पाठकीय
:
सपनों के ढाई घर
मुक्तिबोध ने लिखा
है –“ आलोचना की दृष्टि से जो बात सबसे पहले सामने आती है, कवि-कर्म और
रचना-प्रक्रिया की दृष्टि से वह सबसे अन्तिम है” । आलोचना की दृष्टि के बजाय
पाठक की दृष्टि और कवि के स्थान पर लेखक किया जा सकता है । मुक्तिबोध ने अन्यत्र
कहा है कि “ मेरा तजुर्बा यह है कि रचनाकार के मन में सौन्दर्य का कोई नमूना,
कोई डिजाइन, कोई पैटर्न होता जरूर है” । यहाँ
भी रचनाकार के साथ पाठक को जोड़ा जा सकता है । रश्मि शर्मा के दूसरे कहानी संग्रह ‘सपनों के ढाई घर’ के विषय में कुछ बातें कह रहा हूँ
। मुक्तिबोध की उपर्युक्त दोनों बातों से पूर्ण सहमित के साथ ।
सबसे पहले संग्रह के शीर्षक ने ही ध्यान खींचा है । ढाई घर की बात आते ही
शतरंज के घोड़े की याद आ जाती है । हम जानते ही हैं कि शतरंज का घोड़ा एक बार में
ढाई घर चलता है । और यह एक दिशा में नहीं चलता । चलने को तो वह चारों दिशाओं में
चलता है, लेकिन
दो घर चलने के बाद दायें या बायें,नब्बे डिग्री पर मुड़ जाता
है । इस संग्रह की कहानियों को पढ़ते समय बार-बार यह लगा कि कोई भी कहानी एकरेखीय
गति में नहीं चलती । एक तो कहानियों में ‘फ्लैश बैक’ का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल हुआ है, जिसके कारण
वर्तमान और भूत में आवाजाही होती रहती है । दूसरे यह कि कहानियों के मुख्य पात्रों की
इच्छाओं या भावनाओं की गति भी एकदम सीधी-सपाट-सी नहीं है । साथ ही, संग्रह के शीर्षक से बरबस गिरिराज किशोर के उपन्यास ‘ढाई घर’ का नाम भी याद आया ।
कहानियों के आकार के हिसाब से यह संग्रह मँझोले आकार की नौ कहानियों का
संग्रह है । १० पेज से २४ पेज तक की कहानियाँ हैं । नौ में सात कहानियों की मुख्य
पात्र स्त्री है । इन कहानियों में स्त्री- मन, उनके परिवेश, उनकी
स्थितियों का सधा हुआ चित्रण है । एक और कहानी ‘तीज का चाँद
और पेट में उड़ती तितलियाँ’ में भी परोक्ष रूप से स्त्री
पात्र ‘रेनी’ ही मुख्य पात्र है । पूरी
कहानी का ताना-बाना ही कथा की नायिका 'रेनी ' को लेकर बुना गया है । सारी काहानियों में हर स्त्री पात्र अपने तईं खुदमुख्तार, सेल्फ
डिपेंडेंट है । यह खुदमुख्तारी उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता के कारण है, भले ही उनकी आय का स्तर जो भी हो । यहाँ तक कि ‘स्टूल’
में नानी भी पति के जाने बाद मिलने वाली फैमिली पेंशन के कारण ही
उतनी बुलंदी से रहती हैं ।
इन सातों कहानियों में स्त्री के स्वतंत्र पहचान की तलाश, उसकी कसक, उस स्वतंत्रता को पाने की इच्छा का चित्रण हुआ है । इनका हर पात्र आर्थिक
रूप से स्वावलंबी है । ‘मन के घेरे’ की
‘कृतिका’ जरूर अपने पैरों पर खड़ी नहीं
है, पर उसकी कसक उसके अंदर है । हालाँकि उसके पति के हवाले
से इसका जस्टिफिकेशन दिया गया है । लेकिन ‘कृतिका’ के मन में उठते हुए विचारों को देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि इस
जस्टिफिकेशन ने जस्टीफाइ करने में सफलता पाई है । इस कहानी में भी विधवा माँ का
पात्र है जो इंस्पेक्टर है , यानी कमाने वाले हाथों वाली । इन
स्त्री-पात्रों की आर्थिक स्वतंत्रता और उनका भावनात्मक रूप से स्वावलंबी होना या
