सोमवार, 25 दिसंबर 2023

तुम्हारा जाना, रवि

          

   तुम्हारा जाना, रवि 
    (24.12.2023) 


(1)


यार, तुम गलत किए ! 

बहुत गलत हुआ यार ! 


लेकिन मैं गलती नहीं करूँगा

संवेदना के संदेश भेजूँगा

इमोजी डालूँगा ग्रुप में

चर्चा करूँगा


क्या हुआ जो तुमसे

आखिरी बार बात

दो- सवा दो साल पहले हुई थी

आखिरी मेसेज भी अगर

साल भर पहले का है, तो क्या हुआ

और तो और

जो ग्रुप में आकाशवाणी-सी हुआ करती है

जिसमें हर आवाज़

नक्कारखाने में तूती ही है

और जिसमें

जिसमें रोज सुबह- सुबह 

'गुड मॉर्निंग' कहने वाले तुम

खामोश रहे हफ्ते भर से

और धेला भर भी फर्क

नहीं पड़ा मुझे


मैं बहुत बड़ा हो गया हूँ

बहुत व्यस्त, एकदम प्रोफेशनल

I mean business, always

कहाँ है मेरे पास समय

फालतू बातों के लिए

कब जानना चाहा मैंने 

कैसे हो तुम, कब सराहा तुम्हें

कैसे खड़ा कर लिया स्कूल

कब बताना चाहा तुम्हें

अपनी जिंदगी का हाल

अरे, कौन कहाँ कब

हर तरह पसंद आता है

हरेक कभी न कभी

किसी न किसी का

दिल तो दुखाता है

मैंने भी दुखाया हो कभी

तो क्या हुआ....


तो क्या हुआ कि मन के कोने में

बीती बातों की याद बैठी है

क्या हुआ कि भूलकर सबकुछ

फिर से मिलने की है तमन्ना दिल में

लेकिन, मन के पेंच कस दिए मैंने

तन गई पीठ, तन गया चेहरा

भाव शून्य हो गईं आँखें

सुन रक्खा है मैंने

' इमोशनल आदमी

हारता ज्यादा है, जीतता कम'

कौन हारा है? 


अरे क्या करते तुम

क्या करे कोई? 

मर जाए? 

मर तो गए तुम

खत्म हो गए साथ-

साथ सारे उपाय... 

करिए 

करिए अब जो मन भाए  !! 


           (2) 


नहीं भूल रही हैं

तुम्हारी बड़ी- बड़ी आँखें

तुम्हारी आवाज़

जो गंभीर और खिलंदड़ दोनों

थी साथ-साथ


सोए हुए हो तुम

चिर निद्रा में

मुँद चुकी पलकों के भीतर

स्थिर हैं तुम्हारी चंचल आँखें

पसरी हुई है शांति स्तब्ध


'जातस्य हि ध्रुवं मृत्यु'

जो आया है वो जाएगा 

उम्र के इस पड़ाव पर

'वेक अप कॉल' है

जाना तुम्हारा


लगती रहती है

दूर की चीज़ कोई पराई

एक दिन मगर

मृत्यु अपनी सत्ता का अहसास

करा ही देती है

देर सबेर


याद आ रही हैं

उषा दी

कितना मन था उनसे मिलने का

भला अब क्या मुँह दिखाऊँगा

कितनी ही छोटी- छोटी बातें

छोड़ते जाते हैं हम

जाने किस बड़ी बात की खातिर


तुम्हारा जाना, रवि

सिर्फ तुम्हारा जाना नहीं है

हम सब भी 'जा रहे' हैं

रोज़ के रोज़ थोड़ा थोड़ा


सब बस चलते चले जाते हैं

एक दिन चले जाने के लिए

जीना इसी का नाम तो नहीं

शिकायतों का पुलिंदा लिए

डोलते रहना

महत्वाकांक्षा के पहाड़ पर

चढ़ जाने को

शुतुर्मुर्ग- सा बालू में सर घुसाए

दुनिया से कटते जाना


'कृतघ्ने नास्ति निष्कृति'

कृतघ्न का नहीं निस्तार

फिर भी अहंकार

किस हेतु 

जीवन से बड़ी बात क्या है

छोटी बड़ी औकात क्या है  ? 


