गुरुवार, 4 जून 2026

अपनी मुहब्बत में परेशान तो न कर

 

अपनी मुहब्बत में परेशान तो न कर

         [* फ़ैज़ साहब से क्षमाप्रार्थना के साथ ]

 

और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा*

अपनी मुहब्बत में परेशान तो न कर

 

हम देखेंगे

तुम भी देखो

कि तुम ही नहीं हो, हम भी हैं

कि हम ही नहीं हैं, तुम भी हो

 

कैसी कितनी है लाचारी

तारी है क्यों ये बेकारी

कि ज़िम्मेदार तो सब ही हैं

कि हम भी हैं और तुम भी हो

 

ज़ुल्मो-सितम के बदले में

ज़ुल्म ही हो ये ठीक नहीं

ज़िम्मा अपना अपना ले लें

कुछ हम बदलें, कुछ तुम बदलो

 

चलना तो आगे बढ़ना है

बढ़ने की कोशिश करना है

जिनके हाथों में सब कुछ है

वहीं, उस जगह पर तुम भी हो

 

रोटी से बढ़कर क्या है कहो

रोज़ी से बढ़कर क्या है कहो

इज़्ज़त से जीना चाहे जो

बस हमीं नहीं हैं तुम भी हो

 

हर बात ज़रूरी होगी, पर

पहले क्या हो ये तय तो हो

उनकी भी मर्ज़ी सोचो ज़रा

मर्ज़ी से जिनकी तुम भी हो

 

ऐसा न करो कि कल को यहाँ

ऐसा हो कुछ भी याद न हो

नूरे-नज़र यही दो दिन को

सब थे यहाँ और तुम भी हो

 

मुद्दे से सब हैं भटक रहे

कि मुद्दा कोई था ही नहीं

रोटियाँ सेंकने वालों में

'गर वो भी हैं तो तुम भी हो

 

मुट्ठी भर ही बनाते हैं, देखो

मुठ्ठी भर ही मिटाते हैं, देखो

ये ‘मुट्ठी भर’ हैं कौन यहाँ

देखो, समझो, तो तुम भी हो

 

आग लगा दें जी चाहे

याकि भगा दें जी चाहे

'गर एक तरफ़ हैं लोग ग़लत

तो, एक तरफ़ तो तुम भी हो



हम खाली हैं

 

दर-दर भटकें

माथा   पटकें

कि सवाली हैं

हम खाली हैं

स्कूल   कॉलेज

काम   न   धंधा

कला कि कौशल

जाने   क्या - क्या

सब खाली हैं

हाँ, खाली हैं

पढ़ना- लिखना

चौपट सबकुछ

चौपट सबकुछ

जीना - मरना

बस खाली हैं

सब खाली हैं

साफ  सफर है

बस यह डर है

बरगलवा दें

भटका ना दें

कि बवाली हैं

क्या खाली हैं ?

इस घेरे के

उस घेरे के

अपना- अपना

मतलब  ले के

क्या हाली हैं !

क्या खाली हैं !

आग किसी की

तवा किसी  का

रोटी किसकी

रखो यह पता

कुछ थाली हैं !

हम खाली हैं

जो चुप बैठे

तो समझे थे

मरते-खपते

बस करते ये

हम्माली हैं

हम खाली हैं

सच परतों में

सच खतरे में

बन,जो करते

हर हालत में

रखवाली हैं

जो खाली हैं

शिष्ट नहीं हम ?

आहत हैं हम

बैद सचिव गुरु

सब हैं बे-दम

सब जाली हैं

हम खाली हैं

कब है रहता

अहं किसी का

चींटियाँ मिलीं

शक्कर-ढेली

कि उठा ली हैं

पर, खाली हैं !

वे क्या चाहें

बढ़ना चाहें

इतना गुस्सा

इतनी आहें

सम्हाली हैं

वे खाली हैं

जिनसे लड़ना

जमकर लड़ना

उन्हें बताना

हनुमत् बनना

जो बाली हैं

कि बवाली हैं

हम खाली हैं

कि सवाली हैं



रविवार, 31 मई 2026

हँसोतले चलीं...

 

हँसोतले चलीं...

