बुधवार, 26 नवंबर 2025

‘असम्भव के विरुद्ध’: बह रहा है बीज रचना का

असम्भव के विरुद्ध: बह रहा है बीज रचना का

[ ‘असम्भव के विरुद्ध’, प्रकाश देवकुलिश, वाणी प्रकाशन, 2024 ]


         अपने नयी कविता की प्रकृतिशीर्षक निबन्‍ध में मुक्तिबोध ने लिखा है --  ध्यान रखने की बात है कि एक कला- सिद्धान्‍त के पीछे एक विशेष जीवन-दृष्‍टि होती है, उस जीवन-दृष्‍टि के पीछे एक जीवन-दर्शन होता है और उस जीवन-दर्शन के पीछे, आजकल के जमाने में एक राजनैतिक दृष्‍टि भी लगी रहती है ।  प्रकाश देवकुलिश के पहले कविता संग्रह असम्भव के विरुद्धपढ़ते हुए कवि की राजनैतिक दृष्‍टिसम्पन्नता के दर्शन बार-बार होते हैं । आज के समय में जब जीवन के हर क्षेत्र में राजनीति घुसी हुई है, यह सर्वथा स्वाभाविक ही है कि कवि राजनीति के कारण पैदा हुए सवालों से बार-बार जूझे । हालाँकि इस वजह से असम्भव के विरुद्धकी कविताओं को एकांगी या एकरस समझ लेना ज्यादती होगी । संग्रह की अड़सठ कविताओं से कवि ने ऐसा वितान ताना है जो बहुरंगी और बहुआयामी है । संग्रह की इसी खूबसूरती को इंगित करते हुए कवि अरूण कमल ने संग्रह के कवर पर दी गई संस्तुति में लिखा है – नितान्‍त निजी, ललित भावनाओं से लेकर बेहद बेधक राजनैतिक कविताओं तक जीवन के बहुत बड़े भाग को आयत्त करतीं ये कविताएँ समकालीन हिन्‍दी कविता को एक नया विन्‍यास देती हैं

 किसी कवि की वैचारिक और भावनात्मक बुनियाद या बुनावट कवि को उन विषयों की ओर ले जाती है जिन्हें वह अपनी कविताओं में उतारता है ।  कवि देवकुलिश की पक्षधरता किस तरफ है यह संग्रह की बहुत सी कविताओं में कामगरों, मजदूरों और किसानों की उपस्थिति से स्वत: स्पष्ट है । हर कविता संदर्भ-सापेक्ष होती है । कुछ कविताओं में संदर्भ स्पष्ट होते हैं, कुछ में अप्रकट । इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक गत दस-पन्‍द्रह वर्षों के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य की उपस्थिति को पहचान सकता है । उदाहरण के लिए रामशीर्षक कविता की इन पंक्तियों को देखा जा सकता है –

                         उस राम को पाने कहाँ जाऊँ

                        किस मन्‍दिर –

                        निर्मित या निर्माणाधीन

                        किस मठ, किस पीठाधीश्‍वर के पास ?

                        किस कचहरी,किस न्यायमूर्ति के पास ?

 इसी कविता की अंतिम पंक्तियाँ इस तरह से हैं –

                                     किन शालाओं, स्थापत्य कलाओं में,     

                                    किस भूमि पर,

                                    किस प्रांगण में ढूँढूँ तुम्हें

                                    हे अन्‍तर्वासी राम !