'अब तक क्या किया ? 

जीवन क्या जिया!! 

बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये,

करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये,

बन गये पत्थर,

बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,

दिया बहुत-बहुत कम,

मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम'

मक्तिबोध की यह चिंता दिनोंदिन

बढ़ती ही जा रही 

देश कौन है? क्या है? 

सोचें तो ज़रा... 


काँटे उग आए हैं

ज़बानों पर, हाथों पर 

ज़र्द हो चले हैं चेहरे

सर्द हो चला है लहू

अपने शीशे के घरों में बैठे हैं लोग

हाथों में पत्थर उठाए


ज़िंदगी देती है मौके

मौत नहीं

क्या समझेंगे कभी  ? 



                   (3) 

  कैसी बीती होगी रातें? 

        कैसे बीती होंगी रातें? 

 दो सर्द रातें  । 


        तुम थे

        तुम नहीं थे

        थी तुम्हारी देह-मात्र, वह भी

        अब सुपुर्दे- ख़ाक है


         सब छोड़ चल देता है आदमी

         घर- दुआर

         साजो- सामान

         नाते- रिश्ते

         दोस्त- यार

         और अन्ततः देह

सबकुछ कितना बेमा'नी है

सच है, दुनिया फ़ानी है 


         अस्वाभाविक है तुम्हारा जाना

         दोस्त जो गए पहले, उनका भी

         स्वाभाविक नहीं था जाना

         स्वाभाविक कहाँ होता है

         किसी का जाना कभी... 

अशक्तता मथ रही है

मथ रही है विवशता अपनी


       ख़ाक में मिल जाना है

       राख हो जाना है

       एक दिन यही होना है

       सबको चले जाना है

किसको क्या समझाएँ

मन को कैसे मनाएँ


       मधुर- कटु व्यवहार किसी का

       भली- बुरी बातें किसी की

       क्या ही तय करें और भला क्यों

       है ठहरा हुआ समय, गुज़र रहे हैं हम

       जीवन-- बालू का एक कण

जीवन कितना छोटा है

और कितने छोटे हैं हम


        सच्चाई के क्षणों में

        खुद को हम पाते हैं, फिर

        खुद को खो आते हैं

        दु नि या दा री  की बातों में 

        सब जानते हैं सब --

        " ज़िंदगी ख़्वाब है

          ख़्वाब में

          झूठ क्या

          और भला सच है क्या? 

          सब सच है !" 

सुई की नोक- सा क्षण तुमने चुभाया है

हम ज़िंदा हैं अभी, हमें यह याद कराया है

        




























गुरुवार, 16 नवंबर 2023

कालीचाट

 

कालीचाट

निर्देशन : सुधांशु शर्मा, लेखक : सुनील चतुर्वेदी, पटकथा, संवाद : सोनल शर्मा
Neolit Publications, Indore

 

 

 

अभी पिछ्ले दिनों एक फिल्म देखी ट्वेल्थ फेल। फिल्म अच्छी लगी तो उस उपन्यास को पढ़कर देखने की इच्छा हुई जिस पर यह फिल्म बनी है । उपन्यास का ऑर्डर करते समय वह एक कॉम्बो पैक में दिखा। दूसरी किताब थी लेखिका सोनल की फिल्म बनती है... और बनाती भी है !फिल्म बनती है... और बनाती भी है !एक फिल्म के बनने की कहानी है। फिल्म का नाम है कालीचाट’, जो सुनील चतुर्वेदी के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है । फिल्म की पटकथा और संवाद सोनल ने लिखे हैं । किताब इतनी रोचक लगी और फिल्म की कथा-वस्तु ने इतना आकर्षित किया कि किताब पढ़ने के बीच में ही सोनल जी को मेसेज कर पूछा कि फिल्म कैसे देखी जा सकती है । और पहले से भी पेश्तर  की तर्ज़ पर उनका जवाब आ गया फिल्म की लिंक के साथ । किताब खत्म होते ही फिल्म देखी गई।

 