 

काल्हे एगो कविता लिखाइल रहे “ हँसोत लीं” । लेकिन लागऽता बात पूरा नइखे भइल । त कुछ औरि बात कइल जाव।

आज के जुग में हँसोतला से कोनो के फुरसते नइखे । ई सहियो बा बात । जे सौंसे दुनिया पगलाइल बा, त एक आदमी के कहला अ चहला से का होई ? अकेला चना कब्बो भाँड़ फोड़ेला का !

रउआ देखीं कि इ दुनिया में कुछो नइखे धरल हँसोतला के अलावा।

कवनो औफिस में जाईं । सौ में निनानबे चांस बा कि उहे काम करावे खातिर रउआ के चढ़ावा चढ़ावल परी जेकरा खातिर उ आदमी के वेतन मिलेला । उ कही कि उ अपने खर्चा-पानी दिहला के बाद पोस्टिंग करौले बा । पूरा सिस्टम बनल बा। रउआ बीच में पिन ना मारीं ।

जाईं, इसकूल चल जाईं । एक से एक फैसनेबल इसकूल । पढ़ाई के मतलब का इ रंगबिरंगा डरेस, टाई-फाई, कम- से-कम दू तरे के जुत्ता होला ? फीस के बात त छोड़िए दीं । का होखता; बच्चा अ बच्चा के माय-बाप के सपना बेचल जाता । बिना कवनो गैरेंटी के । बात हिहवेँ नइखे रुकत । दुनिया भर के कोचिंग खोल लेले बाड़ऽ सन । बच्चा-कलास से ले के यूपीएससी के तैयारी खातिर तक ले । का हम नइखी जानत कि ई सब खेला खाली भावना के साथ खिलवाड़ ह । लोग के हँसोते के बा, खलिया हँसोते के बा ! ना त बताईं , सरकार शिक्षा पर कतना खरचा करेली ! मास्टर औरि पोरफेसर लोगिन कलसवा में मन लगा के पढ़ावत होखतें त का बच्चा लोग ना पढ़ीत ? शिक्षा व्यवस्था में जेतना गैप बन गइल बा, कोचिंग के व्यवस्था ना होखित  त पूरा व्यवस्था बैठ गइल होखित । कोचिंग के सपोर्ट सिस्टम के रोल रहे, सरकारन के उदासीन रहला से पूरा सिस्टमे बन गइल बा ।अब त अइसन माहौल बन गइल बा कि जे कोचिंग ना जाई ओकर कंफिडेन्‍स गड़बड़ा जाई । बच्चा त बच्चा गार्जियन लोग के भी ।

चल जाईं बैंक । हो सकेला कि सीधासाधी लेनदेन के बात ना होखो । लेकिन एतना तरे के चीज बेचे लागिह सन – हइ इंसोरेंस, त हउ इंसोरेंस, मुचुअल फंड, ई कार्ड त ऊ कार्ड । कतना चीज के मना कर पाइ लोग ? वइसेहु आपन काम फँसल रहेला त लोग सही-गलत डिमांड मान लेवेला । का बैंक के  हँसोतल ना ह ई ?

हमनी खुद आपन बेवहार के तनि ठीक से देखीं त अपनो हँसोतल दिखाई दी । सामान जमा करे के लत हमनी में नइखे का? बजार जानेला हमनी के पाकिट से माल झारल । बड़-बड़ स्टोर में हर चीज के बड़-बड़ पैकेट दिखाई दी । देखादेखी, बड़ आदमी दिखे के चाह में हम बिना सोचले उठा लेवेनी । ई दुतरफा हँसोतल बा । एक तरफ त हम जरुरत से ज्यादा सामान खरीदनीं, दूसर तरफ उ कम्पनी ज्यादा माल बेच ली । कहीं- कहीं इहो देखल जाला कि सामान सड़ जावे त सड़ जावे , कवनो के दिलाई ना । लोग के ई हाल हो गईल बा कि जे सब कुछ खवला पार ना लागि त कम-से-कम जुठाइए के छोड़ल जाए !  लोग के नजर एकदम से एकदम खाली अपना पर गड़ल बा ।

