गुरुवार, 16 नवंबर 2023

कालीचाट

 

कालीचाट

निर्देशन : सुधांशु शर्मा, लेखक : सुनील चतुर्वेदी, पटकथा, संवाद : सोनल शर्मा
Neolit Publications, Indore

 

 

 

अभी पिछ्ले दिनों एक फिल्म देखी ट्वेल्थ फेल। फिल्म अच्छी लगी तो उस उपन्यास को पढ़कर देखने की इच्छा हुई जिस पर यह फिल्म बनी है । उपन्यास का ऑर्डर करते समय वह एक कॉम्बो पैक में दिखा। दूसरी किताब थी लेखिका सोनल की फिल्म बनती है... और बनाती भी है !फिल्म बनती है... और बनाती भी है !एक फिल्म के बनने की कहानी है। फिल्म का नाम है कालीचाट’, जो सुनील चतुर्वेदी के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है । फिल्म की पटकथा और संवाद सोनल ने लिखे हैं । किताब इतनी रोचक लगी और फिल्म की कथा-वस्तु ने इतना आकर्षित किया कि किताब पढ़ने के बीच में ही सोनल जी को मेसेज कर पूछा कि फिल्म कैसे देखी जा सकती है । और पहले से भी पेश्तर  की तर्ज़ पर उनका जवाब आ गया फिल्म की लिंक के साथ । किताब खत्म होते ही फिल्म देखी गई।

 

फिल्म मालवा-निमाड़ क्षेत्र के एक गाँव के एक किसान की कहानी है । और यह कहानी उतनी ही सच है जितना हमारा जीवन । किताब में लेखिका ने पिकासो को उद्धृत किया है – कला एक झूठ है...फेंटेसी है, लेकिन यह कला ही है जो हमें जीवन के सत्य के दर्शन करवाती है । फिल्म की कहानी इस तरह से बुनी गई है कि आपको एक पल के लिए भी छोड़ती नहीं। आप फिल्म देखते जाते हैं और लगातार सोचते जाते हैं कि अब भी, अब भी ऐसा हो रहा है ! 1936 में प्रकाशित प्रेमचंद का गोदान’, 1954 में प्रकाशित रेणु का मैला आँचलऔर 1968 में प्रकाशित श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारीअगर आपने पढ़ा हो तो इस फिल्म को देखकर आप यह जरूर सोचेंगे कि भारत बदल कहाँ रहा है ? सबकुछ चला आ रहा है जस का तस । फिल्म एक किसान के जीवन ( इसे एक साधारण ग्रामीण का जीवन भी कहा जा सकता है) को इस तरह से, इतने करीब से दिखाती है कि आप फर्क ही महसूस नहीं कर पाते, फिल्म से अपनी दूरी नहीं बनाए रख सकते । फिल्म आप में प्रवेश कर जाती है, आप फिल्म में प्रवेश कर जाते हैं। यह फिल्म की कथा, पटकथा, संवाद, अभिनय, संगीत और निर्देशन – फिल्म के हर विभाग के अव्वल दर्जे का होने के कारण ही संभव हो पाया है । एक घंटे दस मिनट की यह फिल्म एक ऐसे सच से रूबरू कराती है जिसके बारे में हम रोजाना सुनते तो हैं लेकिन दूसरी तरफ मुँह फेर कर बचकर निकल जाते हैं । फिल्म उसी सच को हमारी आँखों में उँगली गड़ाकर दिखाती है और बेचैन कर देती है । देश में रहने वाला कोई व्यक्ति तभी इतना बेबस और लाचार हो सकता है जब पूरा सिस्टम ही फेल हो जाए । पहले दृश्य से ही फिल्म इतनी विश्वसनीय है कि फिल्म के समाप्त हो जाने के बाद भी फिल्म आपके साथ रह जाती है । फिल्म अपने संवादों से मालवा की आँचलिकता को साथ लिए चलती है, लेकिन यह पूरे भारत के किसानों की पीड़ा को स्वर देती है ।

 

कालीचाटफिल्म बनी 2016 में और यह महज संयोग ही है कि इस फिल्म को देखने का मौका मुझे मिला । यह फिल्म किसी बड़े , नामीगिरामी निर्माता निर्देशक की फिल्म होती तो मीडिया भी तारीफों के पुल बाँधता लहालोट हो रहा होता । फिल्म की नायिका के लुक के लिए अभिनेत्री गीतिका श्याम द्वारा की गई तैयारी, जिसमें घंटों धूप में बैठना और उड़ती हुई रेत के सामने खड़ा रहना शामिल है, और जिसे फिल्म के निर्देशक सुधांशु शर्मा मेक डाउनकहते हैं , उस तैयारी की खूब चर्चा की गई होती । खैर, फिल्म ने अपने समय को डॉक्यूमेंटकर लिया है और इतिहास में दर्ज की गई हर ईमानदार बात बची रहती है पीढियों को रास्ता दिखाने के लिए ।  

स्व. जयप्रकाश ने कालीचाटके विषय में बात करते हुए लिखा है – ...इस फिल्म को संसद और विधानसभाओं में दिखाया जाना चाहिए ताकि हमारे हुक्मरान किसान की वेदना को समझ सकें । मुझे लगता है इस फिल्म को राज्यों के प्रशासनिक सेवा और बैंकों के प्रशिक्षण केंद्रों पर भी अनिवार्य रूप से दिखाया जाना चाहिए । ब्लॉक या तहसील स्तर के प्रशासनिक कार्यालयों के कर्मचारियों को भी यह फिल्म दिखाई जानी चाहिए । कहीं तो किसी की आँख का पानी बचा हुआ होगा ! स्व. विष्णु खरे ने फिल्म पर लिखा है – एक फिल्म निर्देशक को किसी साहित्यिक कृति का कैसा इस्तेमाल करना चाहिए यह भी इससे उजागर होता है । मैं इसमें जोड़ना चाहता हूँ कि एक फिल्म के जरिये एक निर्देशक किस तरह साहित्य की रचना करता है यह फिल्म इसका भी एक बेहतरीन उदाहरण है ।