फिल्म मालवा-निमाड़ क्षेत्र के एक गाँव के एक किसान की कहानी है । और यह कहानी उतनी ही सच है जितना हमारा जीवन । किताब में लेखिका ने पिकासो को उद्धृत किया है – कला एक झूठ है...फेंटेसी है, लेकिन यह कला ही है जो हमें जीवन के सत्य के दर्शन करवाती है । फिल्म की कहानी इस तरह से बुनी गई है कि आपको एक पल के लिए भी छोड़ती नहीं। आप फिल्म देखते जाते हैं और लगातार सोचते जाते हैं कि अब भी, अब भी ऐसा हो रहा है ! 1936 में प्रकाशित प्रेमचंद का गोदान’, 1954 में प्रकाशित रेणु का मैला आँचलऔर 1968 में प्रकाशित श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारीअगर आपने पढ़ा हो तो इस फिल्म को देखकर आप यह जरूर सोचेंगे कि भारत बदल कहाँ रहा है ? सबकुछ चला आ रहा है जस का तस । फिल्म एक किसान के जीवन ( इसे एक साधारण ग्रामीण का जीवन भी कहा जा सकता है) को इस तरह से, इतने करीब से दिखाती है कि आप फर्क ही महसूस नहीं कर पाते, फिल्म से अपनी दूरी नहीं बनाए रख सकते । फिल्म आप में प्रवेश कर जाती है, आप फिल्म में प्रवेश कर जाते हैं। यह फिल्म की कथा, पटकथा, संवाद, अभिनय, संगीत और निर्देशन – फिल्म के हर विभाग के अव्वल दर्जे का होने के कारण ही संभव हो पाया है । एक घंटे दस मिनट की यह फिल्म एक ऐसे सच से रूबरू कराती है जिसके बारे में हम रोजाना सुनते तो हैं लेकिन दूसरी तरफ मुँह फेर कर बचकर निकल जाते हैं । फिल्म उसी सच को हमारी आँखों में उँगली गड़ाकर दिखाती है और बेचैन कर देती है । देश में रहने वाला कोई व्यक्ति तभी इतना बेबस और लाचार हो सकता है जब पूरा सिस्टम ही फेल हो जाए । पहले दृश्य से ही फिल्म इतनी विश्वसनीय है कि फिल्म के समाप्त हो जाने के बाद भी फिल्म आपके साथ रह जाती है । फिल्म अपने संवादों से मालवा की आँचलिकता को साथ लिए चलती है, लेकिन यह पूरे भारत के किसानों की पीड़ा को स्वर देती है ।

 

कालीचाटफिल्म बनी 2016 में और यह महज संयोग ही है कि इस फिल्म को देखने का मौका मुझे मिला । यह फिल्म किसी बड़े , नामीगिरामी निर्माता निर्देशक की फिल्म होती तो मीडिया भी तारीफों के पुल बाँधता लहालोट हो रहा होता । फिल्म की नायिका के लुक के लिए अभिनेत्री गीतिका श्याम द्वारा की गई तैयारी, जिसमें घंटों धूप में बैठना और उड़ती हुई रेत के सामने खड़ा रहना शामिल है, और जिसे फिल्म के निर्देशक सुधांशु शर्मा मेक डाउनकहते हैं , उस तैयारी की खूब चर्चा की गई होती । खैर, फिल्म ने अपने समय को डॉक्यूमेंटकर लिया है और इतिहास में दर्ज की गई हर ईमानदार बात बची रहती है पीढियों को रास्ता दिखाने के लिए ।  

स्व. जयप्रकाश ने कालीचाटके विषय में बात करते हुए लिखा है – ...इस फिल्म को संसद और विधानसभाओं में दिखाया जाना चाहिए ताकि हमारे हुक्मरान किसान की वेदना को समझ सकें । मुझे लगता है इस फिल्म को राज्यों के प्रशासनिक सेवा और बैंकों के प्रशिक्षण केंद्रों पर भी अनिवार्य रूप से दिखाया जाना चाहिए । ब्लॉक या तहसील स्तर के प्रशासनिक कार्यालयों के कर्मचारियों को भी यह फिल्म दिखाई जानी चाहिए । कहीं तो किसी की आँख का पानी बचा हुआ होगा ! स्व. विष्णु खरे ने फिल्म पर लिखा है – एक फिल्म निर्देशक को किसी साहित्यिक कृति का कैसा इस्तेमाल करना चाहिए यह भी इससे उजागर होता है । मैं इसमें जोड़ना चाहता हूँ कि एक फिल्म के जरिये एक निर्देशक किस तरह साहित्य की रचना करता है यह फिल्म इसका भी एक बेहतरीन उदाहरण है ।