हम साहित्‍त के बड़ी पाक-साफ बूझत रहनी । राजनीति के मशाल, अंतरात्मा के अवाज । सब ढकोसला बा जादातर । इहवाँ हँसोतला के अलगे डिजाइन बा । जेतना नाम-धाम बा, जेतना पुरस्कार-उरस्कार बा, सब कुछे लोग के मिलल चाही । एतना ऊँचा कुरसी पर बइठ के बतियावे ला लोग कि उनका देखे ही में गरदन दुखा जाइ । जे बोलिहऽ सन सब ‘परम सत्य’ होई , एकदम नम्बर एक !  भले ही भीतर खाली होखे, बहरि हाउसफुल के ही बोर्ड लगावल जाला । हिन्‍दी में कहल जाला न ‘अनधिकार प्रवेश निषेध’ औरि ‘प्रवेश सिर्फ आमंत्रण द्वारा’ । एगो जिमखाना कलब के किस्सा आजकल चलतो बा !

हम त कहेनीं जल्दी-जल्दी हँसोतल सीख लीहीं । दुनो हाथन से । मन से एकदम मान लीं कि आज के इहे रीत बा । रीत निभावल चाही । ई में बहुत लोग सुखी रही । आजकल मन के शान्ति बड़ी जरूरी बा । ई एथिक-फेथिक, साँच-झूठ, जुलुम-अपराध आदि इतादि किताब में पढ़ल ठीक बा, जिनगी में उतरला से कष्‍ट हो जाई ।

**

 [भोजपुरी मुझे कितनी आती है, कह नहीं सकता । बचपन में बिहार के कई जिलों में रहने का मौका मिला तो हर जगह की कुछ चीजें साथ रह गईं  भोजपुरी के साथ ऐसा हुआ कि इसके बिना काम नहीं चलना था । ऐसा कह सकते हैं कि भोजपुरी में ही मैं अपने रंग में आया । ‘बेतिया’ में गुजरे चार साल ही जीवन का आधार बने हुए हैं । भोजपुरी उनमें से एक है । अत: भोजपुरी में अभिव्यक्ति की इच्छा स्वाभाविक है, कितनी सधी हुई है, पता नहीं । ]


शनिवार, 30 मई 2026

हँसोत लीं...

 

 हँसोत लीं...

 

हँसोत  लीं,  हँसोत  लीं

भर  जिनगी  हँसोत  लीं

 

करल-धरल,   होई  का

लरल-भिरल,  होई  का

थरिया बा भरल  रखल

भकोस लीं, भकोस लीं

 

रउआ   के    सोहें   जें

रउआ   के    मोहें   जें 

उनका   ना,  बाकी  के

बकोट लीं, बकोट  लीं

 

सब  जे  बा   रउए   के

होखी    जे    रउए   के

अँधार  सब  जहान  के

रउआ  सब  इजोत  लीं

 

आपन  लाभ- लोभ  से

डिगीं  तनिक न छोभ से

न  मन  के सुनीं औरि न

मन  में  तनि कचोट लीं

 

बाँटल  बा   बात   बुरा

सवारथ  ह   तेज   छुरा

छुरवे    के    तेजी    से

खसोट लीं,  खसोट लीं

 

हाँ, सीधा  जन  के मुँह

चाटेला     कुत्तवो    नु

सीधापन   के   जल  में

खुद के खुद न  बोथ लीं


गुरुवार, 28 मई 2026

साधो-माधो-बतकही २

बिहार में कहीं...

 

साधो-माधो-बतकही

२

 

साधो भाई, ई परीक्षा सब जो कैंसिल कर देता है, कितना बुरा करता है ?

अपना दिन भूल गया माधो । तीन साल के कोर्स का पाँच साल में भी पूरा होने का ठिकाना नहीं रहता था ।

लेकिन वो तो स्टेट लेवल की बात थी न , अब तो नेशनल लेवल पर खेला हो रहा है ।

स्टेट से बात बढ़ेगी तो नेशनल लेवल तक पहुँचेगी ही न । और बोल तो रहे हैं मंत्री जी और हाकिम लोग कि किसी को बकसा नहीं जाएगा । बख्शा, बख्शा !