फिल्म देखते हुए यह खयाल आया कि आदमी टूटता कब है ?  सरकारी कर्मचारी/अधिकारी जो लोक-सेवा के लिए चयनित होते हैं, वे शासक बन बैठते हैं और अपनी ही जनता को लूटने- खसोटने लगते हैं । बैंक या किसी भी संस्था के जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्ति जब जरूरतमंदों की बात तक सुनने को तैयार नहीं, और बात सुन भी ली तो जिम्मेदारी के साथ जवाब देने को तैयार नहीं । जब करीबी दोस्त जिनसे गाढ़े समय में कम से कम सही सलाह- मशविरे की उम्मीद होती है, वो भी चलताऊ किस्म की बातें कर जाएँ भले ही कितना भी नुकसान क्यों न होता जाए । और जब जीवन साथी का ही धैर्य जीवन के सबसे नाजुक और कमजोर क्षणों में चुक जाए, जब एक तिनके भर का सहारा भी बहुत हो सकता है,  धीरज के दो शब्दों की जगह ताने सुनने को मिले । व्यक्ति टूट जाता है । इस टूटन को आप बहुत शिद्‍दत के साथ महसूस करते हैं कालीचाटको देखकर ।

अब कुछ बातें उस किताब के बारे में भी जिसे पढ़कर इस फिल्म को देखने का संयोग बना । फिल्म बनती है...और बनाती भी है!लेखिका सोनल की यह किताब बहुत ही रोचक है। डायरीनुमा इस किताब का प्रवाह इस कदर अच्छा है कि किताब पूरी पढे बिना आप इसे रख नहीं सकते । एक प्रसंग वे लिखती हैं – ये तो वो है जो मैं निरी गैर तकनीकी व्यक्ति समझ पाई और याद रख पाई । असल में तो मैं आपको फिल्म निर्माण से जुड़े किस्से सुना कर उस दिन के तनाव को आज के आनन्‍द में बदलना चाहती हूँ । यही आनंद एक निरा गैर तकनीकी पाठक इस किताब में फिल्म निर्माण से जुड़े किस्से पढ़कर पाता है । वह समझ पाता है कि फिल्म निर्माण कितनी मेहनत का काम है । कितने जोश और जज़्बात का । कितनी शिद्दत से कई लोगों को लगना पड़ता है एक फिल्म को बनाने में । फिल्म विश्‍वसनीय तभी बन पाती है ।

 

अंत में लेखिका सोनल के कविता संग्रह पता नहींसे एक कविता ओ किसानउद्धृत है जिसे स्व. जयप्रकाश चौकसे ने भी कालीचाटफिल्म से संबंधित अपने लेख में उद्धृत किया है –

 

      खेत खेत उचक कर चारों ओर

      देख रही है टापरियाँ

      हर खेत में बोए गए हैं कई कई मन

      और कई कई इच्छाएँ

      दादा का ऑपरेशन

      गुड्डी की शादी

      खेत में बोने को अगली फसल के बीज

 

      पुकार रहा है हर कोई

      इस खेत से उस खेत

      सुनो रे इस बार लगाओ पूरी ताक़त

      अन्न से भर दो घर आँगन-ओसार

      और बैंक का पूरा करजा !

 

             ***

 

फिल्म कालीचाट का यूट्‍यूब लिंक :  https://youtu.be/p5X4txu9ye0?feature=shared

 

फिल्म बनती है...और बनाती भी है’, लेखिका – सोनल –  amazon एवं neolitpublications  (neolit.in)

 

कालीचाटउपन्यास, लेखक – सुनील चतुर्वेदी – amazon एवं antikaprakashan.com पर उपलब्ध.

बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

बेबाक II


 बेबाक  II 



बेबाक फिल्म इतना असर क्यों डालती है ?  फिल्मों में अपने धर्म ( religion) के विरुद्ध जाने वाले किरदार या तो प्रेमी- प्रेमिका होते हैं ,  या किसी के प्राणों की रक्षा करने के लिए  वे धर्म से ऊपर उठ जाते हैं, या फिर दकियानूसी रीति रिवाजों का मजाक उड़ाते पात्र होते हैं जो आवांतर में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर रहे होते हैं । बेबाक ऐसा कुछ नहीं करती है । जीवन में और अपनी पढ़ाई में आगे बढ़ने में मिलने वाली बाधाओं का मुकाबला करती एक लड़की ,  जो अपने पिता से, माँ से या फिर धर्म की नसीहत देने वाले और मदद के एवज़ में अपनी शर्तें मनवाने वाले पोज़िशन पर बैठे व्यक्ति से, किसी से भी सही सवाल करने से नहीं हिचकती। वह लड़की आपकी दया या सहानुभूति का पात्र नहीं बनना चाहती । वह बस अपने हिस्से की स्वतंत्रता चाहती है। अपनी मर्ज़ी से पढ़ने, ओढ़ने- पहनने, आगे बढ़ने की स्वतंत्रता। वह यह भी जानती है बात उसके एक अकेले की नहीं है, आने वाली पीढ़ियाँ भी उसे उम्मीद के साथ देख रही हैं। 


फिल्म की निर्देशक शाज़िया चाहतीं तो फ़ातिन के पात्र को लार्जर दैन लाइफ़ बना सकती थीं , लेकिन वे जानती हैं कि ढोल पीटने से ज्यादा अच्छा है काम को अच्छे तरीके से किया जाए ।  एक आम व्यक्ति की लड़ाई आम व्यक्ति के तरीके से ही हो सकती है। फिल्म के शुरुआती दृश्य में ही जब तीन बहनों का अकेला भाई यह बोलता है कि " क्या लड़के बोल नहीं सकते इस घर में " तो लैंगिक समानता का मुद्दा जैसे हँसते हँसाते बराबरी का मामला बन जाता है । यह आज की पीढ़ी के नए लड़के लड़कियों का सोच है । जिसे फिल्म में बड़ी खूबसूरती के साथ अंकित किया गया है। 