होने की चाह रखना, आज की स्त्रियों के व्यक्तित्व का
प्रतिनिधित्व करता है । स्त्रियों के मन में चलने वाली एक सहज प्रतिस्पर्धी आवाज
भी इन कहानियों में सुनी जा सकती है । जैसे
‘स्टूल’ में मामी और कथावाचक, ‘रिंगटोन’ में आद्या और सोनी के बीच होने वाले संवाद,
या उनके मन में उठने वाले विचार
। साथ ही कहानियों में सच्चे प्रेम की तलाश भी प्रमुखता से उभर कर आई है ।
यह भी संभवतः स्त्री -स्वतंत्रता का एक पहलू है । हालाँकि इन कहानियों में यह एक
खो चुके अवसर, या कहिए एक रिग्रेट के रूप में भी है । यह
रिग्रेट कभी-कभी प्रतिहिंसा तो कभी, आत्मघाती न भी कहें, तो खुद को कष्ट में रखने वाली ज़िद के रूप में भी आता है ( ‘राहतें और भी हैं’, ‘सपनो के ढाई घर’)। एक और कॉमन बात जो मुझे लगती
है कि इन कहानियों की नायिकाएँ सिर्फ प्रेम की नहीं, अपने
पति, प्रेमी या साथी से सम्मान पाने की भी आकांक्षी हैं ।
सम्मान की चाह कहानियों का केंद्रीय भाव है । ‘मोटिफ’
कहानी में पार्वती भी अपनी माँ द्वारा दूसरों से मदद, जिसे वह यानी पार्वती, भीख कहती है, स्वीकार करने से खुश नहीं होती ।
इन कहानियों में स्त्री-मन के
व्यावहारिक पक्ष को भी लेखिका ने बारीकी के साथ पकड़ा है ।
संग्रह की कहानियों के पात्रों में गुजरे हुए कल के पात्रों ( ‘स्टूल’ की नानी) से लेकर आधुनिक ( ‘सपनों के ढाई घर’ की पूर्णिमा ) सोच वाले पात्र मौजूद हैं । यानी पात्रों के व्यक्तित्व
में वैविध्य है । रुदनी है, तो श्रेया भी है । कृतिका है,तो सहोदरी भी है । मेहरबान भूत भी है तो समीर और रेनी भी हैं । आद्या और
सोनी भी ।
‘कबीरा
खड़ा बाजार’ कहानी में धर्म के मुद्दे को बहुत संवेदनशीलता
के साथ उठाया गया है। बहुत नफ़ीस और सधे हुए हाथों से विषय को बरता गया है । कहानियों
में माहौल बहुत अच्छी तरह से पकड़ा गया है । स्थान, समय और
व्यक्ति, इनसे ही मिलकर यह माहौल तैयार होता है । कहानियों
में दर्ज समय थोड़ा पीछे का भी है और अभी का आधुनिक समय भी । बाकी बातों के साथ
भाषा भी इस माहौल का बोध कराती है । फटफटिया भी है, लाल गोल
चबूतरा भी, अफगान क्रीम भी, सोहराय
पेटिंग भी, घी के कनस्तर, गुड़ की भेली
तो दूसरी तरफ जी आई टैग, अमेजन- ऑनलाइन
शॉपिंग, पान मसाला और कैंसर, आईवीएफ,
मैनीक्योर-पेडिक्योर जैसे विषयों का
समावेश भी । ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ और
बहुत हद तक ‘रिंगटोन’, और ‘मोटिफ’ में भी -- इनको छोड़ कर बाकी कहानियाँ मध्य, उच्च मध्यवर्ग की हैं। इन कहानियों में लेखिका दृष्टि बहुत ही महीन है –
मन भात-सा खदकता है, मन में कुछ खदबदाता भी है । वीआरएस की
चर्चा भी है, सोहराय पेंटिंग बनाने की प्रक्रिया भी तो
आईवीएफ जैसी तकनीकी प्रक्रिया का विवरण भी । लैंडलाइन फोन भी है, तो अठारह मिस्ड कॉल भी ।
‘मेहरबान
भूत’ कहानी का अंदाजे-बयाँ सबसे आनंददायक है । इस कहानी का
मिज़ाज बाकी कहानियों की तुलना में अलग है ।
जैसा कि ऊपर कहा भी है कि संग्रह का
शीर्षक पढ़ते ही गिरिराज किशोर के उपन्यास ‘ढाई’ घर का ध्यान आया । यह
उपन्यास और इस संग्रह में कोई साम्य खोजने की कोशिश नहीं है । संयोग से उपन्यास उपलब्ध