माने कि पढ़ना-लिखना सब बेकार बात है । इससे अच्छा तो लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर होना ही है ।

हाँ । और ऊ सुने कि नहीं –  कॉपी जाँच में भी गड़बड़ी फैला दिए हैं भाई लोग ?

हाँ, विद्यार्थी होना ही पाप है भाई !

अरे भाई, समय तो कह रहा है कि कोशिश कर के नौवाँ, सतवाँ पास बने रहिए । कुछ न कुछ हो जाएगा ।

हाँ, लेकिन सबके पिताजी लोग का नाम ही तो सेम नहीं है न !! 

बुधवार, 27 मई 2026

सिद्धप्रसिद्ध उर्फ बुरलेल जी की पाती

सिद्धप्रसिद्ध उर्फ बुरलेल जी की पाती १


 आदरणीय एस पी साहब,

प्रणाम स्वीकारें ।

कहनाम यह है सर कि आपका रोल हमको बहुत अच्छा लगता है । वर्दी - उर्दी पहनकर जब आप निकलते हैं तो हमारे जैसे कितने ही लोग मुँह बाए खड़े रह जाते हैं । कभी श्रदा में, कभी आश्चर्य में और ज्यादातर एक भय में । पुलिस का भय से कोई न कोई संबंध है तो जरूर । भय को लोग इज्जत बोलकर इज्जत बचा देते हैं ! सर, वैसे भी देश के दूसरे और दुनिया के तीसरे सबसे भारी एग्जाम को पास करके आप लोग यहाँ तक पहुँचते हैं । कभी कभी तो देश के सबसे भारी और दुनिया के दूसरे सबसे भारी एग्जाम को पास कर के, चार साल में पढ़- लिख के आपलोग फिर तीसरे सबसे भारी एग्जाम को भी पास कर लेते हैं । ऐसी बात जब - जब हम पढ़ते - सुनते हैं , तब - तब हमको लगता है कि ज्ञानी लोग ठीक ही कहते हैं कि हमारे देश की सभ्यता पाँच हजार साल पुरानी है । 


सर ,आपलोग तो ऐसे ही एकदम स्मार्ट लगते हैं । उस पर से गाड़ी, बॉडीगार्ड, बंदूक,सायरन -- ये सब आपके स्मार्टनेस को और बढ़ा देते हैं । आपको शायद अंदाजा नहीं होगा कि लोग आपसे कितना मिलना चाहते हैं । चाय - नाश्ता करने के लिए नहीं सर, अपने काम के लिए, किसी जरूरत के लिए । किसी परेशानी में ही आप की याद आती है हमें । लेकिन सर आपसे मिलने की प्रक्रिया कठिन है । यह भी सही है कि आप भी कितने लोगों से मिल पाएँगे।  लेकिन सर एक बात कहनी है -- आप तो खुद ही इतने ऊँचे पद पर आसीन हैं , आपको खुद को बड़ा जताने की कितनी जरूरत है । अभी उसी दिन एक वृद्ध प्रोफेसर आपसे मिलने आए थे । आपके स्टाफ ने उनका टिपटिपिया फोन बाहर रखवा लिया । सुरक्षा के कारणों से सही ही होगा । लेकिन अंदर आपके बड़े से कमरे में, आपकी उमर के दोगुने से भी ज्यादा उमर के प्रोफेसर हाथ जोड़े खड़े निवेदन करते रहे । आप समझ नहीं पा रहे थे कैसे रिएक्ट करें ।आप वैसे ही बैठे रह गए, वे वैसे ही करबद्ध खड़े । हम आपको दोष नहीं दे रहे हैं । हो सके तो आप भी सोचिएगा कि ऐसी स्थिति के जिम्मेदार कौन हैं । प्रजा तो है ही, विधायिका और कार्यपालिका भी है । जनता हमेशा नत - विनत ही खड़ी रह जाती है । आप या और भी साहब लोग ठीक से बात भी कर लेते हैं तो हम धन्य - धन्य हो जाते हैं । चौराहे की लालबत्ती को हाकिमों की गाड़ी न काटे, या उनके लिए सिग्नल न बदला जाए तो जनता वैसे हाकिमों को बड़ेदिलवाला मान लेती है। जनता की इतनी निरीहता अच्छी है क्या ? आप तो जैसे- जैसे ऊपर बढ़ेंगे, जनता और जमीन से दूर होकर कागजों - फाइलों के नजदीक होते जाएँगे। आप लोग देश के मौर - मुकुट हैं । आपको हम बड़ी अपेक्षा के साथ देखते हैं । इन दिनों समाज के हर तबके के चाल - चरित्र में गिरावट आई है ,जिसका एक बड़ा कारण है भ्रष्टाचार। आपका महकमा भी अछूता नहीं रह गया है । हमारी हैसियत तो नहीं है कि हम कुछ सीख दे सकें । वैसे भी जब सारे लोग भ्रष्ट हो जाएँ तो फिर कोई भी भ्रष्ट नहीं माना जाता । जानते हैं ,यह हमारा निराशावादी स्वर है । लेकिन अब यही है सर !


