रविवार, 10 सितंबर 2023

सच का एक क्षण


 सच का एक क्षण :

      पूर्वार्द्ध

(फिर से 'दिल चाहता है' देखते हुए ) 

___________________


तुम

इतनी सुंदर

कैसे लग सकती हो

प्रीति ज़िंटा  ! 

इतनी सुंदर !! 


कि

अगस्त की बादलों भरी

एक सूनी दोपहर

जब मन यूँ ही उदास बैठे रहना चाहे

खिलखिला उठे

सूरजमुखी के फूलों की तरह

तुम्हारी तरह... 


दुनिया भर की

अच्छी बातें

एक के बाद एक

याद आती चली जाएँ

हर उस बात को 

रास्ते से अलग करते

जिनसे मन दुखता हो


यह जानते हुए भी

कि हर सपना सच नहीं होता

मन फिर सपना बुने

कि जब तुम पूछो

" सोचो, कौन है वो जिसके साथ

एक पल बिताने के लिए

तुम्हें

हज़ार मौत कबूल है "

सहसा समझ में आए

प्रेम

प्रेम कि जिसको

ज़रा- सी चोट खाने पर भी

एक  हल्की बात बना देते हैं लोग

जाने अनजाने


होने को

हिकारत भरी नजरें भी हैं

लोभ भी, स्वार्थ भी

अहं, अहंकार भी

दुनिया में क्या नहीं है ? 

लेकिन प्रेम

प्रति- फल नहीं 

प्रति- दान नहीं 

प्रति- उपहार नहीं है


कैनवास पर 

अधूरी रह जाती है

पेंटिंग कोई

शेर अधूरा रह जाता है

एक मिसरे की तलाश में

तो कभी

प्रेम होकर भी

नहीं हो पाता मुकम्मल


तर्क की बात यह है

कुछ भी किसी का नहीं

कि कुछ भी तो तुम्हारा भी नहीं

यहाँ तक कि यह किरदार भी

सब झूठा है  ! 

जगत् मिथ्या है  ! 

लेकिन

प्रेम तो सच ही होता है  ! 

प्रेम व्यक्ति को

सुंदर बनाता है

जीवन को जीने के योग्य 


जो यह हँसी है तुम्हारी

इतनी सुंदर

उससे सच्ची बात क्या है भला  !! 


फिर तुम तो

हर फ्रेम में सुंदर दिखती हो

यहाँ तक कि उदासी वाले पलों में भी

और यकीं मानो

मैं नहीं मानता, मैं नहीं चाहता ज़रा भी

कि दुनिया की किसी भी लड़की को

उदास होना चाहिए, दुखी रहना चाहिए

दुनिया के चेहरे पर जो पानी है

उसे

सूखना नहीं चाहिए

ज़रा भी

कभी भी, कहीं भी

जानती हो क्यों  ? 


अपनी नाकामियों से

अकेलेपन से

अपनी उदासी से

भागता है आदमी

लड़ता है रोज के रोज

लड़ना पड़ता है 

जीने के लिए

दुनिया की उदासीनता से

निराशा, हताशा से अपनी

तब

ऐसी ही

अगस्त की एक

उदास सूनी दोपहर

भर जाती है कहीं 

तुम्हारी सुंदरता से

जग सुंदर हो जाता है

भर जाता है मन

कृतज्ञता से --

दुनिया कितनी सुंदर है  !! 

क्षुद्रताएँ सारी 

विसर्जित होने लगती हैं

तुम्हारी हँसी की

रश्मियों में

छलकती हुई

फूटती हुई आभा में 

खुशी की --

सिखाने से तो नहीं होता है सब  ! 

तुम कौन हो  ? 

कैसे हो सकती हो तुम

इतनी सुंदर  ?!! 


कहने वाले कह सकते हैं

दुनिया भर में बवाल मचा है

दुनिया भर का

और तुम्हें फिल्म की पड़ी है  ! 

बात तो यह सही है

और यह भी 

दुनिया कितनी सुंदर बची है

अब भी  ! 

अगर वे देखें 

तो समझें

और सोचें

कि " कौन है वो जिसके साथ

एक पल बिताने के लिए

हजार मौत कबूल हो ?"

कि वे भी 

किसी के लिए

ऐसे क्यों नहीं  ? 


प्रेम 

क्षण में समाहित सच है

सच का एक क्षण है

परम् , निरपेक्ष

क्षण भर भी

प्रेम

बहुत है

इस जीवन को

सुंदर बनाने के लिए


उस क्षण की झलक

दिखलाती हो

तुम इतनी सुंदर हो

प्रीति ज़िंटा  ! 

इतनी ही सुंदर  !! 


।।। 

सच का एक क्षण :

     उत्तरार्द्ध

 ___________


लॉन की

ओस नहाई घास- सी

अहले सुबह की लाली- सी

अभी- अभी खिले लाल

उड़हुल के फूल- सी 

तरोताज़ा, 

कोमल, स्निग्ध

कितनी सुंदर  ! 

तुम

जग के अंतर को

सुंदर करती ! 

किसी भावी पिता की

इच्छा- सी

मन्नत- सी मन की


हरसिंगार के

उजले केसरिया फूल

चुपचाप बना देते हैं 

सुंदर 

धरती को

देखा होगा

किसी न किसी सुबह

कभी न कभी

कहीं न कहीं

और यदि नहीं, तो

बहुतों ने

तुमको भी नहीं देखा होगा

नहीं देखा होगा

हरसिंगार के फूलों को

घर के पूजाघर में भी


कितने सूरज निकल पड़ते हैं

जब बेटियाँ निकलती हैं

हँस उठते हैं सूरजमुखी कितने

बेटियों के

हँसने- मुस्कुराने में


घर - बाहर

नैहर- ससुराल

सँभालते हुए

सँवारते हुए

कहाँ से कहाँ 

पहुँच रही हैं

बेटियाँ


आत्मविश्वास से भरी

जो तुम हँसती हो

दमकती हो

सुंदर, 

कितनी सुंदर लगती हो  ! 

गहनों से लदने का

अब कहाँ फैशन है

आत्मविश्वास ही

सबसे बड़ा आभूषण है

जानती हैं बेटियाँ

और तुम भी  ! 


लेकिन

जब मैं यह सोच रहा हूँ

तो साथ- साथ

यह भी सोच रहा हूँ

कि हँसने- मुस्कुराने

सँवरने- सँवारने

खुली हवा में साँस लेने के लिए

हमने जगह कहाँ छोड़ी है

जहाँ पहुँची हैं बेटियाँ, तो

अपने दम से

हमारे होने के कारण नहीं

हमारे होने के बावजूद


कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता

जब खबरों से

मन सिहर न उठता हो

कोई राह नहीं दिखती, जो 

नज़रों से, फ़िकरों से

छिली हुई नहीं हो


हमीं ने तो 

बना रखा है चलन

'पर- रुच सिंगार' का

हमीं ने तो

रचा है यह षड्यंत्र

कि लड़कियों को लड़कों की 

बराबरी करनी है

दूसरों की अर्जित सफलता को

उनकी क्षमताओं का मापदंड

हमीं ने तो बनाया है

पिता और पति के

नाम का वजन

हमीं ने तो डाला है उनके माथे पर

उनके नाम को गुमाने को


और तब उदास पाता हूँ

प्रीति ज़िंटा तुमको  ! 

जानता हूँ

यह तुम नहीं, सिर्फ एक किरदार है

और यह झूठा है 

मगर इस उदासी में सच है

हम सबको पता है


यह उदासी

हर उस लड़की की है

जिसके मन में

अपने निर्णयों को लेकर संशय है

आत्म- ग्लानि है 


बस एक किरदार ही सही, मगर

तुम्हें क्यों चाहिए

एक तारनहार

दूसरों के हाथों ही

क्यों हो तुम्हारा उद्धार  ? 


आत्मविश्वास से भरी

बढ़ती 

आँख मिलाती 

मुस्कुराती 

हाथ मिलाती 

कितनी सुंदर लगती हो  ! 

परिदृश्य बदल जाता है

क्षण भर में

सारी मुश्किलें परे हो जाती हैं


तुम्हारी मुस्कुराहट में

ताकत है, 

सबसे बड़ी ताकत --

परस्पर विश्वास

जो जग उठता है

संग- संग मुस्कुराती आँखों में

जब तुम मुस्कुराती हो


क्षण में

छुपे मिल जाते हैं सूत्र

जीवन को

सुंदर बना जाने के

जिस क्षण

मुस्कुराती हो

तुम इतनी सुंदर लगती हो  !! 


सुंदर लगती है

हर बेटी

मुस्कुराती हुई  !!      