था । उत्सुकतावश उपन्यास के कुछ पन्ने पलटा । दूसरे ही पृष्ठ पर कुछ पंक्तियाँ
दिखीं, जो कहीं न कहीं इस संग्रह की कहानियों के भाव से भी
मेल खाती हैं । पंक्तियाँ ऐसी हैं – “पर ध्यान ध्यान ही होता है, लगाव लगाव । लगाव तो अब रहा नहीं । उसी तरह गायब हो गया जैसे आजकल के गोंद
से चिपचिपाहट । या तो चिपकता नहीं और चिपकता है तो बहुत कम । हाँ, ' ग़म ' जरूर चिपकता है” । ये पंक्तियाँ एक बाप की हैं, अपने बेटे के लिए । यह उपन्यास 1991 में आया था । संयुक्त परिवार की
व्यवस्था टूट ही चली थी । उपन्यास की ये पंक्तियाँ उसके आगे की टूटन को दिखा रही
हैं । अब बाप-बेटे में भी लगाव नहीं बचा । यह हमारे समय का सच हो चुका है कि अब
संतान भी माँ-बाप के साथ नहीं रह पाती । साथ रहना तो बहुत दूर की बात है , जरूरत के समय साथ खड़ी भी नहीं हो पाती । उपन्यास की इन पंक्तियों को पढ़कर
इस संग्रह की कहानियों के बीच भी एक तार बँधा हुआ दिखने लगा । संयुक्त परिवार टूटा,
संतान दूर हो गई माता-पिता से लेकिन तब भी यह कह कर संतोष कर लेते
हैं लोग कि बस दो जने ही होते हैं एक-दूसरे का खयाल रखने के लिए । संग्रह की
कहानियाँ शायद एक और भयावह भविष्य की ओर इशारा कर रही हैं । इसकी शुरुआत तो शायद
हो भी चुकी है । वह बात है पति-पत्नी या स्त्री-पुरुष के बीच का ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ । आप पूर्णिमा की बात कीजिए,
सोनी की बात कीजिए, सहोदरी की बात कीजिए,
कृतिका की बात कीजिए, श्रेया की बात कीजिए ,
स्त्री और पुरुष के बीच भरोसे की घोर कमी या एक ‘बिट्रेयल’ या विश्वासघात की बात नजर आएगी । पुरुषों द्वारा स्त्रियों के साथ । ‘अन्ना केरेनिना’ उपन्यास की पहली पंक्ति है “ Happy families
are all alike; every unhappy family is unhappy in its own way” . इस संग्रह की कहानियों की नायिकाओं के
सुखी होने का, मेरी
समझ से, एक ही आधार है – प्रेम और आत्मसम्मान । लेकिन यह
उनके स्वावलंबी होने में कतई बाधा नहीं डाल सकता । आद्या या श्रेया जैसी स्त्रियाँ
ऊपर से भले ही खुश और संतुष्ट दिखें, अंदर ही अंदर अपने हालात
से वे असंतुष्ट हैं । हर एक का अपना दुख और उस दुख के अपने कारण । बच्चन जी ने
लिखा है –
दिवस में सबके लिए
बस एक जग है
रात में हर एक
की दुनिया अलग है
यह ठीक है कि आर्थिक
स्वतंत्रता एक बड़ा कारण है लेकिन यह एक
पहलू मात्र है । स्त्रियों को किसी भी रूप में पराश्रित बनाए रखा जाना स्वीकार्य
नहीं है । यह सही है कि आर्थिक रूप से
पराश्रित होने पर बात कुछ ज्यादा खलती है, कुछ ज्यादा तीखी लगती है । जैसे आद्या के मन
में सोनी द्वारा खरीदे गए महँगे मोबाइल को देख कर उठने वाले विचार । इसी का क्रूर
रूप है ‘मन के घेरे’ में शलभ द्वारा
कृतिका को यह कहा जाना कि “ तुम्हारे मायके से नहीं आए हैं पैसे” । कृतिका और शलभ
का प्रेम विवाह हुआ है, लेकिन स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि
शलभ की बीमारी की आशंका में कृतिका ‘अनहोनी’ के घट जाने और उसके बाद अकले रह लेने के लिए भी खुद को तैयार कर लेती है ।
भले ही यह एक आवेग-सा क्षण आ कर गुजर जाता है, लेकिन हालत