 कवि का ईश्‍वर रूढ़ियों, रिवाजों या दिखावों में बसने वाला ईश्‍वर नहीं है । संग्रह की एक अन्य कविता ईश्‍वरमें कवि ईश्‍वर का अर्थ समझने का आह्वान करता है । उसका कहना है कि ईश्‍वर जहाँ भी और जो भी है, अपने श्रेष्ठतम रूप में होता है । जरूरत है हमें सुन्‍दरम्,सत्यम्, शिवम् को समझने की ।

             संग्रह की कविताओं में मजदूर वर्ग, किसान, सत्ता, धर्म या पौराणिक सन्‍दर्भ, इतिहास के प्रसंग, प्रकृति, स्मृतियाँ आदि सब एक दूसरे से गुँथे हुए हैं । प्राय: हर कविता यथास्थिति को समझने, उसे बदलने एवम् गलत का प्रतिकार करने, लोगों को उनका उचित श्रेय देने, और एक बेहतर समय की कामना के लिए प्रस्तुत होती है ।

             प्रकाश देवकुलिश की कविताओं को पढ़ने- समझने के लिए पाठक की ओर से भी थोड़ी तैयारी अपेक्षित है । इनकी कविताओं में आए कुछ नाम, कुछ घटनाएँ, कुछ तिथियाँ यदि पाठक की जानकारी में रहें तो पाठक पर कविताओं का प्रभाव निश्‍चित तौर पर ज्यादा होगा । मैं समझता हूँ, ये कविताएँ इतनी अपेक्षा रखती हैं कि यदि पाठक कविता में ऊपर बताई गई बातों से अनभिज्ञ हो, तो गूगल तो कर ही ले कम से कम । अज्ञेय ने कहा है --  आज कवि से ही अधिक माँग की जाती है । पाठक से नहीं कहा जाता है कि वह काव्य सुनने या पढ़ने का पात्र बने ।  इस बात को समझने के लिए दो कविताओं से कुछ पंक्तियाँ । पहले हम कहाँ कुछ बोलते हैंकी ये पंक्तियाँ –

                          लद गये दिन तुष्‍ट करने के

                        जैसे बड़े दिनों की चाह

                        हो रही हो पूरी

                        अफीम ली

                        सबने थोड़ी-थोड़ी

 अब लेनिनग्राद अब बदल जाएगा पीटर्सबर्ग मेंकी इन पंक्तियों को देखिए –

                         ओ साथी !

                        मनुष्य को आदत है

                        अफीम खाने की

                        धर्म अफीम नहीं था

                        तुम भी अफीम नहीं थे

                        पर उन्होंने विअसे ही खाया

                        धर्म को भी

                        फिर तुम्हें भी

                        और वैसे ही खाएँगे

                        तुम्हारे नकारे जाने को भी

 पाठक यदि इन दोनों कविताओं में आए अफीमशब्द के सन्‍दर्भों से अपरिचित हो, तो कविता से उत्पन्न होने वाले रस में कुछ कमी जरूर ही आ जाएगी । इन दोनों कविताओं में आए पद राम राम का क्रन्‍दन’ , ‘चाय पर चर्चा’ , ‘लेनिनग्राद’, ‘पीटर्सबर्गया उन्नीस सौ सत्रहभी अपने सन्‍दर्भों के कारण कुछ विशेष अर्थपूर्णहो जाते हैं ।

             अज्ञेय ने कहा है --  काव्य का विषय और काव्य की वस्तु अलग-अलग चीजें हैं ।... वह ( वस्तु) विषय के साथ कवि के रागात्मक सम्बन्‍ध का प्रतिबिम्ब होगी । इस मापदण्ड के अनुसार इस संग्रह की कविताओं में विषय के साथ कवि के रागात्मक सम्बन्‍ध को पाठक लगातार महसूस करता है । इस दृष्टि से संग्रह की तीन कविताएँ रधिया दाई’, ‘अनन्‍दी महतो की कुदालऔर काम से लौटतीं औरतेंकुछ खास ही बन पड़ी हैं । हर पाठक लिए अपनी रधिया दाई, अपने अनन्‍दी महतो और अपनी काम से लौटतीऔरतें उपस्थित हो जाती हैं । इन तीनों कविताओं के पात्र सारी परेशानियों के बावजूद अपनी स्थिति को लेकर दु:ख में डूबे हुए लोग नहीं हैं । वे अपने कर्म से प्रसन्न और सन्‍तुष्ट हैं । कविता का कमाल यह है कि पाठक ही, बकौल कैफ़ी आज़मी, सोचने लगता है कि “ यही दुनिया है तो फिर ऐसी  ये दुनिया क्यों है” ।