मंगलवार, 21 मार्च 2023

कलाओं के तीन शिखर


                        प्रकाशक : अभिधा प्रकाशन


कलाओं के तीन शिखर : कला की दुनिया में खुलती एक खिड़की


एक पतली- सी किताब है, महज अड़तालिस पृष्ठों की। उसकी भूमिका में सुप्रसिद्ध कवि नरेश सक्सेना  ने कितनी तगड़ी अनुशंसा की है, ज़रा देखिए --" अब जब यह पुस्तक आ गई है तब साहित्य की परीक्षा के किसी भी साक्षात्कार में यह अनिवार्य रूप से पूछा जाना चाहिए कि अनीश अंकुर की इस पुस्तक के बारे में पता है या नहीं? या कम से कम इन विषयों से साहित्य का रिश्ता पता है या नहीं? नहीं पता तो फेल।"  यह किताब है ' कलाओं के तीन शिखर लियोनार्दो दा विंची, विलियम शेक्सपीयर, लुडविग वान बीथोवन' और जैसा बताया जा चुका है, लेखक हैं अनीश अंकुर। 

किताब में कला के तीन शिखर- पुरुषों पर पाँच लेख संकलित हैं। ये लेख दा विंची की मृत्यु के पंच शताब्दी वर्ष, शेक्सपीयर की मृत्यु के चार सौवें वर्ष और बीथोवन के जन्म की दो सौ पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर लिखे गए हैं। अच्छी कला कालजयी होती है, तभी कलाकार के जाने के सदियों बाद भी कला जीवित रहती है और उसी के साथ कलाकार की स्मृति भी । 

यों तो सारी कलाओं में एक  अंतर्संबंध देखा जा सकता है, लेकिन लेखक अनीश अंकुर रंगमंच की पृष्ठभूमि से आते हैं इसलिए चित्रकला, रंगमंच- साहित्य और संगीत इन तीनों क्षेत्रों में उनकी सहज रुचि   स्वाभाविक  है। 

कला और साहित्य में थोड़ी भी रुचि रखने वाला व्यक्ति किताब में उल्लिखित तीनों नामों से जरूर ही परिचित होगा। इस किताब को पढ़ लेने के बाद परिचय का यह दायरा निश्चित तौर पर बढ़ेगा। इस किताब को पढ़ हम यह जान पाते हैं कि तीनों के जीवन में औपचारिक शिक्षा का अभाव रहा, इसके बावजूद उन्होंने अपने अपने क्षेत्र में शिखरों को छुआ, नए शिखरों को बनाया। इसको ऐसे देखें कि कला या प्रतिभा औपचारिक शिक्षा की अनुगामिनी नहीं है । दूसरी जो बात पाठक सहज लक्षित कर सकता है कि तीनों ने ही अपने मुकाम को पाने के लिए कड़ा संघर्ष किया, और तमाम तरह के विरोधों का सामना किया। तीसरी और सबसे खास बात यह कि तीनों ने ही अपने समय में गलत का विरोध किया, देश और समाज में व्याप्त जड़ता पर प्रहार किया। कला और साहित्य में गलत के विरोध की क्षमता अंतर्निहित होती ही है। 

दा विंची के प्रसिद्ध चित्र 'मोनालिसा' के बारे में बात करते हुए अनीश अंकुर कहते हैं - "इस चित्र में छुपी- दबी भावनाओं का अहसास मिलता है। ये भावनाएँ खतरनाक मानी जाती हैं क्योंकि ये स्थापित ऑर्डर के खिलाफ विद्रोह के रूप में देखी जाती हैं।" इस बात की पृष्ठभूमि में लेखक पाठक को चित्रकला के 'स्फूमातो' जैसे तकनीकी शब्द से भी परिचित कराता चलता है। 'मोनालिसा' के विभिन्न पहलुओं पर लेखक ने प्रकाश डाला है जिससे पाठक 'मोनालिसा' को देखने के साथ साथ समझ लेने की भी कोशिश कर सकता है। पाठक जान पाता है कि 'मोनालिसा' का असली नाम क्या है। इस तरह से यह लेख बड़ा ही रोचक बन पड़ा है। 

शेक्सपीयर पर बात करते समय लेखक बताता चलता है कि शेक्सपीयर ने अलग- अलग क्षेत्रों की बड़ी हस्तियों को भी किस कदर प्रभावित किया। यह भी कि उसने अपने समय के समाज और मनोविज्ञान को बखूबी चित्रित किया। एक सच्चा कलाकार भविष्य की आहट को बहुत पहले से भाँप लेता है। लेखक बताता है कि पूंजीवाद और उसके कारण उपजी मन की बीमारी को शेक्सपीयर ने तब पहचान लिया था जब उसकी कहीं कोई चर्चा भी नहीं थी।

बीथोवन के बारे में लिखते हुए लेखक अनीश अंकुर लिखते हैं कि बीथोवन ने ऐसी धुनों और संगीत की रचना की जो सुनने वाले को सुकून पहुंचाने के बदले उन्हें चकित और विचलित करता रहा है। ऐसा माना जा सकता है कि फ्रांसीसी क्रांति की सबसे अच्छी अभिव्यक्ति के धुनों और संगीत में ही हासिल हो सकी थी। 

पूरी किताब से गुजरता हुआ पाठक तीनों कलाकारों के जीवन में घटित महत्वपूर्ण घटनाओं से भी रूबरू होता है। उसकी यह समझ बनती है कि कला अपने समय का दस्तावेज होने के साथ- साथ भावी पीढ़ियों से भी संवाद कायम करती है। 

किसी भी अच्छी किताब की तरह यह किताब भी अपने अंतिम पृष्ठ के साथ समाप्त नहीं होती बल्कि पढ़ने वाले के मन में और जानने, और समझने की इच्छा जगाती है । जैसे शेक्सपीयर के बारे में यह पढ़कर कि उसने कई कहावतों को भी जन्म दिया, पाठक शेक्सपीयर के समकालीन तुलसी की रचनाओं में कहावतों को ढूँढने को उद्यत हो सकता है। बीथोवन ( पश्चिम) के संगीत में सामूहिकता के बर- अक्स भारतीय संगीत में एकल साधना पर विचार करने की इच्छा पाठक के मन में जाग सकती है । वह यह ढूँढना चाह सकता  है कि अहिंसा के पक्षधर गाँधी जी को जब बीथोवन की पाँचवी सिंफनी सुनाई गई तो उनकी प्रतिक्रिया क्या रही । 

कला और साहित्य में साधारण रुचि भी रखने वाले व्यक्ति के लिए यह किताब एक नई खिड़की खोलने का काम कर सकती है। अपने आकार और कीमत दोनों के लिहाज से यह किताब पहुँच के भीतर है । अगर किताब की दुकानों पर प्रतियाँ उपलब्ध कराना आसान नहीं भी हो तो ई बुक के रूप में इस किताब का प्रचार- प्रसार होना ही चाहिए। नहीं तो सब फेल  !!

मंगलवार, 10 जनवरी 2023

भरतु भरत सम जानि -- किशोर कुमार : द अल्टीमेट बायोग्राफ़ी

 


भरतु भरत सम जानि

( किशोर कुमार : द अल्टीमेट बायोग्राफ़ी ) 


दिल ढूँढ़ता हैगाने की चर्चा करते हुए गुलज़ार साहब कहते हैं मिसरा ग़ालिब का है और कैफ़ीयत हरेक की अपनी-अपनी किशोर कुमार : द अल्टीमेट बायोग्राफ़ीपढ़ने के बाद ऐसा  ही कुछ कहने की छूट लेने की इच्छा मेरी भी हो रही है और मेरा विश्वास है कि हर पाठक भी इसे पढ़ने के बाद अपने-अपने किशोर कुमार को देखेगा । यही इस किताब की सफलता है । 

रामचरितमानस में भरत के गुणों की चर्चा करते हुए जब उनके उपयुक्त कोई भी उपमा नहीं ढूँढ़ पाए तब तुलसीदास ने लिखा भरतु भरत सम जानि यानी भरत जी के समान बस भरत जी ही हैं, ऐसा जानो । अनिरुद्ध भट्‍टाचारजी और पार्थिव धर द्वारा लिखी गई किशोर कुमार की जीवनी किशोर कुमार : द अल्टीमेट बायोग्राफ़ीपढ़ने के बाद किशोर कुमार के बारे में भी सिर्फ यही कहा जा सकता है – किशोर कुमार के समान बस किशोर कुमार ही हैं ! 