आप बोलिएगा भी कि हम क्या बोले जा रहे हैं । बात यह है सर कि देश के एक वृद्ध प्रोफेसर को देश के सबसे योग्यतम अधिकारियों में से एक से मिलने के लिए चिरौरी करनी पड़े, इंतजार करना पड़े और जब मिलने का मौका आए तो इतना झुक के अपनी बात रखनी पड़े कि लगे रीढ़ की हड्डी ही नहीं है शरीर में , तब बड़ी निराशा- सी होने लगती है । मन डूबने लगता है।  जानते हैं कि हर तरफ यही हाल है। हम कोशिश करेंगे कि सबको चिट्ठी लिखें । बचपन से वर्दी और बाघ - छाप बैच लगाने का बड़ा शौक रहा है, इसलिए पहली पाती एक वर्दी वाले को ! 


एक फिल्म के एक गीत के ही दो वर्जन याद आ रहे । सुनिए --


हर तरफ जुर्म है बेबसी है

सहमा सहमा सा हर आदमी है


इसी गीत के दूसरे version की ये पंक्तियाँ--


हम न सोचें हमें क्या मिला है,

हम ये सोचें किया क्या है अर्पण

फूल खुशियों के बांटें सभी को, 

सबका जीवन ही बन जाए मधुवन


बाकी सब कुशल - मंगल । 


शेष फिर,


आपका अपना

सिद्धप्रसिद्ध 

उर्फ बुरलेल जी


***
मैथिली में 'बुरलेल' आमतौर पर एक ऐसे व्यक्ति के लिए उपयोग किया जाता है जो मूर्ख, नासमझ, बुद्धिहीन, या बेवकूफ हो। कभी-कभी इसे बहुत सीधे-साधे या मंदबुद्धि व्यक्ति के संदर्भ में भी इस्तेमाल किया जाता है

शुक्रवार, 22 मई 2026

कुछ छंद में - ५ : यादें

 कुछ छंद में - ५ 

      यादें

कुछ  ऐसी  बातें   होती  हैं
पलकें  मूँदे  जो   सोती  हैं
यादों के गलियारे में

इक नाम  कहीं से आता है
हल्के  से  छूके   जाता   है
लौ जगती अँधियारे में

दिन जीवन के बढ़  जाते हैं
जब फूल कहीं कढ़ जाते हैं
यादों के उजियारे में

हँसती है  कभी बिगड़ती है
समझो,  ऐसे ही  करती  है
किस्मत बात इशारे में

***


बचपन की यादें हैं
हमको सहलाती हैं
इस मुश्किल जीवन में
हमको बहलाती हैं

तुम अपने रस्ते पर
हम अपने रस्ते पर
यादें आकर फिर से
हमको मिलवाती हैं

हम अच्छे बच्चे थे
हम अब भी अच्छे हैं
जब भी आती हैं ये
हमको बतलाती हैं

यह झूठी दुनिया है
यह सच है बिल्कुल सच
यादों में आँखें हैं
सच को झुठलाती हैं

अब भी कर सकते हैं
हम ही कर सकते हैं
दुनिया हम बदलेंगे
सपने दिखलाती हैं

मन के घर- आँगन की
खिड़की खुल जाती है
बचपन की गलियों में
यादें बलखाती हैं   

                          छंद -५