शुक्रवार, 21 जून 2024

मौसम-ए-अफ़सुर्दगी ने ढंक रखा है मेरा वजूद

 

                                     


शिवना प्रकाशन, 2019


मौसम-ए-अफ़सुर्दगी ने ढंक रखा है मेरा वजूद

 

 

कितना कुछ है पढ़ने को, और आदमी कितना कम पढ़ पाता है ।  ठीक ही कहा गया है कि किताबें चुन लेती हैं अपना पाठक । अपनी अज्ञानता में ही सही, जिस कवि की आपने पहले से कोई कविता नहीं पढ़ी हो, जिस कवि के बारे में चर्चा नहीं सुनी हो, उस कवि का कविता-संग्रह खरीदना कुछ तो खास होगा । दिनकर जी ने कोई सत्तर बरस पहले कहा था कि कविताएँ तो हर महीने , मनों क्या, टनों छपा करती हैं, और अक्सर, उनमें भाव भी अच्छे-अच्छे होते हैं, किन्‍तु अभिव्यक्ति की सफाई का निर्वाह बहुत कम कविताओं में होता है। एक दिन किताब की दुकान पर किताबों को उलटते-पलटते एक किताब हाथ में आ गई – ख़ुद से गुज़रते हुए। कवयित्री का नाम संगीता कुजारा टाक । पहले तो संग्रह के शीर्षक ने ही ध्यान आकर्षित किया । फिर किताब के पन्ने पलटने लगा, और खड़े-खड़े ही कुछ कविताएँ पढ़ गया । यदि यह कहूँ कि कविताओं ने खुद को पढ़वा लिया तो ज़रा भी गलत नहीं होगा । अभिव्यक्ति की सफाई असर करती ही है। और किताब खरीद ली गई। किताबों की दुकानों पर जाते रहने का यह फायदा है कि छुपे हुए, अनदेखे नगीने भी हाथ लग जाते हैं ।

 संग्रह में एक सौ तीन कविताएँ हैं । अपनी बात में अमृता प्रीतम का आभार प्रकट करते हुए संगीता जी ने लिखा है अमृता प्रीतम का, जिनको पढ़कर मेरी नज़्मों को ज़िंदगी देखने समझने का नज़रिया मिला, और मेरी लेखनी को नया अध्याय । अपनी एक कविता भी उन्होंने अमृता प्रीतमशीर्षक से लिखी है जिसमें वे आह्वान करती हैं अमृता प्रीतम से अपनी नज़्म में उतरने का ।  शुभाशंसामें वरिष्ठ साहित्यकार अशोक प्रियदर्शी ने कुछ इस तरह पुष्टि की है, उन्होंने लिखा है इनमें आपको साहिर की जादूगरी का भी आस्वाद मिलेगा और अमृता प्रीतम के प्यार की गर्मजोशी  भी ।  

 इस संग्रह की कविताओं को चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है । पहली श्रेणी, जिसमें सबसे ज्यादा संख्या में कविताएँ हैं, प्रेम कविताओं की है । इसके बाद सबसे ज्यादा संख्या वैसी कविताओं की है जिसके केंद्र में स्त्री है, इसकी स्वतंत्रता है, उसके विचार हैं । चाहे तो इन कविताओं को स्त्री विमर्शकी कविताएँ भी कहा जा सकता है । संख्या के हिसाब से, इनके बाद वैसी कविताएँ हैं जिनमें आसपास का यथार्थ चित्रित हुआ है । संग्रह की कुछ कविताएँ कविता/ कविता-लेखन को केंद्र में रखकर भी लिखी गई हैं । अंतिम श्रेणी विविध/ अन्य विषयों पर लिखी गई कविताओं की है ।

 