किशोर कुमार का नाम हमने इतना सुना है, उनके गानों में हम इतना डूबे हैं कि लगता है किशोर कुमार के बारे में तो हम सब जानते ही हैं ! किशोर कुमार 75-80 वर्षों से समकालीन बने हुए हैं । हर उम्र के लोगों के लिए उनके हिसाब से समकालीन । किताब की भूमिका में ही लेखकगण यह बताते हैं कि 2012 और 2013 में भी फिल्मफेयरपत्रिका के सर्वे में किशोर कुमार सर्वकालिक श्रेष्ठ गायक के रूप में चुने गए । 

यह किताब हमें किशोर कुमार से मिलवाती है । किशोर कुमार को किशोर कुमार बनते हुए हम देखते हैं । जीवनी में तथ्यों के आधार पर नायक की कथा बुनी जाती है । इस किताब को पढ़ते समय बार-बार इस बात का कायल होना पड़ता है कि छोटी से छोटी जानकारी को भी, जो किशोर कुमार को किशोर कुमार बनाती है, कथा में बड़ी खूबसूरती से पिरोया गया है। किशोर कुमार असाधारण प्रतिभा से संपन्न थे यह बात इस किताब में बार-बार रेखांकित होती है । वे अपनी प्रतिभा से फिल्म लाईन और कला के क्षेत्र के लोगों को बार- बार अचंभित करते हैं । किशोर कुमार अपने गायकी से फिल्म प्लेबैक को एक नए स्तर पर ले गए । कल्याणजी आनंदजी को उद्धृत करते हुए लेखक लिखते हैं कि यह किशोर ही हैं जिन्होंने इस बात का एहसास कराया कि गाने स्क्रिप्ट में घुले-मिले  हो सकते हैं, फिल्म के सुर से सुर मिलाकर चल सकते हैं । जबकि किशोर के पहले गाने खूबसूरत तो होते थे लेकिन स्क्रिप्ट के साथ उनका तारतम्य नहीं होता था, वे स्क्रिप्ट को बाहर से सजाने वाले आभूषण की तरह होते थे। इसका एक कारण शायद यह भी था कि किशोर कुमार अभिनेता के अंदाज़ को इस तरह आत्मसात करके गाते थे कि यह लगता ही नहीं था कि अभिनेता नहीं गा रहा बल्कि किशोर कुमार का प्लेबैक है । देवानंद और राजेश खन्ना से जुड़े अध्यायों में लेखक ने इस पर विस्तृत चर्चा की है । बाद के दिनों में अमिताभ बच्चन की आवाज़ की बारीकियों को पकड़ने या फिर शत्रुघ्न सिन्‍हा के लिए गाए ब्लैक मेलफिल्म के गाने शरबती तेरी आँखों कीबात भी इसी संदर्भ में प्रस्तुत की गई है ।   

किताब में बहुत सारी ऐसी जानकारियाँ हैं जो पाठक अगर तारतम्य बिठा पाए तो उसके सामने घटनाओं का, किशोर कुमार के चरित्र का एक नया ही रंग प्रस्तुत करती हैं। जैसे कि किशोर कुमार के पैसा पकड़ने की बात बहुत सुनी जाती है, लेकिन इस किताब में अलग-अलग जगहों पर ऐसी घटनाओं का ज़िक्र है जिन्हें मिलाकर देखें तो उनकी एक दयालु, मददगार और दरियादिल इंसान की छवि उभरती है । 

किशोर कुमार की छवि एक खिलंदड़, कभी-कभी थोड़े सनकी, इंसान की है । उस छवि के पीछे एक संवेदनशील कलाकार था । आस-पास के माहौल और फिल्मों/ गानों के गिरते स्तर से व्यथित कलाकार । किशोर कुमार के इस पक्ष को भी यह किताब बहुत सलाहियत के साथ हमारे सामने रखती है । उनकी पीड़ा कई-कई रूपों में बार-बार प्रकट होती रही । कई बार संगीत में विधिवत शिक्षित न होने पर  उनकी क्षमताओं पर भी प्रश्न किया गया । हर बात पीड़ा देती, लेकिन उन सब बातों का जवाब किशोर कुमार का गाना ही है । हर उम्र, हर तबके, हर गुणी – हर तरह के लोगों के प्रिय किशोर कुमार । यह बिना कारण ही नहीं है कि उनके प्रशंसकों में भीमसेन जोशी, कुमार गंधर्व और सत्यजीत राय जैसे दिग्गज भी हैं । 

इस किताब में हम यह भी देखते हैं कि किस तरह किशोर कुमार सत्ता के सामने तन कर खड़े होते हैं । यह माद्दा बहुत कम लोगों में ही होता है । किशोर कुमार का व्यक्तित्व और चरित्र भी असाधारण था । किताब में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है । 

किशोर कुमार के जीवन के आखिरी दिन का चित्रण बहुत ही मर्मस्पर्शी ढंग से किया गया है । आँखों में एक नमी का एहसास होता है और जैसे बैकग्राउंड में किशोर कुमार की आवाज़ में धीमे-धीमे गीत बजता है दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना, जहाँ नहीं चैना वहाँ नहीं रहना...  । फिर किताब के कवर पर ध्यान जाता है, मुस्कुराहट के पीछे की उदासी थोडा उदास कर जाती है । क्या दुनिया ने किशोर कुमार को वह श्रेय नहीं दिया जिसके वो हकदार थे ?! 

किताब कितनी मेहनत से लिखी गई है इसका अंदाज़ा किताब से गुज़र कर ही होता है। किताबों को जिस तरह से जीवन-क्रम के अनुसार अध्यायों में बाँटा गया है, वह इस किताब को एक जर्नलया डायरी का रूप भी देता है । अगर किशोर कुमार जर्नल’/ डायरी लिखते तो शायद कुछ ऐसा ही लिखते।  किशोर कुमार को जानने के लिए, उस समय के फिल्म-इतिहास को जानने के लिए, उस समय के माहौल को जानने के लिए यह किताब रास्ता तैयार करती है । 

        कल्याणजी आनंदजी, किशोर कुमार और अमिताभ बच्चन – इस कॉम्बिनेशन पर भी थोड़ी चर्चा होती तो और अच्छा रहता । अमिताभ को अमिताभ बनाने में इन गीतों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। 

      इस रोचक किताब का हिंदी अनुवाद भी लाया जाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक यह पहुँच सके ।

 

 

रविवार, 28 अगस्त 2022

'अच्छा आदमी' : समय और समाज की ' कॉन्फ़िडेंशियल रिपोर्ट'



 





'अच्छा आदमी' : समय और समाज की ' कॉन्फ़िडेंशियल रिपोर्ट'


          कई बार ऐसा होता है  जब किसी कलाकार का कोई काम देख हम उसे 'डिस्कवर' करने लगते हैं, जबकि वे यहीं होते हैं बहुत समय से। 'न्यूटन' में पंकज त्रिपाठी को देखकर अभिनेता पंकज त्रिपाठी को डिस्कवर करना शुरू किया, फिर खूब उनकी फिल्में देखीं, खूब उनके इंटरव्यू सुने। जुबिन नौटियाल का ' दिल दर ब दर' गाना सुनने के बाद आजकल उन्हें डिस्कवर कर रहा हूँ। पता चला   कि कृष्ण- भजन ' मनमंदिर में सजे बिहारी' उन्होंने ही गाया है। जबकि इस भजन को तो कब से सुन रहा हूँ, जैसे उनके गाये कबीर के दोहों को। कुछ ऐसा ही हाल पंकज मित्र के कहानी संग्रह ' अच्छा आदमी' को कल पढ़ लेने के बाद से है। यह उनका पाँचवा कहानी संग्रह है, पर मेरे लिए पहला!  अब खोजबीन जारी है। डिस्कवर किए जाने का भी शायद मुहूर्त  होता है  ! 

      संग्रह में नौ कहानियाँ हैं। पतली- सी किताब 142-145 पेज की। दाम भी ज्यादा नहीं। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित। 

       अगर आपने 'रेणु' को पढ़ा है और अगर आपको पूर्णिया जाने का मौका मिला हो तो आप समझ सकते हैं कि 'रेणु' का लेखन पूर्णियामय है या फिर पूर्णिया और आसपास का इलाका अपनी पूरी भौगोलिकता और सामाजिकता में 'रेणुमय'  ! इस संग्रह को पढ़ते समय मुझे पंकज मित्र और राँची के बीच भी वैसा ही संबंध लगा। राँची  और आसपास कहानियों की रगों में दौड़ता है और लहू बन के आँख से टपकता भी है  ! 