फिल्म में बहुत छोटे छोटे क्रिया कलापों से निर्देशक ने संवादों या वक्तव्यों का काम लिया है। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी द्वारा फाइल का मेज़ पर थोड़ा पटक कर रखना, चेक पर साइन कर के वापस दराज़ में रख लेना, उसी दौरान विपिन शर्मा का चेक पाने की आशा में हाथ बढ़ाना और फिर खुद को रोक लेना, विपिन शर्मा द्वारा घर पर प्याज काटना और साथ ही साथ बेटी के एक बार हिजाब में चले जाने की वकालत करना -- पूरी फिल्म ही इस तरह के सीक्वेन्स/ दृश्यों से बुनी हुई है जिससे फिल्म का जो बड़ा संदेश है वह खुद ही प्रकट हो जाता है। 


शोले या दीवार पर चर्चा करते हुए जावेद अख्तर एक इंटरव्यू में कहते हैं कि फिल्म की कहानी/ स्क्रिप्ट पर रिसर्च हुए हैं कि किस तरह कहानी बनाई गई, उसका कहाँ और कैसे असर हुआ आदि आदि ।  वे कहते हैं कि जब वे उन फिल्मों को लिख रहे थे तो उन्हें यह इल्म थोड़े ही था कि किस बात को रखने से क्या असर होगा। वे तो उस समाज, उस परिवेश उस जीवन के बारे में लिख रहे थे जिसका वे हिस्सा थे और जिसे लिखकर उन्हें अच्छा लग रहा था ।  वे आगे कहते हैं कि लेखक कोई बाहर बैठा हुआ व्यक्ति नहीं है जो बाहर से समाज को देख रहा है । वह तो उसके अंदर से निकला हुआ आदमी है । 'बेबाक' को लिखा है फिल्म  की निर्देशक शाज़िया इकबाल ने ही और जावेद साहब की बातें उन पर अक्षरश: लागू होती हैं। वरना यह फिल्म इतनी अपनी लगे यह संभव ही नहीं था । 


मंगलवार, 3 अक्टूबर 2023

बेबाक : शाज़िया इकबाल की बेहतरीन शॉर्ट फिल्म


 


बेबाक  : स्वधर्मे निधनं श्रेय:


कुछ दिन पहले अभिनेता के के का एक इंटरव्यू देख रहा था जिसमें उन्होंने स्वधर्म की बात की थी। तब श्रीमद् भगवद्गीता की एक पंक्ति याद आई थी ' स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह'। जियो सिनेमा पर चल रहे जागरण फिल्म फेस्टिवल में 20 मिनट से भी कम लंबी एक फिल्म को देख कर यह पंक्ति फिर याद आई। फिल्म का नाम है ' बेबाक' जिसकी निर्देशक हैं शाज़िया इकबाल। एक छोटी सी फिल्म कैसे एक बड़ी बात कह जाती है इसका सटीक उदाहरण है 'बेबाक' । यह फिल्म अपने तरीके से स्वधर्म को परिभाषित करती है। फिल्म की मुख्य किरदार फ़ातिन अपने स्वधर्म की तलाश और उसकी रक्षा में है। वह सवाल करती है, विरोध करती है, अपनी सीमाओं को पहचानती है और अंततः उन सीमाओं का अतिक्रमण कर विजयी भाव से अपनी राह पर चल पड़ती है। 


फिल्म एक मुसलमान परिवार और उसके समाज के विचारों के अंतर्विरोधों को सामने रखती है। धर्म का कोई वितंडा खड़ा किए बिना। लाउड हुए बिना। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी द्वारा निभाया गया किरदार लेखन या अभिनय में ज़रा भी कमी होने से ओछेपन को प्राप्त हो जा सकता था, लेकिन होता नहीं बल्कि यह किरदार एक रूढ़िवादी चरित्र और विचारों को उतने ही मजबूत तरीके से सामने रखता है जितने मजबूत तरीके से फिल्म की मुख्य पात्र अपने विचार रखती है। असहज कर देने वाले सवाल पूछती है। घर में भी और बाहर भी। 


फिल्म की कहानी एक मुसलमान परिवार के इर्द गिर्द बुनी गई है लेकिन इसकी अपील यूनिवर्सल है। पात्रों के नाम, इबादत का तरीका, स्कूल में दिखाए गए पहनावे को बदल दीजिए, कहानी कहीं की भी हो सकती है। फिल्म का एक संवाद है " औरतों की मॉडस्टी वाली बात तो सेक्यूलर है " । कितनी तीखी बात है और कितनी सच ! निदा फ़ाज़ली का एक शेर है - 


हिन्दू भी सुकूँ से है मुसलमाँ भी सुकूँ से

इंसान   परेशान  यहाँ  भी  है   वहाँ  भी


यही इंसान है जो आखिर में बचता है  । 


फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है। फिल्म के संवाद आम घरों की बोलचाल जैसे हैं, इसलिए दर्शक से जुड़ाव पैदा कर लेते हैं। फिल्म होते हुए भी यह फिल्म फिल्मी नहीं लगती। सिर्फ एक दृश्य जिसमें फ़ातिन की माँ उससे कहती है कि तुझे जो सही लगता है वही कर, थोड़ा- सा फिल्मी हो गया है संभवत: । 


सारा हाशमी, विपिन शर्मा, शीबा चड्ढा सबों का अभिनय सधा हुआ है। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की वजह से फिल्म को एक ज़रूरी वज़न मिलता है। जो फिल्म किसी भी एक पक्ष की ओर झुक सकती थी, बैलेंस में रहती है। कहते हैं फिल्म निर्देशक का माध्यम ( Director's medium) है, शाज़िया इस बात को बेहतरीन तरीके से सिद्ध करती हैं। एक फीचर फिल्म या ओ टी टी वेब सीरीज़ जो काम घंटों का समय लेकर कर पाते, फिर भी शायद उस सफलता के साथ नहीं कर पाते जितनी सफलता के साथ शाज़िया इकबाल की बीस मिनट से भी कम की यह शॉर्ट फिल्म कर जाती है। 


आनेवाला समय क्या शॉर्ट फिल्मों का है? 'बेबाक' को देख कर यह ज़रूर कहा जा सकता है। 


रविवार, 10 सितंबर 2023

सच का एक क्षण


 सच का एक क्षण :

      पूर्वार्द्ध

(फिर से 'दिल चाहता है' देखते हुए ) 

___________________


तुम

इतनी सुंदर

कैसे लग सकती हो

प्रीति ज़िंटा  ! 

