बुधवार, 4 नवंबर 2026

खुदा खैर करे...!


 

खुदा खैर करे...!

 

 

“ एक बार जब मैंने एक जरूरतमंद स्त्री को कुछ राशि देकर यौन क्रिया की तो मुझे बहुत ग्लानि हुई, अपने को धिक्कारा और लम्बे समय तक मेरे मन और शरीर पर उसके दुष्परिणाम रहे। यानी भोगना भोगना ही पड़ता है। लेकिन अकसर ऐसा नहीं होता। पाप ही फलता है। इस पर धार्मिक लोग कहेंगे कि इसका फल उसे अगले जनम में मिलेगा ।”

 

“ इसलिए छोटे छोटे सम्बंध तो कई बने । लेकिन लम्बा चलने वाला प्रेम कोई न बना। शायद मैं प्रेम करने लायक न था। मुझमें स्वार्थ अधिक है। रिश्तेदारी में कई जगह एक एक दो दो दिन या रात के रिश्ते बने। एक जगह वह मेरे साथ चलना चाहती थी। अभी हाल में एक स्त्री ने कहा, तुममें सामाजिक साहस का अभाव है। उसने सही कहा। और इसकी कमी का एक कारण मुझमें प्रेम करने वाले धैर्य और शक्ति की कमी है। जो इंतजार नहीं कर सकता वह प्रेम भी नहीं कर सकता। प्रेम जैसे दशरथ मांझी ने किया। जबकि मैं तत्काल सब कुछ चाहता रहा। इस बार मेरा खिंचाव घर में काम करने वाली एक दाई की तरफ हो गया। एक दिन जब मैं उसकी बांह पकड़े उसे खींच रहा था वह पीछे हटती जा रही थी हंसती हुई। मेरी मुट्ठी नीचे खिसकती जा रही थी। और वह खिलखिला कर भागी। और मेरी चुटकी में उसकी बांह के नीचे कुहनी के ऊपर वाले गड्ढे से छूट कर देह की मैल रह गयी। ऐसी वितृष्णा पहले कभी न हुई। तो इसी मैल के लिए मैं इन देहों के पीछे भाग रहा हूं ।”

 

उपर्युक्त पंक्तियाँ आलोकधन्‍वा की नहीं हैं । इसीलिए नजरों में नहीं आई होंगी, चर्चा में तो खैर बिल्कुल ही नहीं । मुझे ‘दीवार’ का डायलॉग सुनाई पड़ने लगा है – “ दूसरों के पाप गिनाने से तुम्हारे खुद के पाप कम नहीं हो जाते ।” वैसे , ये पंक्तियाँ एक बड़े कवि के संस्मरण का भाग हैं, जो एक लब्धप्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित है । लब्धप्रतिष्ठित पत्रिका पब्लिक स्पेस की चीज है , यानी उसका देखा जाना प्रतिबन्‍धित नहीं है ।

क्या आपने आलोकधन्‍वा की कोई फेसबुक-पोस्ट देखी है? क्या आप उनकी पोस्ट देख सकते हैं ? उनकी पोस्ट वही देख सकते हैं, जो उनकी ‘फ्रेंड लिस्ट’ में हों । उनकी फ्रेंड लिस्ट बड़ी है, लेकिन फिर भी है तो एक ‘क्लोज़्ड सर्किल’ या प्रतिबन्‍धित क्षेत्र ही । उस लिस्ट में बने रहना क्या बाध्यकारी है ? यह तो उनके ‘मित्रगण’ ही बता पाएँगे ।

इसमें कोई शक नहीं है कि आलोकधन्‍वा का मन कुंठित हो चुका है । इसीलिए लुंठित भी है । तो क्या इस वजह से उसे लुंचित भी कर दिया जाना चाहिए ?