             संग्रह की कविताएँ आकार में लम्बी नहीं हैं । सिर्फ तीन कविताएँ तीन पृष्ठों तक गई हैं । बाकी सारी कविताएँ एक या दो पृष्ठों की हैं । कुछ कविताएँ तो दस-पन्‍द्रह पंक्तियों की हैं । आकार के लिहाज से संग्रह की सबसे छोटी कविता मात्र नौ पंक्तियों की है , जिसका शीर्षक है काँच टूटने की आवाज। कवि काफी लम्बे समय से कविताएँ लिख रहे हैं। सम्भव है उनके निरंतर रचनाकर्म ने उनकी अभिव्यक्ति को सघनता प्रदान की हो । कविता के आकार पर विचार करते हुए वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने कहा है – क्या कविता की इकाई का छोटा होना एशियाई विशेषता है ? …यह मात्र शिल्प का मामला नहीं है । मुझे लगता है यह एक मूल्य दृष्टि का सवाल है । एक पूरी मानसिक संरचना का भी । कारण जो भी हो, प्रकाश देवकुलिश की छोटे आकार की कविताएँ भी अनुभूति की तीव्रता के लिहाज से निश्चय ही बड़ी कविताएँ हैं ।

           यों तो इस संग्रह की कविताएँ जमाने से दो-दो हाथ करती हुई-सी कविताएँ हैं, पर कुछ कविताएँ अलहदा रंग लिए हुए हैं  । पन्‍द्रह पंक्तियों की एक कविता है घोंसले में प्यार। बेटी पर लिखी हुई यह एक बहुत ही खूबसूरत कविता है । इसकी शुरुआती पंक्तियाँ देखिए –       

            जैसे बेली में होती है भीनी खुशबू

            चाँद में उजली नरमी

            बयार में नींद

            बौर में महँक

            छुईमुई में लाज

बेटी पर लिखी हुई ऐसी स्नेह-सिक्त पंक्तियाँ कम ही होंगी !

         संग्रह की दो-तीन कविताओं में माँ की उपस्थिति है । अर्थ अयोध्या काशी कैलाश काशीर्षक कविता में द्वंद है कवि की तीर्थों/धामों की यात्रा के प्रति अनिच्छा और माँ की अस्था के बीच । साधनों के अभाव में माँ की पुण्य धामों को देखने की इच्छा पूरी नहीं हो पाती । और माँ की अनुपस्थिति कवि के मन में उन यात्राओं की निस्सारता, निरर्थकता  और भी तीव्र और दृढ़ हो जाती है । कविता की इन पंक्तियों में कवि का दर्द, उसका अफसोस देखिए –

                          समय के साथ

                        धुँधली न होकर साफ होती जाती है

                        उसकी स्मृति

                        और

                        निरर्थक होता जाता है और भी –

                        अर्थ – चारो धाम का                 

                        अयोध्या, काशी, कैलाश का ।

  ऐसा ही दुख, ऐसा ही अफसोस, थोड़े अलग संदर्भों में युवा कवि राही डूमरचीर की एक कविता की पंक्तियों में भी उतरता है –

                        आज इसी शहर के

                        स्टेशन से

                        विदा ली तुमने आखिरी बार

                        अब क्या ही जाऊँगा

                        धनबाद

 यह निर्जनता और निर्विकल्पता कवि के साथ- साथ पाठक को भी घेर लेती है ।

             प्रकाश देवकुलिश की बहुत-सी कविताएँ ऐसे विषयों को केन्‍द्र में रखकर लिखी गई हैं, समाचारों में जिन पर चर्चा होती रही है । उन्हें चाहें तो पॉपुलर मूडके विषय कह सकते हैं ।  कुम्हार भाई’ , ‘ढोर की तरह वे’, ‘धन्यवाद भूल गया हूँआदि कविताओं के विषय खबरों में बने रह चुके विषय हैं । पाठकों को इन कविताओं में खबरों की पुनरावृत्ति होती हुई लग सकती है । इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि कुछ बातों का दुहराया जाना भी जरूरी है , जब तक कि स्थितियाँ सुधर न जाएँ ।