इतनी सुंदर !! 


कि

अगस्त की बादलों भरी

एक सूनी दोपहर

जब मन यूँ ही उदास बैठे रहना चाहे

खिलखिला उठे

सूरजमुखी के फूलों की तरह

तुम्हारी तरह... 


दुनिया भर की

अच्छी बातें

एक के बाद एक

याद आती चली जाएँ

हर उस बात को 

रास्ते से अलग करते

जिनसे मन दुखता हो


यह जानते हुए भी

कि हर सपना सच नहीं होता

मन फिर सपना बुने

कि जब तुम पूछो

" सोचो, कौन है वो जिसके साथ

एक पल बिताने के लिए

तुम्हें

हज़ार मौत कबूल है "

सहसा समझ में आए

प्रेम

प्रेम कि जिसको

ज़रा- सी चोट खाने पर भी

एक  हल्की बात बना देते हैं लोग

जाने अनजाने


होने को

हिकारत भरी नजरें भी हैं

लोभ भी, स्वार्थ भी

अहं, अहंकार भी

दुनिया में क्या नहीं है ? 

लेकिन प्रेम

प्रति- फल नहीं 

प्रति- दान नहीं 

प्रति- उपहार नहीं है


कैनवास पर 

अधूरी रह जाती है

पेंटिंग कोई

शेर अधूरा रह जाता है

एक मिसरे की तलाश में

तो कभी

प्रेम होकर भी

नहीं हो पाता मुकम्मल


तर्क की बात यह है

कुछ भी किसी का नहीं

कि कुछ भी तो तुम्हारा भी नहीं

यहाँ तक कि यह किरदार भी

सब झूठा है  ! 

जगत् मिथ्या है  ! 

लेकिन

प्रेम तो सच ही होता है  ! 

प्रेम व्यक्ति को

सुंदर बनाता है

जीवन को जीने के योग्य 


जो यह हँसी है तुम्हारी

इतनी सुंदर

उससे सच्ची बात क्या है भला  !! 


फिर तुम तो

हर फ्रेम में सुंदर दिखती हो

यहाँ तक कि उदासी वाले पलों में भी

और यकीं मानो

मैं नहीं मानता, मैं नहीं चाहता ज़रा भी

कि दुनिया की किसी भी लड़की को

उदास होना चाहिए, दुखी रहना चाहिए

दुनिया के चेहरे पर जो पानी है

उसे

सूखना नहीं चाहिए

ज़रा भी

कभी भी, कहीं भी

जानती हो क्यों  ? 


अपनी नाकामियों से

अकेलेपन से

अपनी उदासी से

भागता है आदमी

लड़ता है रोज के रोज

लड़ना पड़ता है 

जीने के लिए

दुनिया की उदासीनता से

निराशा, हताशा से अपनी

तब

ऐसी ही

अगस्त की एक

उदास सूनी दोपहर

भर जाती है कहीं 

तुम्हारी सुंदरता से

जग सुंदर हो जाता है

भर जाता है मन

कृतज्ञता से --

दुनिया कितनी सुंदर है  !! 

क्षुद्रताएँ सारी 

विसर्जित होने लगती हैं

तुम्हारी हँसी की

रश्मियों में

छलकती हुई

फूटती हुई आभा में 

खुशी की --

सिखाने से तो नहीं होता है सब  ! 

तुम कौन हो  ? 

कैसे हो सकती हो तुम

इतनी सुंदर  ?!! 


कहने वाले कह सकते हैं

दुनिया भर में बवाल मचा है

दुनिया भर का

और तुम्हें फिल्म की पड़ी है  ! 

बात तो यह सही है

और यह भी 

दुनिया कितनी सुंदर बची है

अब भी  ! 

अगर वे देखें 

तो समझें

और सोचें

कि " कौन है वो जिसके साथ

एक पल बिताने के लिए

हजार मौत कबूल हो ?"

कि वे भी 

किसी के लिए

ऐसे क्यों नहीं  ? 


प्रेम 

क्षण में समाहित सच है

सच का एक क्षण है

परम् , निरपेक्ष

क्षण भर भी

प्रेम

बहुत है

इस जीवन को

सुंदर बनाने के लिए


उस क्षण की झलक

दिखलाती हो

तुम इतनी सुंदर हो

प्रीति ज़िंटा  ! 

इतनी ही सुंदर  !! 


।।। 

सच का एक क्षण :

     उत्तरार्द्ध

 ___________


लॉन की

ओस नहाई घास- सी

अहले सुबह की लाली- सी

अभी- अभी खिले लाल

उड़हुल के फूल- सी 

तरोताज़ा, 

कोमल, स्निग्ध

कितनी सुंदर  ! 

तुम

जग के अंतर को

सुंदर करती ! 

किसी भावी पिता की

इच्छा- सी

मन्नत- सी मन की


हरसिंगार के

उजले केसरिया फूल

चुपचाप बना देते हैं 

सुंदर 

धरती को

देखा होगा

किसी न किसी सुबह

कभी न कभी

कहीं न कहीं

और यदि नहीं, तो

बहुतों ने

तुमको भी नहीं देखा होगा

नहीं देखा होगा

हरसिंगार के फूलों को

घर के पूजाघर में भी


कितने सूरज निकल पड़ते हैं

जब बेटियाँ निकलती हैं

हँस उठते हैं सूरजमुखी कितने

बेटियों के

हँसने- मुस्कुराने में


घर - बाहर

नैहर- ससुराल

सँभालते हुए

सँवारते हुए

कहाँ से कहाँ 

पहुँच रही हैं

बेटियाँ


आत्मविश्वास से भरी

जो तुम हँसती हो

दमकती हो

सुंदर, 

कितनी सुंदर लगती हो  ! 