लगता है कवयित्री का मूल भाव/स्वभाव उदासी है । संग्रह की कविताएँ इसी ओर इंगित करती हैं । उदासी की एक अंतर्धारा इन कविताओं में देखी जा सकती है । खास तौर पर इस संग्रह की प्रेम कविताओं में । संग्रह की प्रेम कविताएँ उर्दू नज़्मों के लहज़े को पकड़ कर चलती हैं । और इन कविताओं को आप अमृता प्रीतम, साहिर, गुलज़ार, और फैज़ के मुहल्ले के आसपास से गुज़रता हुआ महसूस करते हैं । अच्छी बात यह है कि कविताएँ कहीं से भी किसी की नकल नहीं लगती हैं । उनकी छाया भले ही दिखती है, जैसे अभिषेक बच्चन के अभिनय में अमिताभ बच्चन के अभिनय की झलक ! बानगी के तौर पर एक कविता डिमेन्‍शियाकी कुछ पंक्तियाँ देखें –

  मनोचिकित्सक

पना प्रिस्क्रिप्शन लिख रहा था

 और तुम्हारा हिज्र... अपना तिलिस्म...

 मोहब्बत; शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ इस तरह हैं –

        अभी तू मेरी बात न समझ

        तो यह और बात है

        वर्ना मोहब्बत

        क्या कोई

        और चीज हुआ करती है ?

 

संगीता कुजारा टाक जब प्रेम से इतर एक स्त्री, एक स्वतंत्र स्त्री के तौर पर अपनी बात करती हैं तो वहाँ उनकी आवाज़ कुछ अलग ही निखार लेने लगती है । उनके यहाँ स्त्री अपनी स्थिति से भली-भाँति परिचित है । बड़े आत्मविश्वास के साथ वस्तुस्थिति को बयान करती उधारशीर्षक कविता की इन पंक्तियों को देखें –

 

      सबने लिया है कुछ न कुछ

        उधार मुझसे...

 

        एक औरत से !

 

क्या यह पंक्तियाँ ख्यात कवि अरुण कमल की इन प्रसिद्ध पंक्तियों का प्रतिपक्ष नहीं हैं, प्रतिकार नहीं हैं ? जिनमें वे इस तरह कहते हैं  

      अपना क्या है इस जीवन में

        सब तो लिया उधार

        सारा लोहा उन लोगों का

        अपनी केवल धार ।

 बकौल संगीता कुजारा टाक, औरत उधार दे रही है यानी कि सारा लोहा उसके ही पास है !

 संग्रह की एक और कविता है आदत इसमें किस सहजता और आत्मविश्वास से स्त्री कहती है –

        खैर छोड़ो, मैं भी तो मैं हूँ

        अरमानों का कत्ल करना

        मेरी आदत है...

 

भी-कभी संगीता जी कविताओं को पाठक के चेहरे के इतने करीब ले आती हैं कि कविता की तल्खी कसने लगती है, पाठक को स्तब्ध कर देती है । हैसियतशीर्षक कविता कि ये पंक्तियाँ कुछ ऐसी ही हैं –

 

      धोबी का कुत्ता, घर का न घाट का

        अब सुनने में आया है, 

        धोबी ने कुतिया पाल ली है

 

संग्रह की कुछ कविताएँ हमारे आसपास के यथार्थ को उजागर करती हैं । इनमें कुछ कविताएँ पर्यावरण के प्रति हमारे निष्ठुर व्यहवहार को दर्शाती हैं । ऐसी ही एक कविता है पर्यावरण’, जिसमें कवयित्री ने एक पेड़ के जीवन की त्रासदी को कविता के अंतिम पंक्तियों में बयान किया है –

 

      अब उनके एक हाथ में आरी है

        दूसरे हाथ में मेरा बदन

 

यह तो हम देख ही रहे हैं कि सामज से आपसी प्रेम उठता जा रहा है। सामाजिक तानाबाना जो हमारी ताकत है, छिन्न-भिन्न होता जा रहा है । तभी तो कवि-मन बोल उठता है –

 

      कितना दुखदाई है

       कि प्रार्थना में उठे हाथ

       एक दूसरे की

       सलामती के लिए नहीं

 

       कितना दुखदाई है न !

       उफ्फ !!!  