             संग्रह की एक कविता कहना खरी-खरीविषय के अनूठेपन की वजह से खास है ।  हमारे यहाँ की परिपाटी है कि दिवंगत लोगों के प्रति सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें ही कही जाती हैं । कवि इस परिपाटी को बदल देना चाहता है । वह कहता है –

                         दे रहा हूँ जिम्मेवारी तुम्हें

                        जो चला गया उस पर क्या कहेंकी लीक तोड़ने की

                        कहना खरी-खरी

इतना खरा कौन होता है आजकल ?

             संग्रह की दो प्रेम कविताएँ विशेष रूप से पढ़ी जानी चाहिए  -- अच्छा है कि सच कहेंऔर हवा वहीं ठहरी है । प्रेम एक ऐसा विषय है जो कभी पुराना नहीं पड़ता । कवि भी कहता है—

                          तुम्हें, मुझे

                        और दुनिया के तमाम लोगों को

                        प्यार करना चाहिए ।

  प्रकाश देवकुलिश एक सजग और सहृदय कवि हैं , इस बात की गवाह  सम्भव के विरुद्धकी कविताएँ हैं ।  कवि नजर हर तरफ है । कवि हर बात पर विचार कर रहा है । मुक्तिबोध ने कहा है --  आज ऐसे कवि-चरित्र की आवश्यकता है, जो मानवीय वास्तविकता का बौद्धिक और हार्दिक आकलन करते हुए सामान्य जनों के गुणों और उनके संघर्षों से प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करे, उनके संचित जीवन-विवेक को स्वयं ग्रहण करे तथा उसे और अधिक निखारकर कलात्मक रूप में उन्हीं की चीज को उन्हें लौटा दे ।  असम्भव के विरुद्धकी कविताओं को पढ़कर पाठक यह मानेगा कि मुक्तिबोध का यह कथन कवि प्रकाश देवकुलिश के लिए ही है ।

             कवि और उसकी कविता को उसकी ही पंक्तियाँ परिभाषित कर रही हैं –

                          हुनर के हाथ में

                        घुले श्रम से

                        बह रहा है बीज रचना का । 

 

 

सोमवार, 24 नवंबर 2025

‘काली मठ’: विमुक्‍ता भव


 




काली मठ: विमुक्‍ता भव

[ ‘काली मठ’, लेखक: स्मिता वाजपेयी, अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज, 2023]




    फेसबुक पर पोस्ट के रूप में शुरू हुई किताब प्रकाशक की पहल से किताब का रूप ले लेती है । किताब ऐसी कि जो हाथ में ली जाए तो बिना खत्म किए रखते न बने । खत्म कर देने के बाद, बार-बार उठाई जाए ।

     यह सही है कि काली मठ उत्तराखण्ड का एक प्रसिद्ध और शक्तिशाली मंदिर है, जिसकी यथास्थान चर्चा इस पुस्तक में की गई है । लेकिन यह किताब मुख्य रूप से लेखिका के मन में चलने वाली यात्रा की किताब है । भूमिका में ही एक शब्द उपस्थित होता है – अहैतुकी कृपा । इस किताब के लिए मानो यह सिग्नेचर ट्यून’-सा शब्द है । दरअसल जब आप जीवन के शुक्ल पक्ष की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं तो बार-बार आप अपने आप पर हुई कृपा के लिए कृतज्ञता का अनुभव करते हैं । तर्क से उच्चतर भाव का स्थान ! यह किताब भी उसी कृतज्ञता का प्रतिफलन है । किताब के ग्यारहवें पृष्‍ठ पर एक शब्द आता है –उत्फुल्लता। इसके पहले भूमिका में एकांत’  शब्द उपस्थित होता है । इन शब्दों को आप किताब का बीज-शब्द मान सकते हैं । नब्बे पृष्‍ठों में फैला यह संस्मरण आकार के लाघव के लिए नहीं अनुभव के विस्तार के लिए विशेष है ।