         पंकज मित्र चरित्रों के या स्थानों के स्केच आपके सामने नहीं खींचते, बल्कि उन्हें खुद ही बोलने- बतियाने देते हैं। पात्र संवादों के ज़रिये अपने आप को, अपने चरित्र को प्रस्तुत करते हैं। कहानियाँ इतनी रोचक हैं कि पेज के बाद पेज पलटने को बाध्य करती हैं - ' पेज टर्नर'। भाषा और शब्दों का जो प्रयोग वे करते हैं उसे देख के मुझे लगता है कि वे अपनी उम्र के और अपने से छोटी उम्र के लोगों से अच्छे संपर्क में हैं  । एक अनौपचारिकता, एक खुलापन और बौद्धिकता के भार से रहित होना उनकी भाषा में सहज लक्ष्य किया जा सकता है  । 
  
      कुछ कहानियों में पात्रों, स्थान और घटनाओं को बिल्कुल ही साफ़- साफ़ देखा जा सकता है, खास तौर पर 'सिली प्वाइंट' और 'मुँहबली' में। बाकी कहानियों में आप सीधे- सीधे ऊँगली नहीं रख सकते, या हो सकता है मेरी जानकारी का विस्तार उतना नहीं। 'ऐपफ़रोश' जो भवानी प्रसाद मिश्र की 'गीत फ़रोश' की तर्ज़ पर शुरू होती है, अपने बरतने में हरिशंकर परसाई के निबंधों/ कहानियों की याद दिलाती है। धार और रफ़्तार दोनों के स्तर पर मारक कहानी। 

      'मंगरा मॉल' में बाज़ारवाद, पूँजीवाद की भयावहता तो है ही, बड़ी ही शान्ति से लेखक ने इस बात को भी रेखांकित किया है कि आदिवासी समाज में भी लोभ, महत्वाकांक्षा और बेइमानी की घुन लगनी शुरू हो चुकी है। यह एक ज्यादा त्रासद भविष्य का संकेत है। इसी कहानी में लेखक ने मांदर की ध्वनियों का बखूबी इस्तेमाल किया है जो एक बार फिर ' रेणु' की याद दिलाता है। 

      'कॉन्फ़िडेंशियल रिपोर्ट' और 'आस' कहानियों में वह समाज और उस समाज की वह बातें हैं जिसमें हम रहते तो हैं पर जिसके बारे में खुल कर हम बात नहीं करते। कहानियों में पीठ -पीछे  दबी ज़ुबान में कही गई बातें भी साफ़- साफ़ सुनाई पड़ती हैं। 'आस' कहानी का अंत 'मदर इंडिया' की नर्गिस और 'वास्तव' की रीमा लागू की याद दिला सकता है। 

      पंकज मित्र अपनी भाषा से ' शाहदेव मेंशन' में एक तिलिस्मी दुनिया बुनते हैं- एकदम घुप्प् अँधेरी रात का नीला- नीला तिलिस्म। इस कहानी पर फ़िल्म बनाई जा सकती है। 'अच्छा आदमी' और 'रात के पार चलो' पर भी  । जिस तरह ' रात के पार चलो' के अंत में  आए गीत का हिन्दी अनुवाद लेखक ने दिया है, 'शाहदेव मेंशन' में आए शेक्सपियर  के संवादों का भी हिन्दी- अनुवाद दिया जा सकता था।  'रात के पार चलो' में एक और बात जो कहानी कहती है, वह यह कि सरकारी कंपनियां किसी क्षेत्र में काम करती हैं तो हर तबके का खयाल रखती हैं, जबकि प्राइवेट कंपनियों के साथ ऐसी बाध्यता नहीं। इस तरह यह कहानी पूंजीवाद के विरुद्ध खड़ी हो जाती है, बिना किसी शोर- शराबे के। 
    ' अच्छा आदमी'  कहानी हमारे समय के समाज और परिवार की सच्चाई को उसकी विडंबनाओं  और विद्रूपता के साथ पेश करती है। 

   इस संग्रह की कहानियों से गुज़रते हुए आप पाएँगे कि हर कहानी चरित्रों, स्थानों और घटनाओं की एक कॉन्फ़िडेंशियल यानी गोपनीय रिपोर्ट ही है जिसे हम और आप यानी कि इसके पाठक अपने- अपने निजी क्षणों में पढ़ रहे हैं। 

रविवार, 10 अप्रैल 2022

जसिंता केरकेट्‍टा की कविता : होठों पे सच्चाई रहती है





जसिंता केरकेट्‍टा की कविता : होठों पे सच्चाई रहती है


      जसिंता केरकेट्‍टा की कविताएँ कोई एक दशक पहले प्रकाश में आई हैं । अब तक तीन संग्रहों में उनकी 206 कविताएँ प्रकाशित हैं । इनके अलावा पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित कुछ असंकलित कविताएँ भी हो सकती हैं । पहले संग्रह ‘अंगोर’ और दूसरे संग्रह ‘जड़ों की ज़मीन’ में कविताएँ हिन्‍दी और अंग्रेज़ी में साथ- साथ छपीं । साथ ही जर्मन में भी अनूदित होकर ये कविताएँ साथ- साथ ही  छपीं थीं । आकार के हिसाब से अब तक का उनका सबसे बड़ा काव्य-संग्रह ‘ईश्‍वर और बाज़ार’ इस वर्ष राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है । 

          उनकी कविताओं से गुज़रते हुए जो बात सबसे पहले प्रभावित करती है वह है उनकी सच्चाई । कविताएँ कभी भी, किसी भी स्तर पर जबरन गढ़ी हुई, नकली या सिन्‍थेटिक नहीं लगती हैं । एक अच्छी कविता जीवन की सघनतम अनुभूतियों को जज़्ब करती है और इस तरह हमारे सामने प्रस्तुत करती है मानो वह हमारी ही हों । जसिंता की कविताएँ यही काम करती हैं ।

            जसिंता झारखंड के सुदूर क्षेत्र से आती हैं । उनकी कविताओं में भूगोल जीवंतता के साथ उपस्थित है । झारखंड के कुछ इलाके जो इतर कारणों से भी जाने जाते हैं, जब इनकी कविताओं में आते हैं तो आपसे बोलते-बतियाते चलते हैं । न किसी हीन भावना से ग्रस्त, न अति-आवेश से भरे । जसिंता की कविताओं को पढ़ने के बाद उनकी काव्य- संवेदना के जो प्रमुख क्षेत्र उभरते हैं उनमें प्रकृति, आदिवासी समाज का जीवन, लड़कियाँ, स्त्री-पुरुष संबंध आते हैं । वे कविता को कितना महत्त्वपूर्ण मानती हैं इस बारे में उनकी एक नहीं, कई कविताओं में ज़िक्र है । अपने एक साक्षात्कार में उन्‍होंने कुछ ऐसा कहा है कि पत्रकारिता के लिए लिखते वक्त दायरे में बंध कर लिखना होता था। कविता उनके भीतर चल रहे संवाद को शब्द देती है । उनके नवीनतम काव्य-संग्रह ‘ईश्‍वर और बाज़ार’ में बाज़ारवाद, वर्तमान राजनैतिक-सामाजिक परिदृश्य, मध्यवर्गीय मुश्किलों/ व्यवहार की बातें कई कविताओं में आती हैं । इस संग्रह की कविताओं में, खास तौर पर जहाँ पर शहर और शहरी मध्यवर्ग चर्चा में आते हैं , कथा-तत्त्व को थोड़ी ज्यादा जगह मिली है । इसलिए कहीं-कहीं कविता एक चलते हुए ढर्रे की कविता भी लगती है । लेकिन उन कविताओं में भी जसिंता का विशिष्‍ट स्वर और उनकी सच्चाई साथ नहीं छोड़ती। 

उनके पहले काव्य-संग्रह ‘अंगोर’ की पहली कविता की कुछ पंक्‍तियाँ आपको सहज रूप से प्रकृति के पास ले जाती हैं – 


शाम को वो जोरती है लकड़ी

आँगन में बने किसी मिट्टी के चूल्हे में 

चूल्हे से निकलता है धुआँ 

और पेड़ों की झुरमुट से झाँकता 

चाँद खाँस उठता है अचानक 

लड़की दौड़कर थपथपाती है 

चाँद की पीठ 

‘अंगोर’ की ही एक कविता है ‘सारंडा के फूल’ । सारंडा के जंगल बहुत ही घने हैं और नक्सल गतिविधियों के लिए भी चर्चा में रहते हैं । पर ‘सारंडा के फूल’ की जीवन से लबरेज़ ये पंक्‍तियाँ देखिए –


और उग आता है सुबह

फिर कोई नया फूल 

आग और उम्मीद बन

सारंडा के अंदर कहीं ! 


कवि की दृष्‍टि हमेशा संभावनाओं पर है । शुभ की संभावनाओं पर । 


‘ जड़ों की ज़मीन’ संग्रह की ‘चुप्पी’ कविता में पेड़ आते हैं – 

शहर में चुपचाप पड़ी हैं 

कटी लकड़ियाँ 

और परेशान है शहर   


यही पेड़ आम का पेड़ बन ‘ईश्‍वर और बाज़ार’ संग्रह की ‘उससे मेरा क्या सम्बन्‍ध थ’ कविता में कवि की मार्फत हमसे बात करता है –


वो आम का पेड़ 

ठीक यहीं था सड़क के किनारे 

जहाँ से मुझे हर दिन

बस पकड़नी होती थी 

बस जब तक पहुँचती नहीं

वह मुझे तंग करता

===

                उस दिन बस पकड़ने सड़क पर पहुँची

वह गायब था

सालों से मेरा ठीक यहीं इंतज़ार करता

वह आम का पेड़ 

कहाँ जा सकता है भला ? 