यदि किसी घर का कोई बुजुर्ग व्यक्ति अपनी मानसिक अवस्था के कारण अपने कपड़े नहीं पहनता है, या पोर्नोग्राफी देखने के पीछे पड़ा रहता है, तो घर वाले क्या करेंग़े? पकड़-धकड़ कर कपड़े पहनाएँगे, मोबाइल-लैपटॉप छीन लेंगे, इंटरनेट बन्‍द करवा देंगे, घर से निकलना बन्‍द कर देंगे, एक कमरे में बन्‍द कर देंगे । साथ ही साथ किसी डॉक्टर से इलाज की व्यवस्था भी करेंगे । या कि वे गली में खड़े हो कर हर आने-जाने वाले को रोक-रोक कर बताते फिरेंगे कि घर के बुजुर्गवर कैसे अशिष्ट और अश्‍लील हो गए हैं । खुद भी गरियाएँगे और आने-जाने वालों को भी गरियाने को कहेंगे । घर की ऐसी बातें वैसे भी लोग किसी को बताने से कतराते हैं, फिर ऐसे लोगों को तो बिल्कुल ही नहीं, जो घर के बारे में जानते ही नहीं, किसी को पहचानते ही नहीं । अगर हर उपाय निष्फल हो जाए तो फिर छोड़ देंगे उसे अपने हाल पर मर-खप जाने के लिए !

मानसिकता, नैतिकता, अपराध और बीमारी – सबको एक जैसा तो नहीं मान सकते । ये चारों पकड़ में आएँ, तभी उनके प्रभाव का पता चलता है । चारों को आँकने के लिए मापदण्ड भी होते हैं । मानसिकता और नैतिकता के लिए अमूमन एक अलिखित आचार-संहिता काम करती है । अक्सर, जो लोक में मान्य नहीं है, वह अनैतिक है ।  लोक में मान्य या अमान्य होने की बात तभी उठेगी जब वह किसी को पता चले, या जब कोई उसे बताए । फिर इसमें हर व्यक्ति का अपना फिल्टर काम करता रहता है । किसी का छिद्र छोटा, किसी का बड़ा । किसी का रंग लाल, किसी का हरा ।

क्यों न एक आचार-संहिता बना दी जाए ? चूँकि ‘लेखक’ को शुद्ध करना अभीष्ट है, लेखकों के सम्बन्‍ध में इन बिन्‍दुओं पर भी विचार किया जा सकता है –

 

·      शराबखोरी को दुराचार माना जाए या नहीं? नशे में धुत्त होकर जो लेखकगण ‘लीलाएँ’ करते हैं, उन्हें स्वीकारा जाए या नहीं?

·      मेडिकली भी जिन वस्तुओं का सेवन जानलेवा माना जाता है, यथा- तम्बाकू, उनका सेवन करने वालों का बहिष्कार किया जाए या नहीं ?

·      सहमति और बिना सहमति, तथा इरादतन और गैरइरादतन कब माना जाएगा और कब नहीं ?

·      कवि-लेखक-आलोचक होने के बावजूद जो जाति आदि खेमेबाजियों में लिप्त रहते हैं और जानते-बूझते प्रतिभाओं की अनदेखी करते हैं, उन्हें किस श्रेणी में रखा जाए ?

·      प्रतिष्ठित लेखकगण लेखिकाओं के विषय में पीठ पीछे और कभी-कभी तो भरी महफिल में भी,जो अशोभनीय टिप्पणियाँ कर जाते हैं, उनका क्या हो ?

·      विज्ञापन के लोभ में पत्रिका में पृष्ठ उपलब्ध कराने वाले सम्पादक और लाभार्थी लेखकों की मान्यता रद्द की जाए या नहीं ? इसमें मुँह देखकर समीक्षा/प्रशंसा करने वालों को भी रखा जाए या नहीं ?

·      पैसे का लेन-देन कर किताबें छ्पवाने वाले प्रकाशकों-लेखकों को क्या हर तरह के पुरस्कार की पात्रता से बाहर कर दिया जाए ? और वैसे लेखक जो पद, पैसे और पहुँच का उपयोग कर किताबें बाँट-बाँट कर समीक्षाएँ लिखवाते हैं और कार्यक्रम करवाते हैं, उनका क्या किया जाए?

·      साहित्य के कर्ता-धर्ता जो अपने रसूख के बल पर अपने नाकाबिल नाते-रिश्तेदारों-यारों को विभिन्न पदों पर स्थापित करते हैं, उनको ब्लैक लिस्ट किया जाए या नहीं?