कहाँ तक बिगड़ चुकी है, यह तो दिख ही जाता है । इस वाकये ने ग़ालिब के इस शेर का एक और अर्थ
मेरे सामने खोल दिया है --
मुनहसिर मरने पर हो
जिसकी उमीद
ना-उमीदी उसकी देखा चाहिए
·
मुनहसिर – निर्भर
जरा सोचिए तुलसी ने
कब कहा था !—
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं ।
पराधीन सपनेहू सुखु नाहीं ।
यह भी ध्यान देने
वाली बात है कि तुलसी ने यह कथन पार्वती जी के विवाह के समय उनकी माता से कहलवाया
है । जब देवी-देवताओं के संबंध में भी यह बात कही जा सकती है तब आमजन का कहना ही
क्या ! रामचरितमानस के साढ़े चार सौ साल
बाद भी हम इन कहानियों के जरिए वैसे ही हालात से रूबरू हो रहे हैं । बहुत संभव है
कि कई लोग इन कहानियों को कल्पना-मात्र मान कर संतोष कर लें । लेकिन कहानियाँ एकदम
जानी-पहचानी- सी हैं। बल्कि इतनी जानी-पहचानी-सी
कि कभी-कभी पाठक उनमें व्यक्त होने वाली सच्चाई से एकबारगी मुँह मोड़ना चाहे , जैसे, ‘मन के घेरे’ में । ‘ढाई घर’
उपन्यास की पंक्ति है कि “ बिना घटित हुए साहित्य में कुछ नहीं आता ।
भले ही हम उसे कल्पना मानकर नकार दें” ।
कहानियाँ सुनी-सुनाईं- सी लगती हैं, यह ठीक है । लेकिन दूसरी तरफ वे उतनी ही
पठनीय भी हैं । आप किसी कहानी को बीच में छोड़ नहीं सकते । लगभग हर कहानी में
नाटकीयता के तत्त्व और उनकी दृश्यात्मकता कहानियों पर फिल्म बनाए जाने की संभावना
जगाती है । खास तौर पर ‘मन के घेरे’ और
‘रिंगटोन’ पर तो फिल्म बनाई ही जा सकती
है । वैसे ‘मोटिफ’ में ऑस्ट्रेलिया
जाने वाले प्रसंग से ‘चक दे’ फिल्म का
महिला हॉकी टीम का ऑस्ट्रेलिया जाने वाला प्रसंग याद आ गया । इसी तरह ‘तीज का चाँद और पेट में उड़ती तितलियाँ’ में जब समीर
रेनी को अपना ‘प्रेम-पुरजा’ देता है,
तब रेनी यह कह्ते हुए कि “ पागल हो गए हो क्या?” पुरजे को फाड़ कर फेंक देती है । अगर आपने शाहरुख खान की ‘डर’ देखी हो, तो फिल्म के अंत
का वह दृश्य याद कीजिए जब जूही चावला शाहरुख खान के लिए सनी देओल से कहती है –“
किल हिम !” । इस संवाद के बाद शाहरुख खान के चेहरे का वह एक्सप्रेशन जिसमें हठात्
सबकुछ खो देने का भाव है, समीर के भाव से मेल खाता हुआ
पाएँगे ।
हर कहानी का अपना वजूद होता है और वह अपने साथ अपना फॉर्मैट खुद ही लेकर आती
है । अलग-अलग पढ़ने पर शायद कुछ बातों पर ध्यान न जाए, संग्रह में कहानियों को
एक साथ पढ़ने पर कुछ चीजें दिख जाती हैं ।
इसमें सही-गलत जैसी कोई बात नहीं होती, हाँ,अलग बात जरूर हो सकती है । एक
पाठक अपनी सीमित समझ के साथ कुछ महसूस करता है, समझता है । संग्रह
की ऐसी ही कुछ बातें जिन पर ध्यान चला जाता है –
कहानियों को पढ़ते समय एक बात यह लगती है कि कहानियों के अंत पर शायद और काम
किया जा सकता था । अक्सर लगता है कि अंत में आकर कहनियों को समेटा जा रहा है ।
‘मेहरबान
भूत’ को छोड़ दिया जाए तो बाकी कहानियाँ एकबग्गी, एक सुर में बात करने वाली भी लग सकती हैं । यह कोई कमजोरी नहीं, इस संग्रह का ‘फ्लेवर’ है ।
कभी-कभी यह भी लग सकता है कि स्त्रियों के पक्ष में पुरुषों के खिलाफ ex parte फैसला-सा सुनाया जा रहा है । मनोहर और
मोहित जैसे पात्र भी हैं, लेकिन
माइनॉरिटी में हैं और साइलेंट-से भी !