फिल्म देखते हुए यह खयाल आया कि आदमी टूटता कब है ?  सरकारी कर्मचारी/अधिकारी जो लोक-सेवा के लिए चयनित होते हैं, वे शासक बन बैठते हैं और अपनी ही जनता को लूटने- खसोटने लगते हैं । बैंक या किसी भी संस्था के जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्ति जब जरूरतमंदों की बात तक सुनने को तैयार नहीं, और बात सुन भी ली तो जिम्मेदारी के साथ जवाब देने को तैयार नहीं । जब करीबी दोस्त जिनसे गाढ़े समय में कम से कम सही सलाह- मशविरे की उम्मीद होती है, वो भी चलताऊ किस्म की बातें कर जाएँ भले ही कितना भी नुकसान क्यों न होता जाए । और जब जीवन साथी का ही धैर्य जीवन के सबसे नाजुक और कमजोर क्षणों में चुक जाए, जब एक तिनके भर का सहारा भी बहुत हो सकता है,  धीरज के दो शब्दों की जगह ताने सुनने को मिले । व्यक्ति टूट जाता है । इस टूटन को आप बहुत शिद्‍दत के साथ महसूस करते हैं कालीचाटको देखकर ।

अब कुछ बातें उस किताब के बारे में भी जिसे पढ़कर इस फिल्म को देखने का संयोग बना । फिल्म बनती है...और बनाती भी है!लेखिका सोनल की यह किताब बहुत ही रोचक है। डायरीनुमा इस किताब का प्रवाह इस कदर अच्छा है कि किताब पूरी पढे बिना आप इसे रख नहीं सकते । एक प्रसंग वे लिखती हैं – ये तो वो है जो मैं निरी गैर तकनीकी व्यक्ति समझ पाई और याद रख पाई । असल में तो मैं आपको फिल्म निर्माण से जुड़े किस्से सुना कर उस दिन के तनाव को आज के आनन्‍द में बदलना चाहती हूँ । यही आनंद एक निरा गैर तकनीकी पाठक इस किताब में फिल्म निर्माण से जुड़े किस्से पढ़कर पाता है । वह समझ पाता है कि फिल्म निर्माण कितनी मेहनत का काम है । कितने जोश और जज़्बात का । कितनी शिद्दत से कई लोगों को लगना पड़ता है एक फिल्म को बनाने में । फिल्म विश्‍वसनीय तभी बन पाती है ।

 

अंत में लेखिका सोनल के कविता संग्रह पता नहींसे एक कविता ओ किसानउद्धृत है जिसे स्व. जयप्रकाश चौकसे ने भी कालीचाटफिल्म से संबंधित अपने लेख में उद्धृत किया है –

 

      खेत खेत उचक कर चारों ओर

      देख रही है टापरियाँ

      हर खेत में बोए गए हैं कई कई मन

      और कई कई इच्छाएँ

      दादा का ऑपरेशन

      गुड्डी की शादी

      खेत में बोने को अगली फसल के बीज

 

      पुकार रहा है हर कोई

      इस खेत से उस खेत

      सुनो रे इस बार लगाओ पूरी ताक़त

      अन्न से भर दो घर आँगन-ओसार

      और बैंक का पूरा करजा !

 

             ***

 

फिल्म कालीचाट का यूट्‍यूब लिंक :  https://youtu.be/p5X4txu9ye0?feature=shared

 

फिल्म बनती है...और बनाती भी है’, लेखिका – सोनल –  amazon एवं neolitpublications  (neolit.in)

 

कालीचाटउपन्यास, लेखक – सुनील चतुर्वेदी – amazon एवं antikaprakashan.com पर उपलब्ध.

बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

बेबाक II


 बेबाक  II 



बेबाक फिल्म इतना असर क्यों डालती है ?  फिल्मों में अपने धर्म ( religion) के विरुद्ध जाने वाले किरदार या तो प्रेमी- प्रेमिका होते हैं ,  या किसी के प्राणों की रक्षा करने के लिए  वे धर्म से ऊपर उठ जाते हैं, या फिर दकियानूसी रीति रिवाजों का मजाक उड़ाते पात्र होते हैं जो आवांतर में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर रहे होते हैं । बेबाक ऐसा कुछ नहीं करती है । जीवन में और अपनी पढ़ाई में आगे बढ़ने में मिलने वाली बाधाओं का मुकाबला करती एक लड़की ,  जो अपने पिता से, माँ से या फिर धर्म की नसीहत देने वाले और मदद के एवज़ में अपनी शर्तें मनवाने वाले पोज़िशन पर बैठे व्यक्ति से, किसी से भी सही सवाल करने से नहीं हिचकती। वह लड़की आपकी दया या सहानुभूति का पात्र नहीं बनना चाहती । वह बस अपने हिस्से की स्वतंत्रता चाहती है। अपनी मर्ज़ी से पढ़ने, ओढ़ने- पहनने, आगे बढ़ने की स्वतंत्रता। वह यह भी जानती है बात उसके एक अकेले की नहीं है, आने वाली पीढ़ियाँ भी उसे उम्मीद के साथ देख रही हैं। 


फिल्म की निर्देशक शाज़िया चाहतीं तो फ़ातिन के पात्र को लार्जर दैन लाइफ़ बना सकती थीं , लेकिन वे जानती हैं कि ढोल पीटने से ज्यादा अच्छा है काम को अच्छे तरीके से किया जाए ।  एक आम व्यक्ति की लड़ाई आम व्यक्ति के तरीके से ही हो सकती है। फिल्म के शुरुआती दृश्य में ही जब तीन बहनों का अकेला भाई यह बोलता है कि " क्या लड़के बोल नहीं सकते इस घर में " तो लैंगिक समानता का मुद्दा जैसे हँसते हँसाते बराबरी का मामला बन जाता है । यह आज की पीढ़ी के नए लड़के लड़कियों का सोच है । जिसे फिल्म में बड़ी खूबसूरती के साथ अंकित किया गया है। 


फिल्म में बहुत छोटे छोटे क्रिया कलापों से निर्देशक ने संवादों या वक्तव्यों का काम लिया है। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी द्वारा फाइल का मेज़ पर थोड़ा पटक कर रखना, चेक पर साइन कर के वापस दराज़ में रख लेना, उसी दौरान विपिन शर्मा का चेक पाने की आशा में हाथ बढ़ाना और फिर खुद को रोक लेना, विपिन शर्मा द्वारा घर पर प्याज काटना और साथ ही साथ बेटी के एक बार हिजाब में चले जाने की वकालत करना -- पूरी फिल्म ही इस तरह के सीक्वेन्स/ दृश्यों से बुनी हुई है जिससे फिल्म का जो बड़ा संदेश है वह खुद ही प्रकट हो जाता है। 


शोले या दीवार पर चर्चा करते हुए जावेद अख्तर एक इंटरव्यू में कहते हैं कि फिल्म की कहानी/ स्क्रिप्ट पर रिसर्च हुए हैं कि किस तरह कहानी बनाई गई, उसका कहाँ और कैसे असर हुआ आदि आदि ।  वे कहते हैं कि जब वे उन फिल्मों को लिख रहे थे तो उन्हें यह इल्म थोड़े ही था कि किस बात को रखने से क्या असर होगा। वे तो उस समाज, उस परिवेश उस जीवन के बारे में लिख रहे थे जिसका वे हिस्सा थे और जिसे लिखकर उन्हें अच्छा लग रहा था ।  वे आगे कहते हैं कि लेखक कोई बाहर बैठा हुआ व्यक्ति नहीं है जो बाहर से समाज को देख रहा है । वह तो उसके अंदर से निकला हुआ आदमी है । 'बेबाक' को लिखा है फिल्म  की निर्देशक शाज़िया इकबाल ने ही और जावेद साहब की बातें उन पर अक्षरश: लागू होती हैं। वरना यह फिल्म इतनी अपनी लगे यह संभव ही नहीं था । 


मंगलवार, 3 अक्टूबर 2023

बेबाक : शाज़िया इकबाल की बेहतरीन शॉर्ट फिल्म


 


बेबाक  : स्वधर्मे निधनं श्रेय:


