए हैं


कल तक वही थे आँखों के सपने  

जो आज दिल के फफोले हुए हैं


मन मे ज़हर ही ज़हर घुल रहा है

रस बातों कैसा घोले हुए हैं


माना तुम्हीं-तुम बड़े हो गए हो

माना कि बस हम मँझोले हुए हैं  


चिंताएँ कितनी ठूॅंसी हुई हैं

इंसान हैं याकि झोले हुए हैं


मन था- नज़रों में ऊॅंचा उठेंगे 

वे कि तराजू में तौले हुए हैं


लगता है कि हम चूके यहीं पर

हमीं भेद सारे खोले हुए हैं


+++


ऊब न जाओ डरता हूँ 

कितनी बातें करता हूँ 


तुम भी अच्छे लगते हो

तुम पर भी मैं मरता हूँ 


उनको दिक्कत है ,मैं ही

खतो-किताबत करता हूँ 


दिन भर खाली बैठा हूँ 

दिन भर आहें भरता हूँ 


सोच-समझ कर कहते हैं

मैं कह, सोचा करता हूँ 


+++


बस बाल-बाल बचे हैं

बुझे हुए अगरचे हैं


किस्से सभी मेरे हैं

जाने किसने रचे हैं


सब बॅंधे-से बैठे हैं

खूबरुओं के चर्चे हैं


खुल के बोलनेवाले 

अब भला किसे पचे हैं