===

दूसरे दिन दौड़ी उधर

सोचा उसकी गंध समेट ले आऊँगी 

अपने आँगन में रोप दूँगी 

उसकी गंध बढ़ेगी

तब मैं उसकी गंध लेकर 

घर से निकलूँगी 

लौटूँगी जब उसकी गंध को 

आँगन में खड़ी पाऊँगी 


ऊपर की तीनों कविताओं में प्रकृति के साथ आत्मीयता सहज ही लक्षित की जा सकती है । जसिंता केरकेट्टा की कविताओं में प्रकृति हमारे समय के कटु-सत्य को भी लेकर उपस्थित होती है । लेकिन अपनी स्वाभाविकता- सहजता में, बिना बोझिल हुए, बिना तिक्‍त हुए । 


          महुआ जसिंता की केरकेट्टा की कविताओं में बार- बार आता है । देखें तो महुआ जंगल की खास चीज भी है । ‘अंगोर’  संग्रह की एक कविता है ‘शब्द बनता हुआ महुआ का फूल’ । सरलता और सहजता की अप्रतिम रचना । इस कविता की सादगी और लय से मिलने वाले आनंद का रसास्वादन करने के लिए पूरी कविता ही उद्धृत की जा रही है ‌-  


बहुरंगी चादर समेटे 

एक साथ सारे शब्द 

बढ़ रहे थे गाँव की ओर 

तोड़ते सनई के फूलों को 

नोचते कोईनार के पत्तों को


तभी मिट्टी के घर से अकेली

मुस्कुराती हुई संस्कृति निकली 

हाथ में लेकर काँसे की थाली 

थोड़ा सरसों का तेल थोड़ा पानी 

और झूम उठा अपनेपन से गाँव 

रंगीन शब्दों के धोने को पाँव


अचानक शब्दों के रंग उड़ने लगे 

पहली बार धरती से जैसे जुड़ने लगे 

कहते रहे क्या-क्या गए हैं हम भूल

तभी गिरा वहाँ महुआ का एक फूल 

छूकर उसे रह गए स्तब्ध

वो बन रहा था धीरे-धीरे 

पृथ्वी का एक अर्थपूर्ण शब्द । 


यह कविता कितनी सहजता से दो संस्कृतियों को एक दूसरे के बर-अक्स खड़ा कर देती है, यह देखने योग्य है । ‘जड़ों की ज़मीन’ की ‘महुआ चकित है’ और’ ईश्‍वर और बाज़ार’ की ‘महुआ का दोष नहीं’ में वे महुआ की जानिब से सवाल करती हैं । दोनों कविताओं की कुछ पंक्तियाँ  देखे और याद रखे जाने लायक हैं । ‘ महुआ चकित है’ में वे कहती हैं -


महुआ चकित है बाज़ार आकर 

कैसे कोई आदमी महुआ पीकर 

उठा ले जाता है 

किसी भी घर की 

बाज़ार से लौटती 

किसी चंपा, चंदा, फूलो या महुआ को ? 


‘महुआ का दोष नहीं’ वे कहती हैं –


महुआ का दोष नहीं 

महुआ तो अब भी वही है 

पर क्या बदल गया है तुम्हारे भीतर 

जो हर बार महुआ पीते ही बाहर आ जाता है । 


स्पष्‍ट है कि इन कविताओं में  कवि के आस-पास के जीवन में उपस्थित और घटित घटनाएँ  केंद्र में हैं , लेकिन जब वे कविता में आती हैं तो अपनी स्थानीयता का अतिक्रमण करती हैं और एक साथ पूरे देश, पूरे समाज की पीड़ा का बयान बन जाती हैं । जसिंता की कविताएँ जीवन का दस्तावेज बन जाती हैं । उनकी कविताओं में प्रकृति बार-बार आती है । बल्कि यूँ कहें कि उनकी कविता की प्रकृति में ही प्रकृति है । पहाड़ एक और उपादान है जो उनकी कविताओं में एकाधिक जगह उपस्थित है । ‘ईश्‍वर और बाज़ार’ की ऐसी कुछ कविताओं के शीर्षक कुछ इस प्रकार हैं – ‘पहाड़ और सरकार’ , ‘पहाड़ और हथियार’ ,’पहाड़ और पैसा’ , ‘पहाड़ और पहरेदार’, ‘पहाड़ और प्यार’ और ‘पहाड़ों के लिए’ । ‘पहाड़ों के लिए’ कविता की ये पंक्तियाँ जसिंता की तरफ से पूरे आदिवासी समाज का सवाल सामने रखती हैं – 


थोड़े से पैसे के लिए

जो अपना ईमान बेचते हैं 

वे क्या समझेंगे 

पहाड़ों के लिए कुछ लोग 

क्यों अपनी जान देते हैं ? 


प्रकृति-संबंधी कविताओं की चर्चा से आगे बढ़ने के पहले, ‘अंगोर’ संग्रह की ‘बन्द दरवाज़े’ कविता की इन पंक्तियों से उभरता बिम्ब देखते चलें – 


आँगन पर गिरकर

धान-सी सुनहरी रंगत लिए 

धूप में सूखती रोशनी 


          जसिंता की कविताओं को पढ़ते समय यह बात आसानी से महसूस की जा सकती है कि उनकी कविता सदैव लड़कियों के पक्ष में , लड़कियों के साथ खड़ी है । ‘अंगोर’ संग्रह की  'गीतों का विलाप’ कविता में वे हमारे सामने उस समस्या को सामने रखती हैं जिसकी चर्चा आए दिन पढ़ने को मिलती है- लड़कियों की मानव तस्करी । इस दुष्‍कृत्य की भयावह छाया को किस तरह यह यह कविता हमारे सामने रखती है, इन पंक्तियों में, देखें – 


और दिल्ली से घर लौटी

ज़िंदगी से हारी 

दिन की सुबकती आँखें 

दौड़ पड़ती हैं डूब जाने को 

कोईल नदी में 


‘ईश्‍वर और बाज़ार’ संग्रह की कविता 'राजनीति की सड़क पर’ बलात्कार की समस्या पर एक तीखी कविता है । कविता पढ़ने के बहुत देर बाद तक आप उसकी धार महसूस करते रहते हैं । इसी संग्रह की कविता ‘शोर मचाती लड़कियाँ’ व्यंग्य करती है “शान्‍त लड़कियाँ ही होती हैं सबसे अच्छी”। अगली ही कविता ‘धूप में खेलती लड़की’ में वे कहती हैं –


सबको ऐसी ही लड़की चाहिए

जो दिन-रात धोती रहे घर के झूठे बर्तन

लगाती रहे झाड़ू और पकाती रहे सब के लिए भात 


एक सामाजिक सच आपके सामने दुहरा दिया जाता है । समानता और विकास की सारी बातों का खोखलापन एक बार फिर खुल जाता है । इसी संग्रह की एक सशक्त कविता है ‘हर लड़की को आत्मकथा लिखनी चाहिए’। इस कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए – 


कलम ने धीरे-से मेरे कान में कहा

दुनिया की हर लड़की को एक दिन 

               अपनी आत्मकथा  ज़रूर लिखनी चाहिए 

               कि स्त्रियों की आज़ादी तय करने वाले 

               भद्र पुरुषों की कलई अब खुलनी चाहिए । 


यह कविता एक ही साथ विरोध का बिगुल भी है और कदम उठाने का आह्वान भी । आदिवासी लड़कियों के प्रति समाज के रवैये पर क्रोधित कविता कहती है “ बन्द करो कविता में ढूँढ़ना आदिवासी लड़कियाँ"।

         स्त्री-पुरुष के बीच के अन्‍तर को और पितृसत्तात्मक समाज के रवैये को ‘अभी मैं बहिष्कृत हूँ’, और ‘औरत का घर' कविताएँ बखूबी दर्शाती हैं । लेकिन कवि की कामना स्त्री-पुरुष के बीच बराबरी के समाज की है । ‘सहयात्री’ कविता में वे कहती हैं – 


मैं दुनिया कभी पुरुष नज़रिए से देखूँ

तुम कभी स्त्री नज़रिए से 

कभी तुम मेरी तरह मुझे जानो

कभी मैं तुम्हें तुम्हारी तरह 

कभी दोनों की आँखें एक साथ कुछ देखें 

और हम खुशी से उछल पड़ें । 


इन पंक्तियों को पढ़ते समय सहज ही यह खयाल आता है कि हम दूसरों की खुशी चाहते तो हैं,मगर साथ ही यह भी चाहते हैं कि हमारे कहे अनुसार ही चलकर वो खुश हों । जबकि होना यह चाहिए कि वो अपनी तरह से खुश हो और उस खुशी से हम खुश हों । यह कविता भी यही इच्छा प्रकट करती है । स्त्री-पुरुष की बराबरी को रेखांकित करती ‘जड़ों की ज़मीन’ संग्रह की छोटी-सी कविता ‘आधी स्त्री’ आसानी से ‘विश्व महिला दिवस’ का स्लोगन घोषित की जा सकती है ‌–


