सोमवार, 2 नवंबर 2026

प्रेमेर खेला के बुझते पारे

 

प्रेमेर खेला के बुझते पारे


प्रेमेर खेला के बुझते पारे

बोझोना रे मन ठोरे ठारे *


प्रेम का खेला कौन समझा रे 

समझो रे मन तुम समझो इशारे

प्रेमेर खेला के बुझते पारे

बोझोना रे मन ठोरे ठारे 


देखो दैव-कृपा तो हुए बिना  

सब सामने हो फिर भी दिखे ना 

हो व्याकुलता, फिर आरे-पारे 

प्रेमेर खेला के बुझते पारे


चाहे चलो-रुको तुम  रुको-चलो

बस बात से तुम अपनी मत टलो 

कोई किसी को नहीं है तारे

प्रेमेर खेला के बुझते पारे


है अन्दर-अन्दर जितना उतरे

मुँह दुनिया का है उतना सँवरे 

आँख मुॅंदी और भरे उजियारे

प्रेमेर खेला के बुझते पारे


मुँह से कहे ना आँख से देखे

फिरे हैं कितने अपने सरीखे

बोझोना रे मन ठोरे ठारे

प्रेमेर खेला के बुझते पारे

                              छंद -१६


* ये दोनों पंक्तियाँ 'श्री श्री रामकृष्ण कथामृत' में अलग-अलग प्रसंगों में आई हैं ।

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