 

अन्य कविताओं में एक कविता है तारा मेरी दोस्त’, जो संभवत: अपनी दोस्त की मृत्यु पर लिखी हुई कविता है । मन की व्यथा और बेबसी को दर्शाती हुई इन पंक्तियाँ में प्रयुक्त बिंब देखे जाने योग्य हैं –

 

      हवाओं ने अपनी गति रोक ली है

        पानी बहने से मना कर रहा है

        पहाड़ चरमरा कर टूट रहे हैं

        पेड़ों की कूबड़ निकल आई है

 

इस संग्रह से गुज़रते हुए ऐसा लग सकता है कि कवि-मन में बहुत दिनों से जमा हुई बातें थीं जिन्हें इस संग्रह के द्वारा निकलने का मौका मिला है । यह सही है कि एकबारगी कविताएँ उर्दू नज़्मों के प्रभाव में लगती हैं । लेकिन अब बहुत दिनों का जमा पानी निकल गया है, अब जो कविताएँ आएँगी वो निश्चय ही अलग और कवयित्री के अपने मिजाज को प्रकट करने वाली होंगी। इस संग्रह में ही इसकी शुरुआत हो चुकी है । संग्रह की बहुत-सी कविताएँ ऐसी हैं जिनमें संगीता जी का अपना विशिष्ट स्वर सुना जा सकता है । संग्रह की ऐसी कुछ कविताओं के शीर्षक इस प्रकार हैं – मोक्ष, महत्व, स्वीकृति, समतुल्य, विज्ञापन, प्रेम, आजकल, किंकर्तव्यविमूढ़, पर्यावरण, मानसिक पर्यावरण, काम, अलग होने के बाद, आश्रित, गवाह और दरारें । इन कविताओं में कवयित्री की अपनी निजी भाषा लक्षित की जा सकती है । उदाहरण के तौर पर मोक्षकविता की पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं –

                                          

      और तो कोई बात नहीं थी

 

        बात बस इतनी थी

        कि मिलना चाहती थी खुद से

       

       कई सालों बाद देखी

 अपनी छवि

 इतनी साफ, इतनी गहरी

 

आज नदी का पानी स्वच्छ पारदर्शी था   

 

 इस लेख का शीर्षक भी संग्रह की एक कविता से लिया गया है । आने वाले संग्रह इस मौसम -ए- अफ़सुर्दगी’ को कवयित्री के वजूद से हटा देंगे ऐसी ही आशा है । संग्रह में उर्दू के शब्द बार- बार आते हैं, जिनका अर्थ समझने में आम पाठक को  मुश्किल हो सकती है, मसलन अफ़सुर्दगी। ऐसे शब्दों के अर्थ फुटनोट में दिए जा सकते थे। 

बुधवार, 17 अप्रैल 2024

समस्तीपुर, मेरे दोस्त !


 

समस्तीपुर, मेरे दोस्त ! 


कितनी अजब बात है

सदर बाजार, जमालपुर की

एक गली में

छनते हुए गर्म-गर्म

सिंघाड़ों के इंतजार में

खड़े चेहरों को देखकर

समस्तीपुर याद आ गया

समस्तीपुर

अपना समस्तीपुर  ! 


एक चेहरा जो अपना हुआ करता था

वो जो मैं था भी, और नहीं भी था

वो जो किसी एक का, और जो सबका था 

तुममें और हममें तब फर्क कहाँ था  ! 


इतने सालों बाद आज

दिख गया अचानक अनायास

इंतजार कर रहे उन चेहरों के बीच

एक चेहरा जो मैं भी था, जो तुम भी थे

सदर बाजार, जमालपुर की गली में

जहाँ छन रहे थे गरमा गरम सिंघाड़े


क्या था उस चेहरे में आखिर? 

किसी के द्वारा पहचान लिए जाने का तोष

किसी को पहचान लेने का संतोष

निष्कपट, निश्छल जीवन

अहंकार से खाली मन

ना नौकरी की चिंता, न रोटी की फिकर

न मिलने की उत्कंठा, न बिछड़ने का डर

सबकुछ सहज, सरल, सरलतर... 

निरंतर


कुछ था कि छाप रह गई  ! 