 

कोई भी सत्य परम् सत्य नहीं होता । कोई भी बात निरपेक्ष नहीं होती । क्रिया-प्रतिक्रिया स्वत:स्फूर्त है या देखादेखी अथवा किसी के उकसाने का नतीजा, यह भी तय कर पाना आसान नहीं । स्वान्‍त:सुखाय जैसी बात भी शायद निरर्थक हो गई है । हो सकता है पीड़क पीड़ित निकले , और जिसे हम पीड़ित समझ रहे हों , वह कोई शातिर पीड़क । किसी कलाकार- साहित्यकार या किसी भी लोकप्रिय व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी सजा उसके प्रति दिखाई गई उदासीनता है । वैसे भी किसी की किसी बात पर प्रतिक्रिया देना उस बात या व्यक्ति के महत्त्व को ही दिखाता है । यदि उसने साजिश के तहत वह बात कही है , तो उस बात पर होने वाली प्रतिक्रियाओं से उसका ध्येय पूरा होता है । यदि उसे इस बात का होश ही नहीं कि वह क्या कह-कर रहा है, फिर उसका नोटिस ही क्या लेना । दोनों ही स्थितियों में इग्नोर किया जाना ही श्रेयस्कर है ।

हो सकता है आलोकधन्‍वा आपको पतित और निकृष्ट व्यक्ति लग रहे हों । आप पर कोई बाध्यता तो है नहीं, उनकी पहुँच से बाहर निकल जाइए ।  हो सकता है, उनके साथ कभी फोटो खिंचवा कर आपने उनसे अपनी नजदीकी साबित की हो । ऐसी तस्वीरें, हो सकता है, आज आपके कष्ट का कारण हों । जला डालिए उनको । उनकी किताबों को कचरे के डब्बे में फेंक दीजिए । वे समाज के लिए खतरा (!) बन चुके हैं , तो उन्हें अकेला कर दीजिए, अकेला छोड़ दीजिए । कमजोर और निष्कवच व्यक्ति प्रत्युत्तर भी नहीं देता, नहीं दे सकता ।  हर व्यक्ति को मृत्यु तक पहुँचना होता है, वे भी पहुँच जाएँगे ।

कवि ऐतिहासिक व्यक्ति हो, जरूरी नहीं । उसकी कविता ऐतिहासिक होती है, यदि उसमें दम है । सौ-दो सौ-तीन सौ साल पहले के कितने कवियों के व्यक्तिगत जीवन के विषय में हम जानते हैं, और कितना ? आज से सौ साल बाद किस कवि की कौन-सी कविता बची रहेगी, यह भी कहा नहीं जा सकता ।

निदा फ़ाज़ली का एक शेर है –

 

                        हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

                        जिसको भी देखना हो कई बार देखना

 

बुरे की आलोचना और विरोध करना धर्म है । लेकिन ‘बुरा’ और उसकी ‘बुराई’ की परिभाषा मुखापेक्षी भी हो सकती है । किसी ‘अपने आदमी’ के विषय में बात करते हुए लोग ‘लिबरल’ होने लगते हैं । यदि सामने वाला कुछ बिगाड़ सकने की स्थिति में हो, या कोई उचित-अनुचित लाभ पहुँचाने की स्थिति में हो, तो लोगों की वाणी मुलायम हो जा सकती है ।

            हम एक विचित्र समय में जी रहे हैं । रेल के डब्बों/ प्लेटफॉर्मों लिखी चेतावनी ‘ यात्री अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें’ और सिनेमा में दिखाई जाने वाली सलाह कि ‘ दर्शक अपने विवेक का इस्तेमाल करें’ की जरूरत बढ़ती ही जाती है । जाँ निसार अख़्तर की लिखी और कब्बन मिर्ज़ा की गाई हुई  ‘रज़िया सुल्तान’ फिल्म की गजल के दो शेर याद आ रहे हैं –

 

                                    आई ज़ंजीर की झनकार, ख़ुदा ख़ैर करे

दिल हुआ किसका गिरफ्तार, ख़ुदा ख़ैर करे

 

लम्हा लम्हा मेरी आँखों में खिंची जाती है

एक चमकती हुई तलवार, ख़ुदा ख़ैर करे

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