गहनों से लदने का

अब कहाँ फैशन है

आत्मविश्वास ही

सबसे बड़ा आभूषण है

जानती हैं बेटियाँ

और तुम भी  ! 


लेकिन

जब मैं यह सोच रहा हूँ

तो साथ- साथ

यह भी सोच रहा हूँ

कि हँसने- मुस्कुराने

सँवरने- सँवारने

खुली हवा में साँस लेने के लिए

हमने जगह कहाँ छोड़ी है

जहाँ पहुँची हैं बेटियाँ, तो

अपने दम से

हमारे होने के कारण नहीं

हमारे होने के बावजूद


कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता

जब खबरों से

मन सिहर न उठता हो

कोई राह नहीं दिखती, जो 

नज़रों से, फ़िकरों से

छिली हुई नहीं हो


हमीं ने तो 

बना रखा है चलन

'पर- रुच सिंगार' का

हमीं ने तो

रचा है यह षड्यंत्र

कि लड़कियों को लड़कों की 

बराबरी करनी है

दूसरों की अर्जित सफलता को

उनकी क्षमताओं का मापदंड

हमीं ने तो बनाया है

पिता और पति के

नाम का वजन

हमीं ने तो डाला है उनके माथे पर

उनके नाम को गुमाने को


और तब उदास पाता हूँ

प्रीति ज़िंटा तुमको  ! 

जानता हूँ

यह तुम नहीं, सिर्फ एक किरदार है

और यह झूठा है 

मगर इस उदासी में सच है

हम सबको पता है


यह उदासी

हर उस लड़की की है

जिसके मन में

अपने निर्णयों को लेकर संशय है

आत्म- ग्लानि है 


बस एक किरदार ही सही, मगर

तुम्हें क्यों चाहिए

एक तारनहार

दूसरों के हाथों ही

क्यों हो तुम्हारा उद्धार  ? 


आत्मविश्वास से भरी

बढ़ती 

आँख मिलाती 

मुस्कुराती 

हाथ मिलाती 

कितनी सुंदर लगती हो  ! 

परिदृश्य बदल जाता है

क्षण भर में

सारी मुश्किलें परे हो जाती हैं


तुम्हारी मुस्कुराहट में

ताकत है, 

सबसे बड़ी ताकत --

परस्पर विश्वास

जो जग उठता है

संग- संग मुस्कुराती आँखों में

जब तुम मुस्कुराती हो


क्षण में

छुपे मिल जाते हैं सूत्र

जीवन को

सुंदर बना जाने के

जिस क्षण

मुस्कुराती हो

तुम इतनी सुंदर लगती हो  !! 


सुंदर लगती है

हर बेटी

मुस्कुराती हुई  !!      

मंगलवार, 21 मार्च 2023

कलाओं के तीन शिखर


                        प्रकाशक : अभिधा प्रकाशन


कलाओं के तीन शिखर : कला की दुनिया में खुलती एक खिड़की


एक पतली- सी किताब है, महज अड़तालिस पृष्ठों की। उसकी भूमिका में सुप्रसिद्ध कवि नरेश सक्सेना  ने कितनी तगड़ी अनुशंसा की है, ज़रा देखिए --" अब जब यह पुस्तक आ गई है तब साहित्य की परीक्षा के किसी भी साक्षात्कार में यह अनिवार्य रूप से पूछा जाना चाहिए कि अनीश अंकुर की इस पुस्तक के बारे में पता है या नहीं? या कम से कम इन विषयों से साहित्य का रिश्ता पता है या नहीं? नहीं पता तो फेल।"  यह किताब है ' कलाओं के तीन शिखर लियोनार्दो दा विंची, विलियम शेक्सपीयर, लुडविग वान बीथोवन' और जैसा बताया जा चुका है, लेखक हैं अनीश अंकुर। 

किताब में कला के तीन शिखर- पुरुषों पर पाँच लेख संकलित हैं। ये लेख दा विंची की मृत्यु के पंच शताब्दी वर्ष, शेक्सपीयर की मृत्यु के चार सौवें वर्ष और बीथोवन के जन्म की दो सौ पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर लिखे गए हैं। अच्छी कला कालजयी होती है, तभी कलाकार के जाने के सदियों बाद भी कला जीवित रहती है और उसी के साथ कलाकार की स्मृति भी । 

यों तो सारी कलाओं में एक  अंतर्संबंध देखा जा सकता है, लेकिन लेखक अनीश अंकुर रंगमंच की पृष्ठभूमि से आते हैं इसलिए चित्रकला, रंगमंच- साहित्य और संगीत इन तीनों क्षेत्रों में उनकी सहज रुचि   स्वाभाविक  है। 

कला और साहित्य में थोड़ी भी रुचि रखने वाला व्यक्ति किताब में उल्लिखित तीनों नामों से जरूर ही परिचित होगा। इस किताब को पढ़ लेने के बाद परिचय का यह दायरा निश्चित तौर पर बढ़ेगा। इस किताब को पढ़ हम यह जान पाते हैं कि तीनों के जीवन में औपचारिक शिक्षा का अभाव रहा, इसके बावजूद उन्होंने अपने अपने क्षेत्र में शिखरों को छुआ, नए शिखरों को बनाया। इसको ऐसे देखें कि कला या प्रतिभा औपचारिक शिक्षा की अनुगामिनी नहीं है । दूसरी जो बात पाठक सहज लक्षित कर सकता है कि तीनों ने ही अपने मुकाम को पाने के लिए कड़ा संघर्ष किया, और तमाम तरह के विरोधों का सामना किया। तीसरी और सबसे खास बात यह कि तीनों ने ही अपने समय में गलत का विरोध किया, देश और समाज में व्याप्त जड़ता पर प्रहार किया। कला और साहित्य में गलत के विरोध की क्षमता अंतर्निहित होती ही है। 