छाप रह ही जाती है जब कुछ हो... 

किसी ने किसी को बाँधा नहीं

ना कोई बँधा ही किसी पाश में


मन की तरलता 

इक सहज सरलता 

तर कर जाती है

जीवन तर जाया करते हैं

घर कर जाया करते हैं

नर्मो-नाज़ुक जज़्बात

कोई नज़र, कोई हँसी, कोई बात...! 


    (2) 


इन बीच के बरसों में

गया कुछेक बार मैं

समस्तीपुर 

एक बार गया अपने बेटों के साथ भी

और अपने स्कूल 

सेंट मेरीज़ तक गया, 

यों भी सेंट मेरीज़ और समस्तीपुर पर्यायवाची हैं

बहुत से अर्थों में अपने लिए, 

वहाँ उस स्टेज पर, क्लास रूम के सामने 

बेटे खड़े हुए, जो थे लगभग उसी उम्र के

जिस उम्र का मैं तब था 

स्टेज ने शायद बेटों को पहचाना

क्लास रूम उनको देख मुस्कुराए—

इतने बरस लगाए ! 

गूँगा अब क्या स्वाद बताए !! 


क्यों गया बेटों के साथ ? 

अपने बचपन में बेटों को ले जाना था

उनके बचपन में अपने बचपन को उतारना था 

याकि करनी थी उम्र लंबी अपने बचपन की, जीवन की ?

बिना कहे हम अपने बच्चों में 

अपना जीवन रिवाइंड करते चलते हैं,

रिवाइज़ करते चलते हैं 

और सुधार लेते हैं चुपचाप कुछ अपनी गल्तियाँ भी 

बिना कहे किसी से 


अब पूछते हैं हाल 

सिर्फ एक दूसरे का ही नहीं

जानना चाहते हैं हालचाल बच्चों का भी 

तभी

“तमाम उम्र का हिसाब माँगती है जिंदगी” 

हम ढूँढ़ते हैं हिसाब बीत गई उम्रों का 



     (3)   


फिर रास्ते अलग हुए

एक अंतराल आ गया 

फर्क कहाँ हुआ पैदा

फर्क फर्क भी था कहाँ

जीवन-पथ समतल कहाँ

समरस कहाँ जीवन-सफ़र

कौन चला किस सिम्त को

क्या मंज़िल किसकी चाह बनी

अब पता-मुकाम किसका है क्या

किसकी क्या है गति भयी

नहीं एकरेखीय जीवन-गति, जो हो यदि

तो जीवन नहीं       

                  

कुछ यार हमारे चले गए

गए समय से पहले बहुत--

जीवन अपनी चालें चलता है

खारिज-दाखिल करता है

यादों का काँटा चुभता है 

हर बात पे याद कराता है

सबका नंबर आता है... 


इतना लेकिन याद रहे

नश्वर, क्षणभंगुर जीवन है

और रहे यह बात याद -

क्षण-क्षण, कण-कण में जीवन है 


     (4) 


सुख क्या है -- मृगतृष्णा है

दूर खिसकते चलता है

जितनी मुट्ठी बँधती है

वह उतना ही फिसलता है

उलझन-उलझन गाँठें हैं

गाँठों से भरा हुआ मन है

जितना ही जोर लगाते हैं

गाँठें उतना कस जाती हैं

धीरज से, हल्के हाथों से

गाँठें सब खुल सकती हैं 

मन खुलता है

मन मिलता है

खिलता है मन ऐसे ही 


आओ मिल के ढूँढें, मन

अपना बीता हुआ बचपन

ना कोई शिकायत होती थी, जब

ना कोई आहत होता था

सब छोड़ के अपना छोटापन

और भूल के सारा बड़ा-बड़प्पन

पल जीवन के मधुबन कर लें

चकचक मन-दरपन कर लें

बोझ ना बनें यादें

इतना तो पक्का मन कर लें


उम्र का फासला तय करके

जो जहाँ पर हैं खड़े

और जिधर जो हैं देखते

सामूहिक यह दुआ करें

कहीं कभी जो यदि मिलें

बिन छल कपट, बिन भय संशय

खुले हृदय से मिले-जुलें

खुशी से भले छलकें आँखें

देखें कि चोट न कोई पहुँचे 

दर्द से आँख न रोयी कोई 


"बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछ

 कुछ  न  समझे  ख़ुदा  करे  कोई"


जो बीत गया

जो मिला नहीं

जो कर न सके

जो हुआ नहीं

मन क्या था

क्या कर बैठे... 