जब लड़ता है 

मेरे भीतर का आधा पुरुष 

भीतर की स्त्री के हक के लिए 

तुम्हारे भीतर की आधी स्त्री

अपने भीतर के पुरुष को धकियाती हुई

आकर खड़ी हो जाती है साथ मेरे ॥  


           जसिंता केरकेट्टा के लिए कविता मन बहलाने की वस्तु नहीं है, बल्कि जीने का तरीका है । उनके यहाँ कविता आग है, हथियार है, प्रतिरोध है । कविता जीवन के राग से पैदा हुआ गीत है जिसकी कोई अनदेखी नहीं कर सकता, जिसे कोई दबा नहीं सकता । ‘अंगोर’ संग्रह की एक कविता कहती है –


कविता भूख की आग पर 

पकती हुई गुनगुनाती है 

और उठने लगती है एक साथ 

कई घरों की आग

भूख के सारे कारणों के खिलाफ़ ।


कविता की ताकत को दर्शाती ‘जड़ों की ज़मीन’ संग्रह की कविता ‘साहेब! कैसे करोगे ख़ारिज?’ की पंक्तियों को देखिए –


साहेब ! 

एक दिन 

जंगल की हर लड़की 

लिखेगी कविता 

क्या कह कर खारिज करोगे उन्हें? 

क्या कहोगे साहब?

यही न

कि यह कविता नहीं 

समाचार है ! 

कविता के असर को ‘ईश्‍वर और बाज़ार” की कविता ‘जब तुम प्रतिरोध करते हो’ कुछ इस तरह से दिखाती है –


हम सिर्फ़ कविता लिखते हैं 

और हर बार 

तुम्हारे भीतर छिपे हत्यारे को 

तिलमिलाकर बाहर निकलते देखते हैं 


कविता कवि की शक्ति है जो पाठक को प्रेरित करती है कि वह कविता को अपनाए और उसे अपनी शक्ति बना ले । 


       जसिंता की कविताओं में, खास तौर पर ‘ईश्‍वर और बाज़ार’ संग्रह की कविताओं में, आदिवासी संस्कृति पर हो रहे चौतरफा हमलों से उत्पन्न स्थितियों का सधा हुआ वर्णन है ।  ‘ईश्‍वर और बाज़ार’, ‘क्यों काटे जाते हैं पेड़’, ‘जहाँ कुछ नहीं पहुँचता’, ‘सच बोलती सड़कें’, ‘मेरे ईश्‍वर की हत्या’, ‘जड़ों की ज़मीन’ संग्रह की ‘पश्‍चिम का अश्वमेध’ तथा ‘अंगोर’ संग्रह की ‘नदी पहाड़ और बाज़ार’ एवं ‘साज़िशों की सिक्स लेन’ ऐसी ही कुछ कविताएँ हैं । ‘ईश्‍वर और बाज़ार’ संग्रह की एक कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं – 

जिनके पास कुछ नहीं बचा 

उनके पास ईश्‍वर होने का भरम था 

और जिनके पास पैसे बहुत थे 

उन्होंने ईश्‍वर को छोड़ दिया 

अब ईश्‍वर उनके किसी काम का न था 


वर्षों पहले पी. साईनाथ की किताब आई थी ‘ एवरीबॉडी लव्स अ गुड ड्रॉट’ । इसमें लेखक ने कई सारे गाँवों में घूम कर वहाँ की स्थिति को देख-परखा था और उनकी बदहाली पर लिखा था । यह किताब खासा चर्चित रही थी । जसिंता उन्हीं स्थितियों को, जो आज भी वैसे ही मौजूद हैं, अपनी कविता ‘गाँव का पता’ में कुछ ऐसे व्याख्यायित करती हैं –


कोयला लोहा बॉक्साइट के साथ 

कई गाँवों को लादकर वह ट्रक

जो रोज़ शहर की ओर जाता है 

अब सिर्फ़ वही मेरे गाँव का असली पता बताता है 


          आदिवासी क्षेत्रों में गलत आरोप लगाकर लोगों को प्रताड़ित करने की बातें उठती ही रहती हैं । इस स्थिति को परखती हुई कविताएँ जसिंता की रचनाओं में बार- बार लौटकर आती हैं । ‘अंगोर’ संग्रह की कविता ‘बवंडर और दिशाएँ’ भी ऐसी ही एक कविता है । इसमें वे कहती हैं –


पृथ्वी को बचाने के लिए 

किसी न किसी की तो 

                कुर्बानी देनी ही होगी 


‘जड़ों की ज़मीन’ संग्रह की यह छोटी-सी कविता भी इस बात को बहुत पैनेपन के साथ प्रस्तुत करती है –


मेरा पालतू कुत्ता

सिर्फ़ इसलिए मारा गया

क्योंकि खतरा देखकर वह भौंका था ।

मारने से पहले उन्होंने 

उसे घोषित किया पागल

और मुझे नक्सल...

जनहित में । 


इसी तरह पारा मिलिटरी सेना के द्वारा चलाए जा रहे अभियानों के परिप्रेक्ष्य  में वाजिब सवाल उठाती ‘ईश्‍वर और बाज़ार’ संग्रह की कविताएँ ‘ गाँव पर गोली कौन चलाता है’, ‘मारे जाने के लिए’, ‘ हथियार’ और ‘सेना का रुख’ हमारे सामने प्रस्तुत होती हैं । इसी तरह शहर की ओर पलायन, शहर का अहंकार, शहर का अपने को गाँवों से ऊँचा समझना जैसे विषय भी जसिंता की कविताओं में जगह पाते हैं । 


      जसिंता की कविताएँ अपने आसपास के जीवन को बहुत संवेदनशीलता के साथ देखती हैं । वे परिस्थितियों की आँख से आँख मिलाकर खड़ी होती हैं । सारी कठिनाइयों, अत्याचारों, विरोध के बावजूद उनकी कविता नारेबाज़ी नहीं बनती । स्थितियों को देखने, समझने और स्वीकार करने का माद्‍दा है उनमें । वे समझती हैं कि अक्सर वे ही लोग फँस जाते हैं जो किसी के पक्षपाती नहीं होते, जिन्हें सिर्फ़ अपना जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत करना है । लेकिन विडंबना यही है कि वही सबसे ज्यादा पकड़े जाते हैं । अपनी ‘ख़ेमा’ शीर्षक कविता में वे यही तो कहती हैं –


एक अदना-सा आदमी 

जो इंसान-भर होने की चाहत के लिए  

सही को सही और

ग़लत को ग़लत कहता है 

किसी भी ख़ेमे को वह

सबसे ज़्यादा ख़तरनाक क्यों लगता है? 


इसी अदने-से आदमी के साथ जसिंता खड़ी हैं । उनकी कविता खड़ी है । अपने सारे विरोध के स्वर और दृढ़ता के साथ अपना पक्ष रखने के बावजूद उनकी कविता भार नहीं लगती, कहीं कसैली नहीं होती । कविता सारी निराशाओं और ज़ुल्मों के बीच उम्मीद की किरण होती है । एक साक्षात्कार में अपने नाम का मतलब बताते हुए जसिंता ने कहा था कि जसिंता एक फ्रेंच फूल का नाम है और मिथक यह है कि एक लीजेंड थे जिनकी हत्या कर दी गई थी । उनके खून की पहली बूंद जहाँ गिरी थी वहाँ एक फूल उग आया था जिसे जसिंता कहा गया । एक हत्या के जवाब में फूल का खिल आना , ठीक वैसे ही उनकी कविता अंतत: उम्मीद की कविता है । 


जसिंता की कविता की यह खासियत है कि यह बहुत बारीकी से जीवन का अध्ययन कर रही है और जीवन उनकी कविताओं में दर्ज़ हो रहा है । साथ ही दर्ज़ हो रहा है हमारा समय, अपनी सारी सुंदरता और विद्रूपता के साथ । उनकी कविता जीवन के ‘एसेन्‍स’ को अपने में समाहित करती चल रही है । यही कारण है कि हर पढ़ने वाले को अपनी कविता लगती है, अपने आसपास की कविता । जैसा कि शुरु में भी कहा गया था कि जब आप जसिंता की कविताओं से गुज़र रहे होते हैं तो उनकी सच्चाई आपको लगातार प्रभावित करती चलती है । यही वजह है कि उनकी हर कविता में उद्धृत किए जाने लायक पंक्तियाँ आपको मिल जाती हैं । उनकी कविता पर इतनी सारी बातें कर लेने के बाद भी यही लग रहा है कि कुछ और कविताओं पर कुछ और बात हो सकती है । यही तो असर है उनकी कविताओं का जो लगातार आपसे जैसे कहती चलती हैं  "होठों पे सच्चाई रहती है, जहाँ दिल में सफ़ाई रहती है” और संग-संग आप भी गुनगुनाते चलते हैं ! 