दा विंची के प्रसिद्ध चित्र 'मोनालिसा' के बारे में बात करते हुए अनीश अंकुर कहते हैं - "इस चित्र में छुपी- दबी भावनाओं का अहसास मिलता है। ये भावनाएँ खतरनाक मानी जाती हैं क्योंकि ये स्थापित ऑर्डर के खिलाफ विद्रोह के रूप में देखी जाती हैं।" इस बात की पृष्ठभूमि में लेखक पाठक को चित्रकला के 'स्फूमातो' जैसे तकनीकी शब्द से भी परिचित कराता चलता है। 'मोनालिसा' के विभिन्न पहलुओं पर लेखक ने प्रकाश डाला है जिससे पाठक 'मोनालिसा' को देखने के साथ साथ समझ लेने की भी कोशिश कर सकता है। पाठक जान पाता है कि 'मोनालिसा' का असली नाम क्या है। इस तरह से यह लेख बड़ा ही रोचक बन पड़ा है। 

शेक्सपीयर पर बात करते समय लेखक बताता चलता है कि शेक्सपीयर ने अलग- अलग क्षेत्रों की बड़ी हस्तियों को भी किस कदर प्रभावित किया। यह भी कि उसने अपने समय के समाज और मनोविज्ञान को बखूबी चित्रित किया। एक सच्चा कलाकार भविष्य की आहट को बहुत पहले से भाँप लेता है। लेखक बताता है कि पूंजीवाद और उसके कारण उपजी मन की बीमारी को शेक्सपीयर ने तब पहचान लिया था जब उसकी कहीं कोई चर्चा भी नहीं थी।

बीथोवन के बारे में लिखते हुए लेखक अनीश अंकुर लिखते हैं कि बीथोवन ने ऐसी धुनों और संगीत की रचना की जो सुनने वाले को सुकून पहुंचाने के बदले उन्हें चकित और विचलित करता रहा है। ऐसा माना जा सकता है कि फ्रांसीसी क्रांति की सबसे अच्छी अभिव्यक्ति के धुनों और संगीत में ही हासिल हो सकी थी। 

पूरी किताब से गुजरता हुआ पाठक तीनों कलाकारों के जीवन में घटित महत्वपूर्ण घटनाओं से भी रूबरू होता है। उसकी यह समझ बनती है कि कला अपने समय का दस्तावेज होने के साथ- साथ भावी पीढ़ियों से भी संवाद कायम करती है। 

किसी भी अच्छी किताब की तरह यह किताब भी अपने अंतिम पृष्ठ के साथ समाप्त नहीं होती बल्कि पढ़ने वाले के मन में और जानने, और समझने की इच्छा जगाती है । जैसे शेक्सपीयर के बारे में यह पढ़कर कि उसने कई कहावतों को भी जन्म दिया, पाठक शेक्सपीयर के समकालीन तुलसी की रचनाओं में कहावतों को ढूँढने को उद्यत हो सकता है। बीथोवन ( पश्चिम) के संगीत में सामूहिकता के बर- अक्स भारतीय संगीत में एकल साधना पर विचार करने की इच्छा पाठक के मन में जाग सकती है । वह यह ढूँढना चाह सकता  है कि अहिंसा के पक्षधर गाँधी जी को जब बीथोवन की पाँचवी सिंफनी सुनाई गई तो उनकी प्रतिक्रिया क्या रही । 

कला और साहित्य में साधारण रुचि भी रखने वाले व्यक्ति के लिए यह किताब एक नई खिड़की खोलने का काम कर सकती है। अपने आकार और कीमत दोनों के लिहाज से यह किताब पहुँच के भीतर है । अगर किताब की दुकानों पर प्रतियाँ उपलब्ध कराना आसान नहीं भी हो तो ई बुक के रूप में इस किताब का प्रचार- प्रसार होना ही चाहिए। नहीं तो सब फेल  !!

मंगलवार, 10 जनवरी 2023

भरतु भरत सम जानि -- किशोर कुमार : द अल्टीमेट बायोग्राफ़ी

 


भरतु भरत सम जानि

( किशोर कुमार : द अल्टीमेट बायोग्राफ़ी ) 


दिल ढूँढ़ता हैगाने की चर्चा करते हुए गुलज़ार साहब कहते हैं मिसरा ग़ालिब का है और कैफ़ीयत हरेक की अपनी-अपनी किशोर कुमार : द अल्टीमेट बायोग्राफ़ीपढ़ने के बाद ऐसा  ही कुछ कहने की छूट लेने की इच्छा मेरी भी हो रही है और मेरा विश्वास है कि हर पाठक भी इसे पढ़ने के बाद अपने-अपने किशोर कुमार को देखेगा । यही इस किताब की सफलता है । 

रामचरितमानस में भरत के गुणों की चर्चा करते हुए जब उनके उपयुक्त कोई भी उपमा नहीं ढूँढ़ पाए तब तुलसीदास ने लिखा भरतु भरत सम जानि यानी भरत जी के समान बस भरत जी ही हैं, ऐसा जानो । अनिरुद्ध भट्‍टाचारजी और पार्थिव धर द्वारा लिखी गई किशोर कुमार की जीवनी किशोर कुमार : द अल्टीमेट बायोग्राफ़ीपढ़ने के बाद किशोर कुमार के बारे में भी सिर्फ यही कहा जा सकता है – किशोर कुमार के समान बस किशोर कुमार ही हैं ! 

किशोर कुमार का नाम हमने इतना सुना है, उनके गानों में हम इतना डूबे हैं कि लगता है किशोर कुमार के बारे में तो हम सब जानते ही हैं ! किशोर कुमार 75-80 वर्षों से समकालीन बने हुए हैं । हर उम्र के लोगों के लिए उनके हिसाब से समकालीन । किताब की भूमिका में ही लेखकगण यह बताते हैं कि 2012 और 2013 में भी फिल्मफेयरपत्रिका के सर्वे में किशोर कुमार सर्वकालिक श्रेष्ठ गायक के रूप में चुने गए । 

यह किताब हमें किशोर कुमार से मिलवाती है । किशोर कुमार को किशोर कुमार बनते हुए हम देखते हैं । जीवनी में तथ्यों के आधार पर नायक की कथा बुनी जाती है । इस किताब को पढ़ते समय बार-बार इस बात का कायल होना पड़ता है कि छोटी से छोटी जानकारी को भी, जो किशोर कुमार को किशोर कुमार बनाती है, कथा में बड़ी खूबसूरती से पिरोया गया है। किशोर कुमार असाधारण प्रतिभा से संपन्न थे यह बात इस किताब में बार-बार रेखांकित होती है । वे अपनी प्रतिभा से फिल्म लाईन और कला के क्षेत्र के लोगों को बार- बार अचंभित करते हैं । किशोर कुमार अपने गायकी से फिल्म प्लेबैक को एक नए स्तर पर ले गए । कल्याणजी आनंदजी को उद्धृत करते हुए लेखक लिखते हैं कि यह किशोर ही हैं जिन्होंने इस बात का एहसास कराया कि गाने स्क्रिप्ट में घुले-मिले  हो सकते हैं, फिल्म के सुर से सुर मिलाकर चल सकते हैं । जबकि किशोर के पहले गाने खूबसूरत तो होते थे लेकिन स्क्रिप्ट के साथ उनका तारतम्य नहीं होता था, वे स्क्रिप्ट को बाहर से सजाने वाले आभूषण की तरह होते थे। इसका एक कारण शायद यह भी था कि किशोर कुमार अभिनेता के अंदाज़ को इस तरह आत्मसात करके गाते थे कि यह लगता ही नहीं था कि अभिनेता नहीं गा रहा बल्कि किशोर कुमार का प्लेबैक है । देवानंद और राजेश खन्ना से जुड़े अध्यायों में लेखक ने इस पर विस्तृत चर्चा की है । बाद के दिनों में अमिताभ बच्चन की आवाज़ की बारीकियों को पकड़ने या फिर शत्रुघ्न सिन्‍हा के लिए गाए ब्लैक मेलफिल्म के गाने शरबती तेरी आँखों कीबात भी इसी संदर्भ में प्रस्तुत की गई है ।   

किताब में बहुत सारी ऐसी जानकारियाँ हैं जो पाठक अगर तारतम्य बिठा पाए तो उसके सामने घटनाओं का, किशोर कुमार के चरित्र का एक नया ही रंग प्रस्तुत करती हैं। जैसे कि किशोर कुमार के पैसा पकड़ने की बात बहुत सुनी जाती है, लेकिन इस किताब में अलग-अलग जगहों पर ऐसी घटनाओं का ज़िक्र है जिन्हें मिलाकर देखें तो उनकी एक दयालु, मददगार और दरियादिल इंसान की छवि उभरती है । 

किशोर कुमार की छवि एक खिलंदड़, कभी-कभी थोड़े सनकी, इंसान की है । उस छवि के पीछे एक संवेदनशील कलाकार था । आस-पास के माहौल और फिल्मों/ गानों के गिरते स्तर से व्यथित कलाकार । किशोर कुमार के इस पक्ष को भी यह किताब बहुत सलाहियत के साथ हमारे सामने रखती है । उनकी पीड़ा कई-कई रूपों में बार-बार प्रकट होती रही । कई बार संगीत में विधिवत शिक्षित न होने पर  उनकी क्षमताओं पर भी प्रश्न किया गया । हर बात पीड़ा देती, लेकिन उन सब बातों का जवाब किशोर कुमार का गाना ही है । हर उम्र, हर तबके, हर गुणी – हर तरह के लोगों के प्रिय किशोर कुमार । यह बिना कारण ही नहीं है कि उनके प्रशंसकों में भीमसेन जोशी, कुमार गंधर्व और सत्यजीत राय जैसे दिग्गज भी हैं । 

इस किताब में हम यह भी देखते हैं कि किस तरह किशोर कुमार सत्ता के सामने तन कर खड़े होते हैं । यह माद्दा बहुत कम लोगों में ही होता है । किशोर कुमार का व्यक्तित्व और चरित्र भी असाधारण था । किताब में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है । 

किशोर कुमार के जीवन के आखिरी दिन का चित्रण बहुत ही मर्मस्पर्शी ढंग से किया गया है । आँखों में एक नमी का एहसास होता है और जैसे बैकग्राउंड में किशोर कुमार की आवाज़ में धीमे-धीमे गीत बजता है दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना, जहाँ नहीं चैना वहाँ नहीं रहना...  । फिर किताब के कवर पर ध्यान जाता है, मुस्कुराहट के पीछे की उदासी थोडा उदास कर जाती है । क्या दुनिया ने किशोर कुमार को वह श्रेय नहीं दिया जिसके वो हकदार थे ?! 

किताब कितनी मेहनत से लिखी गई है इसका अंदाज़ा किताब से गुज़र कर ही होता है। किताबों को जिस तरह से जीवन-क्रम के अनुसार अध्यायों में बाँटा गया है, वह इस किताब को एक जर्नलया डायरी का रूप भी देता है । अगर किशोर कुमार जर्नल’/ डायरी लिखते तो शायद कुछ ऐसा ही लिखते।  किशोर कुमार को जानने के लिए, उस समय के फिल्म-इतिहास को जानने के लिए, उस समय के माहौल को जानने के लिए यह किताब रास्ता तैयार करती है । 

        कल्याणजी आनंदजी, किशोर कुमार और अमिताभ बच्चन – इस कॉम्बिनेशन पर भी थोड़ी चर्चा होती तो और अच्छा रहता । अमिताभ को अमिताभ बनाने में इन गीतों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। 

      इस रोचक किताब का हिंदी अनुवाद भी लाया जाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक यह पहुँच सके ।

 

 

रविवार, 28 अगस्त 2022

'अच्छा आदमी' : समय और समाज की ' कॉन्फ़िडेंशियल रिपोर्ट'



 





'अच्छा आदमी' : समय और समाज की ' कॉन्फ़िडेंशियल रिपोर्ट'