कहानियों में झारखण्ड का भूगोल भी उपस्थित है । जगहों के नाम हैं, लेकिन शायद उनमें उतनी
जान नहीं है, जितनी कि हो सकती थी । कम-से-कम, ‘मोटिफ’ में उल्लेख किए गए ‘इस्को’ गुफा की और बेहतर तरीके से पहचान कराई जा
सकती थी ।
कहानियों में ‘कोटेबल
कोट्स’ जैसे वाक्य कुछ और होते तो ज्यादा आनंद की बात होती ।
इस किताब को पढ़ना
भी ढाई घर वाली चाल में ही हुआ है । सबसे पहले अंतिम यानी संग्रह के शीर्षक वाली
कहानी। फिर दूसरी कहानी से आठवीं कहानी तक और अंत में पहली कहानी यानी ‘स्टूल’ ।
***
हाल ही में 30 अगस्त गुजरा है । 30 अगस्त गीतकार शैलेन्द्र का जन्मदिन है ।
इस संग्रह की कहानियों और शैलेन्द्र के गीतों पर सोचते हुए कुछ कड़ियाँ जुड़ती हुई
दिखीं । इस संग्रह में जो स्त्री पात्र हैं वे तीन तरह की स्थितियों से गुजर रही
हैं । बल्कि बात स्त्री-पुरुष की भी नहीं, बात व्यक्ति-मात्र की है । पहली स्थिति में
व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के वश में होता है । झखता-कुढ़ता, दु:खी
। वह शायद अपने हालात बदलना चाहता भी है, पर मुश्किलों में
घिर कर,उनसे दब कर
रह जाता है । ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ की सहोदरी, ‘मन के घेरे’ की
कृतिका और ‘मोटिफ’ की रुदनी की स्थिति कुछ
ऐसी ही है । शैलेन्द्र ने ‘सीमा’ फिल्म
के लिए एक गीत लिखा है ‘तू प्यार का सागर है’ । इस गीत का यह अंतरा क्या ऐसे
ही दुखी व्यक्तियों के बारे में नहीं बता रहा ? –
घायल मन का पागल
पंछी, उड़ने
को बेकरार
पंख हैं कोमल, रात है धुंधली, जाना है सागर पार
अब तू ही इसे समझा, राह भूले थे कहाँ से हम
दूसरी तरह के व्यक्ति वे हैं, जो किसी से कृपा-स्वरूप कुछ पा कर खुश हो
जाते हैं । संतुष्ट हो जाते हैं । बल्कि धीरे-धीरे उनकी आदत ही हो जाती है कि हर
खुशी ही ‘प्रदत्त’ होने लगती है । पाने
वाले की नहीं , देने वाले की मर्जी असली बात होती है । ‘काला बाजार’ के गीत ‘सच हुए
सपने तेरे’ में शैलेन्द्र ने लिखा है –
मन की पायल छम छम
बोले हर एक साँस तराना
धीरे धीरे सीख लिया
अँखियों ने मुस्काना
हो गए दूर अँधेरे
ऐसे व्यक्ति अपनी
खुशी के लिए दूसरों पर आश्रित हो जाते हैं । ‘रिंगटोन’ की आद्या और
कुछ हद तक ‘स्टूल’ में नानी का पात्र
कुछ ऐसा ही है । अपनी खुशियों के लिए आद्या
अपने पति की आय, तो नानी पति के जाने के बाद उसके नाम मिलने
वाली फैमिली पेंशन पर ही तो आश्रित है । और आम तौर पर खुश भी ।
तीसरी तरह के व्यक्ति स्वतंत्र चित्त के व्यक्ति होते हैं । परिस्थितियाँ
उनको जकड़ नहीं पातीं । वे अपने को जड़-बंधनों से मुक्त कर लेते हैं । बीती बातों को
भूल, आगे
की ओर देखने लगते हैं । याद कीजिए ‘गाइड’ का गीत ‘आज फिर जीने की
तमन्ना है’ और उसका यह अंतरा –
कल के अँधेरों से
निकल के
देखा है आँखें मलते-मलते
फूल ही फूल जिंदगी बहार
है
तय कर लिया
यही ‘तय कर लेना’ आदामी को आदमी बनाता है । ‘रिंगटोन’ की सोनी, ‘राहतें और भी हैं’ की
श्रेया, ‘मोटिफ’ की पार्वती या कुछ हद
तक ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ की सहोदरी ।
चाहें तो इसमें ‘सपनों के ढाई घर’ की
पूर्णिमा का नाम भी जोड़ लीजिए । इनका मिजाज भी ‘तय कर लिया’
वाला ही है !
***
रश्मि शर्मा के इस
संग्रह ‘सपनों के ढाई घर’ को
पढ़ने के बाद उनके अगले संग्रह की प्रतीक्षा की जा सकती है । संग्रह पढ़ने के बाद
अगले संग्रह की प्रतीक्षा शुरु होती लगे तो यह शुभ संकेत है ।
अस्तु !

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें