सखि, कुछ तो भार उठाने दो
[‘बेमिसाल’ फिल्म में सुधीर ( अमिताभ बच्चन) द्वारा कविता
( राखी) को ‘सखी (सखि)’ कहकर बुलाया जाता
है । एक पुरुष द्वारा एक स्त्री को सखी कहकर सम्बोधित करना नई बात लगी थी । जहाँ तक
याद है, कविताओं में ऐसा सम्बोधन नहीं है । ‘सखि, वे मुझसे कहकर जाते’ या ‘क्यों सखि साजन...’ । बरसों बाद राँची के ‘शब्दकार’ में राजीव जी द्वारा ऐसा सम्बोधन सुना । कुछ
बरस पहले लिखी यह कविता किंचित् सुधार के साथ प्रस्तुत है ।]
सखि, कुछ
तो भार उठाने दो
जरा मुझको भी निभाने
दो
एकल-एकल जीवन क्या है
यही सफल, तो जीवन क्या है
कुछ जीवन को सुलझाने दो
सखि, कुछ
तो भार उठाने दो
यह इच्छाओं का जाल बड़ा
इससे जीवन जंजाल बड़ा
कभी मन
को ही मनाने
को
सखि, कुछ
तो भार उठाने दो
जीवन का विस्तार बहुत है
देखो तो निस्तार बहुत है
भव-बाधा पार कराने को
सखि, कुछ
तो भार उठाने दो
बढ़ना भी बहुत जरूरी है
दृढ़ रहना बहुत जरूरी है
पैरों को यहाँ जमाने को
सखि, कुछ
तो भार उठाने दो
निष्काम करें कुछ काम,
सखे
कुछ छोड़ें अपना नाम ,
सखे
मुझको इतना समझाने दो
सखि, कुछ
तो भार उठाने दो
जिसका न लगे कुछ भार ,
सखे
कहते हैं उसको प्यार, सखे
अभी खुद को आजमाने दो
सखि, कुछ
तो भार उठाने दो
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