कुछ दिन पहले अभिनेता के के का एक इंटरव्यू देख रहा था जिसमें उन्होंने स्वधर्म की बात की थी। तब श्रीमद् भगवद्गीता की एक पंक्ति याद आई थी ' स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह'। जियो सिनेमा पर चल रहे जागरण फिल्म फेस्टिवल में 20 मिनट से भी कम लंबी एक फिल्म को देख कर यह पंक्ति फिर याद आई। फिल्म का नाम है ' बेबाक' जिसकी निर्देशक हैं शाज़िया इकबाल। एक छोटी सी फिल्म कैसे एक बड़ी बात कह जाती है इसका सटीक उदाहरण है 'बेबाक' । यह फिल्म अपने तरीके से स्वधर्म को परिभाषित करती है। फिल्म की मुख्य किरदार फ़ातिन अपने स्वधर्म की तलाश और उसकी रक्षा में है। वह सवाल करती है, विरोध करती है, अपनी सीमाओं को पहचानती है और अंततः उन सीमाओं का अतिक्रमण कर विजयी भाव से अपनी राह पर चल पड़ती है। 


फिल्म एक मुसलमान परिवार और उसके समाज के विचारों के अंतर्विरोधों को सामने रखती है। धर्म का कोई वितंडा खड़ा किए बिना। लाउड हुए बिना। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी द्वारा निभाया गया किरदार लेखन या अभिनय में ज़रा भी कमी होने से ओछेपन को प्राप्त हो जा सकता था, लेकिन होता नहीं बल्कि यह किरदार एक रूढ़िवादी चरित्र और विचारों को उतने ही मजबूत तरीके से सामने रखता है जितने मजबूत तरीके से फिल्म की मुख्य पात्र अपने विचार रखती है। असहज कर देने वाले सवाल पूछती है। घर में भी और बाहर भी। 


फिल्म की कहानी एक मुसलमान परिवार के इर्द गिर्द बुनी गई है लेकिन इसकी अपील यूनिवर्सल है। पात्रों के नाम, इबादत का तरीका, स्कूल में दिखाए गए पहनावे को बदल दीजिए, कहानी कहीं की भी हो सकती है। फिल्म का एक संवाद है " औरतों की मॉडस्टी वाली बात तो सेक्यूलर है " । कितनी तीखी बात है और कितनी सच ! निदा फ़ाज़ली का एक शेर है - 


हिन्दू भी सुकूँ से है मुसलमाँ भी सुकूँ से

इंसान   परेशान  यहाँ  भी  है   वहाँ  भी


यही इंसान है जो आखिर में बचता है  । 


फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है। फिल्म के संवाद आम घरों की बोलचाल जैसे हैं, इसलिए दर्शक से जुड़ाव पैदा कर लेते हैं। फिल्म होते हुए भी यह फिल्म फिल्मी नहीं लगती। सिर्फ एक दृश्य जिसमें फ़ातिन की माँ उससे कहती है कि तुझे जो सही लगता है वही कर, थोड़ा- सा फिल्मी हो गया है संभवत: । 


सारा हाशमी, विपिन शर्मा, शीबा चड्ढा सबों का अभिनय सधा हुआ है। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की वजह से फिल्म को एक ज़रूरी वज़न मिलता है। जो फिल्म किसी भी एक पक्ष की ओर झुक सकती थी, बैलेंस में रहती है। कहते हैं फिल्म निर्देशक का माध्यम ( Director's medium) है, शाज़िया इस बात को बेहतरीन तरीके से सिद्ध करती हैं। एक फीचर फिल्म या ओ टी टी वेब सीरीज़ जो काम घंटों का समय लेकर कर पाते, फिर भी शायद उस सफलता के साथ नहीं कर पाते जितनी सफलता के साथ शाज़िया इकबाल की बीस मिनट से भी कम की यह शॉर्ट फिल्म कर जाती है। 


आनेवाला समय क्या शॉर्ट फिल्मों का है? 'बेबाक' को देख कर यह ज़रूर कहा जा सकता है। 


रविवार, 10 सितंबर 2023

सच का एक क्षण


 सच का एक क्षण :

      पूर्वार्द्ध

(फिर से 'दिल चाहता है' देखते हुए ) 

___________________


तुम

इतनी सुंदर

कैसे लग सकती हो

प्रीति ज़िंटा  ! 