जो जितना है वो कम भी नहीं

'गर अपनी मर्जी कुछ और रही, और रब की कुछ और रही

क्या करना अफसोस  ! 

आखिर क्यों करना अफसोस  ! 

समझो मेरे दोस्त  ! 

समझो मेरी दोस्त ! 


समस्तीपुर, मेरे दोस्त...! 


समस्तीपुर की याद आ गई है

समस्तीपुर की याद आती रहे

बचती रहे जीवन में मासूमियत थोड़ी  !!   


। । । । । 


पोस्ट स्क्रिप्ट : आशंका


अच्छा है अब हम न ही मिलें


मुझसे मिलकर

तुम निराश न हो जाओ


तुमसे मिलकर

मैं खो न बैठूँ

तुम्हारी याद को भी  !

सोमवार, 25 दिसंबर 2023

तुम्हारा जाना, रवि

          

   तुम्हारा जाना, रवि 
    (24.12.2023) 


(1)


यार, तुम गलत किए ! 

बहुत गलत हुआ यार ! 


लेकिन मैं गलती नहीं करूँगा

संवेदना के संदेश भेजूँगा

इमोजी डालूँगा ग्रुप में

चर्चा करूँगा


क्या हुआ जो तुमसे

आखिरी बार बात

दो- सवा दो साल पहले हुई थी

आखिरी मेसेज भी अगर

साल भर पहले का है, तो क्या हुआ

और तो और

जो ग्रुप में आकाशवाणी-सी हुआ करती है

जिसमें हर आवाज़

नक्कारखाने में तूती ही है

और जिसमें

जिसमें रोज सुबह- सुबह 

'गुड मॉर्निंग' कहने वाले तुम

खामोश रहे हफ्ते भर से

और धेला भर भी फर्क

नहीं पड़ा मुझे


मैं बहुत बड़ा हो गया हूँ

बहुत व्यस्त, एकदम प्रोफेशनल

I mean business, always

कहाँ है मेरे पास समय

फालतू बातों के लिए

कब जानना चाहा मैंने 

कैसे हो तुम, कब सराहा तुम्हें

कैसे खड़ा कर लिया स्कूल

कब बताना चाहा तुम्हें

अपनी जिंदगी का हाल

अरे, कौन कहाँ कब

हर तरह पसंद आता है

हरेक कभी न कभी

किसी न किसी का

दिल तो दुखाता है

मैंने भी दुखाया हो कभी

तो क्या हुआ....


तो क्या हुआ कि मन के कोने में

बीती बातों की याद बैठी है

क्या हुआ कि भूलकर सबकुछ

फिर से मिलने की है तमन्ना दिल में

लेकिन, मन के पेंच कस दिए मैंने

तन गई पीठ, तन गया चेहरा

भाव शून्य हो गईं आँखें

सुन रक्खा है मैंने

' इमोशनल आदमी

हारता ज्यादा है, जीतता कम'

कौन हारा है? 


अरे क्या करते तुम

क्या करे कोई? 

मर जाए? 

मर तो गए तुम

खत्म हो गए साथ-

साथ सारे उपाय... 

करिए 

करिए अब जो मन भाए  !! 


           (2) 


नहीं भूल रही हैं

तुम्हारी बड़ी- बड़ी आँखें

तुम्हारी आवाज़

जो गंभीर और खिलंदड़ दोनों

थी साथ-साथ


सोए हुए हो तुम

चिर निद्रा में

मुँद चुकी पलकों के भीतर

स्थिर हैं तुम्हारी चंचल आँखें

पसरी हुई है शांति स्तब्ध


'जातस्य हि ध्रुवं मृत्यु'

जो आया है वो जाएगा 

उम्र के इस पड़ाव पर

'वेक अप कॉल' है

जाना तुम्हारा


लगती रहती है

दूर की चीज़ कोई पराई

एक दिन मगर

मृत्यु अपनी सत्ता का अहसास

करा ही देती है

देर सबेर


याद आ रही हैं

उषा दी

कितना मन था उनसे मिलने का

भला अब क्या मुँह दिखाऊँगा

कितनी ही छोटी- छोटी बातें

छोड़ते जाते हैं हम

जाने किस बड़ी बात की खातिर


तुम्हारा जाना, रवि

सिर्फ तुम्हारा जाना नहीं है

हम सब भी 'जा रहे' हैं

रोज़ के रोज़ थोड़ा थोड़ा


सब बस चलते चले जाते हैं

एक दिन चले जाने के लिए

जीना इसी का नाम तो नहीं

शिकायतों का पुलिंदा लिए

डोलते रहना

महत्वाकांक्षा के पहाड़ पर

चढ़ जाने को

शुतुर्मुर्ग- सा बालू में सर घुसाए

दुनिया से कटते जाना


'कृतघ्ने नास्ति निष्कृति'

कृतघ्न का नहीं निस्तार

फिर भी अहंकार

किस हेतु 

जीवन से बड़ी बात क्या है

छोटी बड़ी औकात क्या है  ? 


'अब तक क्या किया ? 

जीवन क्या जिया!! 

बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये,

करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये,

बन गये पत्थर,

बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,

दिया बहुत-बहुत कम,

मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम'

मक्तिबोध की यह चिंता दिनोंदिन

बढ़ती ही जा रही 

देश कौन है? क्या है? 

सोचें तो ज़रा... 


काँटे उग आए हैं

ज़बानों पर, हाथों पर 

ज़र्द हो चले हैं चेहरे

सर्द हो चला है लहू

अपने शीशे के घरों में बैठे हैं लोग

हाथों में पत्थर उठाए


ज़िंदगी देती है मौके

मौत नहीं

क्या समझेंगे कभी  ? 



                   (3) 

  कैसी बीती होगी रातें? 

        कैसे बीती होंगी रातें? 

 दो सर्द रातें  । 


        तुम थे

        तुम नहीं थे

        थी तुम्हारी देह-मात्र, वह भी

        अब सुपुर्दे- ख़ाक है


         सब छोड़ चल देता है आदमी

         घर- दुआर

         साजो- सामान

         नाते- रिश्ते

         दोस्त- यार

         और अन्ततः देह

सबकुछ कितना बेमा'नी है

सच है, दुनिया फ़ानी है 


         अस्वाभाविक है तुम्हारा जाना

         दोस्त जो गए पहले, उनका भी

         स्वाभाविक नहीं था जाना

         स्वाभाविक कहाँ होता है

         किसी का जाना कभी... 

अशक्तता मथ रही है

मथ रही है विवशता अपनी


       ख़ाक में मिल जाना है

       राख हो जाना है

       एक दिन यही होना है

       सबको चले जाना है

किसको क्या समझाएँ

मन को कैसे मनाएँ


       मधुर- कटु व्यवहार किसी का

       भली- बुरी बातें किसी की

       क्या ही तय करें और भला क्यों

       है ठहरा हुआ समय, गुज़र रहे हैं हम

       जीवन-- बालू का एक कण

जीवन कितना छोटा है

और कितने छोटे हैं हम


        सच्चाई के क्षणों में

        खुद को हम पाते हैं, फिर

        खुद को खो आते हैं

        दु नि या दा री  की बातों में 

        सब जानते हैं सब --

        " ज़िंदगी ख़्वाब है

          ख़्वाब में

          झूठ क्या

          और भला सच है क्या? 

          सब सच है !" 

सुई की नोक- सा क्षण तुमने चुभाया है

हम ज़िंदा हैं अभी, हमें यह याद कराया है