         कुछ बात किताबों के प्रकाशन के संबंध में । ‘अंगोर’ अनुज्ञा बुक्स से प्रकाशित है, ‘जड़ों की ज़मीन’ भारतीय ज्ञानपीठ से और ‘ईश्‍वर और बाज़ार’ राजकमल प्रकाशन से । तीनों प्रकाशकों ने जसिंता की कविताओं का प्रकाशन कर हिन्‍दी का बड़ा भला किया है । कविताएँ ज़्यादा से ज़्यादा लोग पढ़ सकें तो और भला हो । अगर इन किताबों के छात्र-संस्करण (यानी सस्ते दामों पर)  भी निकालने पर विचार किया जाए तो निश्‍चित ही युवा-वर्ग में इन कविताओं का प्रसार ज्यादा हो पाएगा । युवाओं का कविताओं से, खासकर ऐसी कविताओं से जो सच्चाई से भरी हों, परिचय होना आवश्यक न भी हो तो वांछनीय ज़रूर है । 

         जसिंता ने कविताओं की एक नई ज़मीन तैयार की है - ताज़ा और निष्कपट। उनकी कविताएँ और ज़्यादा पढ़ी जानी चाहिए, और ज़्यादा सुनाई जानी चाहिए और उनकी कविताओं की और ज़्यादा चर्चा की जानी चाहिए।

 जसिंता कविता को जीती रहें । उनकी कविता ‘अंगोर’ बन हर तरफ फैले , जैसा कि उनकी ‘अंगोर’ कविता कहती है –


शहर का अंगार 

जलता है, जलाता है 

फिर राख हो जाता है 

गाँव के अंगोर

एक चूल्हे से 

जाते हैं दूसरे चूल्हे तक 

और सभी चूल्हे सुलग उठते हैं ॥ 


***

 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

पाठकीय : एक देश बारह दुनिया : सहयात्री बनाती किताब


               प्रकाशक : राजपाल

शिरीष खरे की 'एक देश बारह दुनिया' : सहयात्री बनाती किताब

कल के ही अखबार में  'दी अर्बन विलेज : कमाठीपुरा टाउनशिप प्रोजेक्ट' और ' कमाठीपुरा पुनर्निर्माण समिति' से जुड़ी खबर देखी । कल ही मैंने किताब पढ़नी शुरू की थी ' एक देश बारह दुनिया' जिसका दूसरा अध्याय कमाठीपुरा पर है। यह अलग बात है कि अखबार की खबर पढ़कर इसी किताब के सूरत से जुड़े अध्याय की याद आना भी उतना ही स्वाभाविक है। 

जहाँ तक मैं समझता हूँ, हिन्दी में 'नॉन फिक्शन' का बहुत समृद्ध भंडार नहीं है। हिन्दी साहित्य कविता- कहानी- उपन्यास के इर्द- गिर्द ही ज्यादा घूमता है। इसमें से भी अगर समीक्षा/आलोचना/साहित्य इतिहास/ काव्य शास्त्र आदि को छोड़ दिया जाए तो हिन्दी में नॉन फिक्शन और उसमें भी मूल रूप से हिन्दी में लिख हुआ काफी कम हो जाएगा। 

ऐसी ही  किताब है  लेखक- पत्रकार शिरीष खरे  की 'एक देश बारह दुनिया' । यह किताब उनकी 8-9 साल के दौरान की गई यात्राओं का प्रतिफलन है, जो संभवतः उनकी पत्रिकारिता संबंधी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए की गई हैं  । इस किताब की शैली विशेष है। ज्यादातर बातें 'वर्तमान काल' में कही गई हैं। इससे एक तो लेखक का जुड़ाव उन किस्सों से ज्यादा गहरा हो जाता है, जिन्हें वह सुना रहा है, और दूसरे यह कि पाठक को बड़ी आसानी से अपने साथ खड़ा लेता है, उन सारे घटना- क्रमों के बीच ,जैसे आपके सामने सब लाइव चल रहा हो।  यदि मैं यह कहूँ कि लेखक गायब हो जाता है और जैसे पाठक ही वह किस्सा सुनाने लग पड़ता है, तो गलत नहीं होगा। 

किताब आपके सामने देश का कच्चा चिट्ठा खोलती चलती है। बड़ी आसानी से आप अपने आस पास की चीज़ों, घटनाओं से तारतम्य बैठा लेते हैं। लेखक ने जिस तरह से अपनी यात्राओं का विवरण किया है कि बार- बार आप उसके स्वगत कथन को सुनकर अपने आप से भी प्रश्न करने लग जाते हैं कि क्या सारी सुविधाओं के हम हकदार हैं जो हमें अनायास ही प्राप्त हो गई हैं, अपने जन्म के स्थान के कारण? 

दूर दराज़ की यात्राओं पर ले चलता लेखक हर पहलू से रूबरू कराता चलता है। हम यह देखते हैं कि परिस्थितियाँ जो भी हों, बात व्यक्ति के स्तर पर ही आकर रुकती है। उसी के विकल्प, उसी के चुनाव उसके आगे के जीवन का रास्ता तय करते हैं। समाज के स्तर पर  थोड़ी सहभागिता  दिखती भी है, सरकारें इस मामले में ज़मीनी हक़ीक़त से दो- चार होती नहीं हैं, होना नहीं चाहती हैं। 

किताब की जिल्द पर लिखा है "हाशिये पर छूटे भारत की तस्वीर"। लेकिन यह किताब सिर्फ़ तस्वीर ही प्रस्तुति नहीं करती, सिर्फ़ तथ्य ही सामने नहीं ररखती, यह पाठक को अपने साथ जोड़ लेती है अनुभूति  के स्तर पर। हर अध्याय को पढ़ते वक़्त यह सवाल मन में उठने लगता है कि सरकारें कुछ नहीं कर रहीं, और लोगों की जानकारी से दूर जाने ऐसी कितनी बातें होंगी जहाँ कुछ किया जाना चाहिए। आप खुद को उन व्यक्तियों, घटनाओं के बीच पाने लगते हैं। लेखक की विवशता, गुस्सा, बेबसी, दुख, दर्द - सब जैसे आपके साथ घटित होने लगता है। ऐसा शायद इसलिए भी कि लेखक आपको अपने निजी दुख- अनुभव का भी साझीदार बना चुका है, एकदम शुरू से ही। 

भाषा और प्रवाह पहले ही पन्ने से आपका हाथ थाम अपने साथ लिए चलते हैं। मैंने तो कई बार लेखक की जगह खुद को मोटर साइकिल पर पीछे बैठा और मुड़कर छूटते हुए रास्तों को देखते हुए पाया। ट्रेन से दृश्यों को छूटता हुआ देखता पाया । किसी के साथ बेघर होता हुआ पाया और इन सब के बीच नखलिस्तान -से स्कूल में बच्चों के सँग मुस्कुराता हुआ पाया।  यानी कि  किताब की रोचकता शुरू से अंत तक बनी रहती है। किताब की आख़िरी पंक्ति आपको फिर बाँध लेती है, लेखक की अगली किताब के इंतज़ार में। 

लेखक ने जिन विषयों पर बात की है, उन सब पर अलग- अलग किताब लिखी जा सकती है।  हर अच्छी किताब आपके लिए नए मुहावरे और आपकी सोच को जगाने का सामान लेकर आती है; यह किताब भी। लेखक की भाषा और चिंतन की एक बानगी यहाँ प्रस्तुत है। मेरा विश्वास है कि यह बानगी आपको भी इस किताब को खरीदने और पढ़ने का मन बनाने का कारण देगी :-

" ये बताती हैं कि कमाठीपुरा के इलाके में दंगे नहीं होते। "

"अफ़सर के आने का मतलब है, कोई खतरा आ गया। "

"इनका यही अतीत इनके वर्तमान के सामने पहाड़-सा आकर रास्ता रोक रहा है।"


"वहाँ सैय्यद कंकर ने ऐसी बात कही जो मेरे दिल को भीतर तक छू गई। उसने कहा, “हमारे खेल की खास बात यह है कि हमने कभी भी इस पर टिकट नहीं लगाया। रास्ते पर जो मिलता है, हम उसे खुश करते हैं। हमारे लिए गरीब-अमीर सब बराबर हैं।”

"अपने समय से बीते समय में प्रवेश करना कष्टप्रद तो होता है। "

"असल में रोटी की गोलाई देश की सीमाओं से परे है और मजूरी यहाँ की सबसे बड़ी देशभक्ति है।"

"बेचैनी से विचार पैदा होते और विचारों से विचारधारा बनती जाती है। यही विचारधारा मुझे तटस्थ होने से बचाने लगी और शोषितों के पक्ष में और अधिक मुखर बनाती चली गई।"

"आमतौर पर प्रेरणाएँ विपरीत परिस्थितियों में पैदा होती होंगी।"

"अमरकंटक काल के कंठ में है।"

"जब-तब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सोचता हूँ कि नदी के साथ चलना भर नदी की यात्रा नहीं होती है।"

"कटता जंगल, घोर अमंगल!"

"नर्मदा, कभी कई विस्थापनों की एक साझा कहानी लगती है। कभी अलग-अलग विसंगतियों का एक उपन्यास। कभी विरोधाभासों का धारावाहिक। कहीं लूट की फ़सल।"

"विचारों की यात्रा दृष्टिकोण तय करती है। दृष्टिकोण ही तो यात्रा के दौरान विनाश को विकास और विकास को विनाश के तौर पर रेखांकित करता है।"

"यहाँ से देखने पर यही लगता है कि विशालकाय बाज़ार को छोटा बाज़ार और विशालकाय सभ्यता को छोटी सभ्यता को रौंद डालने का कोई अधिकार नहीं है।"

"यहाँ दिन के उजाले में रात-सा सन्नाटा पसरा है।"

"यात्रा के दौरान अतीत को देखने का दृष्टिकोण वैसा नहीं रह जाता जो उसके पहले होता है।"

"यात्रा में लौटते हुए हमारा शरीर तो साथ लौटता है पर, मन तुरंत नहीं लौटता है। बहुत दिनों बाद लौटता भी है तो पूरा नहीं लौटता है।"

"यात्रा के बाद और बगैर किसी यात्रा के बावजूद लिखने पर जब अपना ही लिखा पढ़ता हूँ तो बहुत साफ़ यह अंतर समझ आता है कि यात्राएँ किसी लेखक या पत्रकार को यथार्थ के अनुभवों से पूर्ण कर उसके लेखन को समृद्ध बनाती हैं।"

किताबों को खरीद कर पढ़ने की बात इसलिए कि, क्यों करोड़ों हिन्दी पढ़ने वालों के होते हुए भी साल भर में किसी किताब की 25-50 हजार प्रतियाँ नहीं बिक सकतीं? यह भी कि क्यों हिन्दी की किताबों की बिक्री इतनी नहीं हो सकती कि लेखक सिर्फ लेखक हो कर रह सके। एक अदद नौकरी या बिजनेस के सपोर्ट की उसे जरूरत न पड़े।  प्रकाशकों को किताबों की बिक्री का इतना भरोसा हो कि वे किताबें कमीशन कर सकें और लेखक बेफिक्र हो कर लिख सके। 

किताब के लेखों के लिखने के बाद कुछ समय गुज़र चुका है। हालाँकि इससे लेखों की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन अगर समय और साधन हों तो किताब के अगले संस्करण में कुछ चीज़ों की ताज़ा स्थिति जानना दिलचस्प होगा। जैसे मनरेगा में काम दिए जाने और भुगतान की स्थिति, स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या, बन्जारा समुदाय के जाति प्रमाण निर्गत होने की स्थिति, आदि। 

राजपाल प्रकाशन को बधाई, एक अच्छी किताब प्रकाशित करने के लिए। 

लेखक शिरीष खरे को बधाई  ।  उनकी यह किताब उनकी पिछली किताब 'उम्मीद की पाठशाला' की तुलना में विविध विषयों और ज्यादा विस्तृत फलक को समेटे हुए है। और भी ज्यादा विविध विषयों और विस्तृत फलक पर लिखने के लिए उन्हें ढेरों शुभकामनाएँ। 


सोमवार, 6 दिसंबर 2021

‘इश्क़ में माटी सोना’ के 6 साल


 

इश्क़ में माटी सोना’ … मानो कहानी और नज़्म की मुलाकात हो गई

 

 

कहानी कब कहानी का रास्ता छोडते हुए कविता के रास्ते से मिल जाती है , यह देखना-समझना हो तो इश्क़ में माटी सोनापढ़ी जानी चाहिए । राजकमल प्रकाशन की लप्रेकसिरीज़ की दूसरी किताब । पहली किताब के लेखक रवीश कुमार के असर को इस दूसरी किताब के लेखक गिरीन्‍द्र नाथ झा इस तरह से सामने रखते हैं रवीश कुमार ने जब फेसबुक पर लघु प्रेम कथा लिखने की शुरुआत की तो मैं एक झटके में रवीश मैनियाकी चपेट में आ गया। खैर । इश्क़ में माटी सोना’ …। लघु प्रेम कथाओं की 84 पृष्ठों की छोटी-सी पुस्तक ने पहली बार भी बाँधा था और जब- जब फिर से पढ़ी है किताब, फिर- फिर बाँध लेती है ।   

 

कथा शुरू होने से पहले पूर्णिया से दिल्ली पहुँचती है । और फिर दिल्ली से शुरू होकर गाँव तक । किताब प्रकाशित हुई थी दिसम्बर 2015 में और इसकी भूमिका लिखी गई 05 दिसम्बर 2015 को । यानी आज से ठीक 6 साल पहले । इन 6 सालों में लेखक पूर्णिया- चनका में रम गए हैं । 6 सालों में ज़माना बदला है । कथा के नायक- नायिका जिनकी रैली में जाने की बातें करते हैं, तब से अब तक सरकार उन्हीं की है । यह देखना दिलचस्प होगा कि कथा आज कहाँ तक पहुँचती है । लेखक उनको कहाँ पहुँचाते हैं या फिर वे ही लेखक को कहाँ- कहाँ लेकर जाते हैं ।

 

इश्क़ में माटी सोनाकी लघु कथाएँ चौंकाती नहीं हैं, चोट नहीं करती हैं । धीरे- धीरे मन में घुल जाती हैं । जैसे किसी शीशे के मर्तबान में रखे पानी में रंग धीरे- धीरे फैले । जैसे सॉन्देशका स्वाद धीरे- धीरे मुँह में घुले । जैसे पूर्णिया में दिखने वाली गहरी, नमी वाली हरियाली  आँखों में समा जाए । गिरीन्‍द्र भूमिका में गुलज़ार और रेणु के प्रभाव की बात करते हैं , जो यहाँ- वहाँ झलकता भी है । उदाहरण के लिए ये दो पंक्‍तियाँ – उसे चाँद पसन्‍द  था मुझे तारों भरा आसमान... और जो मन पढ़ ले वह तो मेरे लिए मीता है न !!

 

कथा दिल्ली में शुरू होती है । अलग- अलग इलाकों का ज़िक्र कथा को विस्तार देता है , समय के हिसाब से भी और जगह के हिसाब से भी । कथा जब गाँव पहुँचती है तो गाँव की दिनचर्या बड़ी सहजता से साथ कथा का हिस्सा बन जाती है । प्रकृति कथा में हर कदम पर मौजूद है, पूरे निखार के साथ ।  खेती- किसानी भी कथा प्रवाह में उपस्थित है कथा को " सुन्नैर" बनाती हुई। कहते हैं जो अच्छी रचना होती है, वो अपने समय का इतिहास दर्ज़ करती चलती है । इश्क़ में माटी सोनायह काम बखूबी करती है । जब कथा दिल्ली में रहती है, तो वहाँ व्यक्तिगत अनुभव ज्यादा सक्रिय हैं । लेकिन जब कथा गाँव पहुँचती है वह व्यक्‍तिगत से समाज-गत होने लग जाती है – अपनी समस्याओं, परिस्थितियों, आकांक्षाओं, अपने मान- मनुहारों में । यह शहर और गाँव के समाज के चरित्र को अंकित कर देता है । राजनीति के प्रति जागरुकता भी गाँव के माहौल में उभर कर सामने आती है । कथा का यह ताना-बाना हमारे मानसिक- सामाजिक बुनावट को पकड़ने और दर्ज करने की सार्थक कोशिश करता है ।

  

जैसा कि ऊपर भी कहा गया है कि इस किताब में मानो कहानी और नज़्म की मुलाकात हो गईहै । किताब को पढ़ते समय कथा की कवितात्मकता हमारे साथ चलती है और हमें बाँध कर रखती है । जिस तरह कविता यह माँग करती है कि पाठक धीरे- धीरे उसका स्वाद ले, इश्क़ में माटी सोना भी ठहर कर स्वाद लेने का आग्रह करती है । और फिर वह स्वाद मुँह में बैठ जाता है, बहुत- बहुत देर के लिए । इसलिए भी इश्क़ में माटी सोनाने पिछले 6 सालों में कहाँ तक का सफ़र किया है, उसको जानना बहुत ही दिलचस्प होगा । फिर, लेखक की जिम्मेदारी लिखते रहना भी तो है !