इतनी सुंदर !! 


कि

अगस्त की बादलों भरी

एक सूनी दोपहर

जब मन यूँ ही उदास बैठे रहना चाहे

खिलखिला उठे

सूरजमुखी के फूलों की तरह

तुम्हारी तरह... 


दुनिया भर की

अच्छी बातें

एक के बाद एक

याद आती चली जाएँ

हर उस बात को 

रास्ते से अलग करते

जिनसे मन दुखता हो


यह जानते हुए भी

कि हर सपना सच नहीं होता

मन फिर सपना बुने

कि जब तुम पूछो

" सोचो, कौन है वो जिसके साथ

एक पल बिताने के लिए

तुम्हें

हज़ार मौत कबूल है "

सहसा समझ में आए

प्रेम

प्रेम कि जिसको

ज़रा- सी चोट खाने पर भी

एक  हल्की बात बना देते हैं लोग

जाने अनजाने


होने को

हिकारत भरी नजरें भी हैं

लोभ भी, स्वार्थ भी

अहं, अहंकार भी

दुनिया में क्या नहीं है ? 

लेकिन प्रेम

प्रति- फल नहीं 

प्रति- दान नहीं 

प्रति- उपहार नहीं है


कैनवास पर 

अधूरी रह जाती है

पेंटिंग कोई

शेर अधूरा रह जाता है

एक मिसरे की तलाश में

तो कभी

प्रेम होकर भी

नहीं हो पाता मुकम्मल


तर्क की बात यह है

कुछ भी किसी का नहीं

कि कुछ भी तो तुम्हारा भी नहीं

यहाँ तक कि यह किरदार भी

सब झूठा है  ! 

जगत् मिथ्या है  ! 

लेकिन

प्रेम तो सच ही होता है  ! 

प्रेम व्यक्ति को

सुंदर बनाता है

जीवन को जीने के योग्य 


जो यह हँसी है तुम्हारी

इतनी सुंदर

उससे सच्ची बात क्या है भला  !! 


फिर तुम तो

हर फ्रेम में सुंदर दिखती हो

यहाँ तक कि उदासी वाले पलों में भी

और यकीं मानो

मैं नहीं मानता, मैं नहीं चाहता ज़रा भी

कि दुनिया की किसी भी लड़की को

उदास होना चाहिए, दुखी रहना चाहिए

दुनिया के चेहरे पर जो पानी है

उसे

सूखना नहीं चाहिए

ज़रा भी

कभी भी, कहीं भी

जानती हो क्यों  ? 


अपनी नाकामियों से

अकेलेपन से

अपनी उदासी से

भागता है आदमी

लड़ता है रोज के रोज

लड़ना पड़ता है 

जीने के लिए

दुनिया की उदासीनता से

निराशा, हताशा से अपनी

तब

ऐसी ही

अगस्त की एक

उदास सूनी दोपहर

भर जाती है कहीं 

तुम्हारी सुंदरता से

जग सुंदर हो जाता है

भर जाता है मन

कृतज्ञता से --

दुनिया कितनी सुंदर है  !! 

क्षुद्रताएँ सारी 

विसर्जित होने लगती हैं

तुम्हारी हँसी की

रश्मियों में

छलकती हुई

फूटती हुई आभा में 

खुशी की --

सिखाने से तो नहीं होता है सब  ! 

तुम कौन हो  ? 

कैसे हो सकती हो तुम

इतनी सुंदर  ?!! 


कहने वाले कह सकते हैं

दुनिया भर में बवाल मचा है

दुनिया भर का

और तुम्हें फिल्म की पड़ी है  ! 

बात तो यह सही है

और यह भी 

दुनिया कितनी सुंदर बची है

अब भी  ! 

अगर वे देखें 

तो समझें

और सोचें

कि " कौन है वो जिसके साथ

एक पल बिताने के लिए

हजार मौत कबूल हो ?"

कि वे भी 

किसी के लिए

ऐसे क्यों नहीं  ? 


प्रेम 

क्षण में समाहित सच है

सच का एक क्षण है

परम् , निरपेक्ष

क्षण भर भी

प्रेम

बहुत है

इस जीवन को

सुंदर बनाने के लिए


उस क्षण की झलक

दिखलाती हो

तुम इतनी सुंदर हो

प्रीति ज़िंटा  ! 

इतनी ही सुंदर  !! 


।।। 

सच का एक क्षण :

     उत्तरार्द्ध

 ___________


लॉन की

ओस नहाई घास- सी

अहले सुबह की लाली- सी

अभी- अभी खिले लाल

उड़हुल के फूल- सी 

तरोताज़ा, 

कोमल, स्निग्ध

कितनी सुंदर  ! 

तुम

जग के अंतर को

सुंदर करती ! 

किसी भावी पिता की

इच्छा- सी

मन्नत- सी मन की


हरसिंगार के

उजले केसरिया फूल

चुपचाप बना देते हैं 

सुंदर 

धरती को

देखा होगा

किसी न किसी सुबह

कभी न कभी

कहीं न कहीं

और यदि नहीं, तो

बहुतों ने

तुमको भी नहीं देखा होगा

नहीं देखा होगा

हरसिंगार के फूलों को

घर के पूजाघर में भी


कितने सूरज निकल पड़ते हैं

जब बेटियाँ निकलती हैं

हँस उठते हैं सूरजमुखी कितने

बेटियों के

हँसने- मुस्कुराने में


घर - बाहर

नैहर- ससुराल

सँभालते हुए

सँवारते हुए

कहाँ से कहाँ 

पहुँच रही हैं

बेटियाँ


आत्मविश्वास से भरी

जो तुम हँसती हो

दमकती हो

सुंदर, 

कितनी सुंदर लगती हो  ! 

गहनों से लदने का

अब कहाँ फैशन है

आत्मविश्वास ही

सबसे बड़ा आभूषण है

जानती हैं बेटियाँ

और तुम भी  ! 


लेकिन

जब मैं यह सोच रहा हूँ

तो साथ- साथ

यह भी सोच रहा हूँ

कि हँसने- मुस्कुराने

सँवरने- सँवारने

खुली हवा में साँस लेने के लिए

हमने जगह कहाँ छोड़ी है

जहाँ पहुँची हैं बेटियाँ, तो

अपने दम से

हमारे होने के कारण नहीं

हमारे होने के बावजूद


कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता

जब खबरों से

मन सिहर न उठता हो

कोई राह नहीं दिखती, जो 

नज़रों से, फ़िकरों से

छिली हुई नहीं हो


हमीं ने तो 

बना रखा है चलन

'पर- रुच सिंगार' का

हमीं ने तो

रचा है यह षड्यंत्र

कि लड़कियों को लड़कों की 

बराबरी करनी है

दूसरों की अर्जित सफलता को

उनकी क्षमताओं का मापदंड

हमीं ने तो बनाया है

पिता और पति के

नाम का वजन

हमीं ने तो डाला है उनके माथे पर

उनके नाम को गुमाने को


और तब उदास पाता हूँ

प्रीति ज़िंटा तुमको  ! 

जानता हूँ

यह तुम नहीं, सिर्फ एक किरदार है

और यह झूठा है 

मगर इस उदासी में सच है

हम सबको पता है


यह उदासी

हर उस लड़की की है

जिसके मन में

अपने निर्णयों को लेकर संशय है

आत्म- ग्लानि है 


बस एक किरदार ही सही, मगर

तुम्हें क्यों चाहिए

एक तारनहार

दूसरों के हाथों ही

क्यों हो तुम्हारा उद्धार  ? 


आत्मविश्वास से भरी

बढ़ती 

आँख मिलाती 

मुस्कुराती 

हाथ मिलाती 

कितनी सुंदर लगती हो  ! 

परिदृश्य बदल जाता है

क्षण भर में

सारी मुश्किलें परे हो जाती हैं


तुम्हारी मुस्कुराहट में

ताकत है, 

सबसे बड़ी ताकत --

परस्पर विश्वास

जो जग उठता है

संग- संग मुस्कुराती आँखों में

जब तुम मुस्कुराती हो


क्षण में

छुपे मिल जाते हैं सूत्र

जीवन को

सुंदर बना जाने के

जिस क्षण

मुस्कुराती हो

तुम इतनी सुंदर लगती हो  !! 


सुंदर लगती है

हर बेटी

मुस्कुराती हुई  !!