          कई बार ऐसा होता है  जब किसी कलाकार का कोई काम देख हम उसे 'डिस्कवर' करने लगते हैं, जबकि वे यहीं होते हैं बहुत समय से। 'न्यूटन' में पंकज त्रिपाठी को देखकर अभिनेता पंकज त्रिपाठी को डिस्कवर करना शुरू किया, फिर खूब उनकी फिल्में देखीं, खूब उनके इंटरव्यू सुने। जुबिन नौटियाल का ' दिल दर ब दर' गाना सुनने के बाद आजकल उन्हें डिस्कवर कर रहा हूँ। पता चला   कि कृष्ण- भजन ' मनमंदिर में सजे बिहारी' उन्होंने ही गाया है। जबकि इस भजन को तो कब से सुन रहा हूँ, जैसे उनके गाये कबीर के दोहों को। कुछ ऐसा ही हाल पंकज मित्र के कहानी संग्रह ' अच्छा आदमी' को कल पढ़ लेने के बाद से है। यह उनका पाँचवा कहानी संग्रह है, पर मेरे लिए पहला!  अब खोजबीन जारी है। डिस्कवर किए जाने का भी शायद मुहूर्त  होता है  ! 

      संग्रह में नौ कहानियाँ हैं। पतली- सी किताब 142-145 पेज की। दाम भी ज्यादा नहीं। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित। 

       अगर आपने 'रेणु' को पढ़ा है और अगर आपको पूर्णिया जाने का मौका मिला हो तो आप समझ सकते हैं कि 'रेणु' का लेखन पूर्णियामय है या फिर पूर्णिया और आसपास का इलाका अपनी पूरी भौगोलिकता और सामाजिकता में 'रेणुमय'  ! इस संग्रह को पढ़ते समय मुझे पंकज मित्र और राँची के बीच भी वैसा ही संबंध लगा। राँची  और आसपास कहानियों की रगों में दौड़ता है और लहू बन के आँख से टपकता भी है  ! 

         पंकज मित्र चरित्रों के या स्थानों के स्केच आपके सामने नहीं खींचते, बल्कि उन्हें खुद ही बोलने- बतियाने देते हैं। पात्र संवादों के ज़रिये अपने आप को, अपने चरित्र को प्रस्तुत करते हैं। कहानियाँ इतनी रोचक हैं कि पेज के बाद पेज पलटने को बाध्य करती हैं - ' पेज टर्नर'। भाषा और शब्दों का जो प्रयोग वे करते हैं उसे देख के मुझे लगता है कि वे अपनी उम्र के और अपने से छोटी उम्र के लोगों से अच्छे संपर्क में हैं  । एक अनौपचारिकता, एक खुलापन और बौद्धिकता के भार से रहित होना उनकी भाषा में सहज लक्ष्य किया जा सकता है  । 
  
      कुछ कहानियों में पात्रों, स्थान और घटनाओं को बिल्कुल ही साफ़- साफ़ देखा जा सकता है, खास तौर पर 'सिली प्वाइंट' और 'मुँहबली' में। बाकी कहानियों में आप सीधे- सीधे ऊँगली नहीं रख सकते, या हो सकता है मेरी जानकारी का विस्तार उतना नहीं। 'ऐपफ़रोश' जो भवानी प्रसाद मिश्र की 'गीत फ़रोश' की तर्ज़ पर शुरू होती है, अपने बरतने में हरिशंकर परसाई के निबंधों/ कहानियों की याद दिलाती है। धार और रफ़्तार दोनों के स्तर पर मारक कहानी। 

      'मंगरा मॉल' में बाज़ारवाद, पूँजीवाद की भयावहता तो है ही, बड़ी ही शान्ति से लेखक ने इस बात को भी रेखांकित किया है कि आदिवासी समाज में भी लोभ, महत्वाकांक्षा और बेइमानी की घुन लगनी शुरू हो चुकी है। यह एक ज्यादा त्रासद भविष्य का संकेत है। इसी कहानी में लेखक ने मांदर की ध्वनियों का बखूबी इस्तेमाल किया है जो एक बार फिर ' रेणु' की याद दिलाता है। 

      'कॉन्फ़िडेंशियल रिपोर्ट' और 'आस' कहानियों में वह समाज और उस समाज की वह बातें हैं जिसमें हम रहते तो हैं पर जिसके बारे में खुल कर हम बात नहीं करते। कहानियों में पीठ -पीछे  दबी ज़ुबान में कही गई बातें भी साफ़- साफ़ सुनाई पड़ती हैं। 'आस' कहानी का अंत 'मदर इंडिया' की नर्गिस और 'वास्तव' की रीमा लागू की याद दिला सकता है। 

      पंकज मित्र अपनी भाषा से ' शाहदेव मेंशन' में एक तिलिस्मी दुनिया बुनते हैं- एकदम घुप्प् अँधेरी रात का नीला- नीला तिलिस्म। इस कहानी पर फ़िल्म बनाई जा सकती है। 'अच्छा आदमी' और 'रात के पार चलो' पर भी  । जिस तरह ' रात के पार चलो' के अंत में  आए गीत का हिन्दी अनुवाद लेखक ने दिया है, 'शाहदेव मेंशन' में आए शेक्सपियर  के संवादों का भी हिन्दी- अनुवाद दिया जा सकता था।  'रात के पार चलो' में एक और बात जो कहानी कहती है, वह यह कि सरकारी कंपनियां किसी क्षेत्र में काम करती हैं तो हर तबके का खयाल रखती हैं, जबकि प्राइवेट कंपनियों के साथ ऐसी बाध्यता नहीं। इस तरह यह कहानी पूंजीवाद के विरुद्ध खड़ी हो जाती है, बिना किसी शोर- शराबे के। 
    ' अच्छा आदमी'  कहानी हमारे समय के समाज और परिवार की सच्चाई को उसकी विडंबनाओं  और विद्रूपता के साथ पेश करती है। 

   इस संग्रह की कहानियों से गुज़रते हुए आप पाएँगे कि हर कहानी चरित्रों, स्थानों और घटनाओं की एक कॉन्फ़िडेंशियल यानी गोपनीय रिपोर्ट ही है जिसे हम और आप यानी कि इसके पाठक अपने- अपने निजी क्षणों में पढ़ रहे हैं।