     क्या है इस काली मठमें ? यदि आप तथ्यात्मक ब्यौरों के लिए इसे पढ़ना चाहते हैं तो आप निराश हो सकते हैं । उसके लिए आप पर्यटन विभाग की कोई पुस्तिका पढ़ लीजिए । “ क्योंकि हम सब मनुष्य हैं ! हम सब एक जैसे ही तो हैं ! हमारे सुख-दुख एक जैसे हैं ! समझना कोई मुश्‍किल नहीं।” – किताब के शुरू होते ही यह वाक्य आपको बाँध लेता है । जिस वसुधैव कुटुम्बकमको हम परंपरा से मानते आ रहे हैं, उससे जोड़ता है यह कथन । अन्ना करेनिनाउपन्यास की पहली पंक्ति है – “ सभी खुशहाल परिवार एक जैसे होते हैं; हर दुखी परिवार अपने-अपने तरीके से दुखी होता है ।” बच्चन की भी पंक्तियाँ कुछ ऐसी  हैं –

             “दिवस में तो सभी का एक जग है

            रात में हर एक की दुनिया अलग है”

     इन दोनों बातों के उलट लेखिका कह रही है कि हमारे सुख-दुख एक जैसे हैं । किताब जुड़ने की बातें कर रही है, खानों में बँटने की नहीं । पाठक अनायास जुड़ाव महसूस करने लगता है । जब लेखिका की उपर्युक्त पंक्तियों को पाठक पढ़ रहा होता है तो बैकग्राउण्ड में जैसे जगजीत सिंह की आवाज भी सुनाई दे रही होती है – दुख ने दुख से बात की... । और लीजिए, कुछ पंक्तियों के बाद गीत की इस पंक्ति को आप किताब में पढ़ते हैं ! लेखक जब पाठक-सा सोचने लगे, या सोच रहा हो, तो पाठक उसके लिखे की गिरफ्त से बचेगा कहाँ !

     क्या है लेखिका की यह यात्रा ? और क्यों है ? यह एकांत की तलाश है या अकेलेपन से पलायन! या यह एक स्त्री होने के दुख से निजात पाने का अहैतुक हेतु है ? क्या है कि एक विदेशी महिला रात की निर्जनता में एक अनजान स्त्री का साथ पा कर रोने लग पड़ती है? क्या है कि “औरत हमेशा अकेली ही रहती है अम्माँ” यह सुनकर एक बूढ़ी अम्माँ सई कहती हो एकदमदुहराती रह जाती है ? और क्या यह दुख सिर्फ एक स्त्री का है ? हर व्यक्‍ति जो अपने सत्य की खोज में लगा है, क्या ये अनुभव उसके नहीं हैं ? जो भी व्यक्ति अपनी स्वतंत्रा की खोज में है, उसका बंधनों के प्रति विद्रोह सहज स्वाभाविक है । लेखिका कहती है कि “एकांत हमेशा नायकों के लिए रखा गया और नायिकाएँ बेचारी अगर पहाड़ों पर गईं भी तो वह किसी सेनेटोरियम में गईं मरने के लिए” । लेखिका के लिए यही नायकों वाला एकांत चिर-प्रतीक्षित सुन्‍दर सुखद एकांत है । एक स्तर पर यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ आवाज है, तो वहीं एक व्यक्ति के स्तर पर उस स्वतंत्रता की अभिलाषा, जो मनुष्य को मनुष्य से अलग न समझती हो । लेखिका जब खुद से ही यह प्रश्न करती है कि “ इंडियन वूमेन गायत्री मंत्र की तरह शापित तो नहीं है?”, तो वह सिर्फ अपनी ही बात नहीं कर रही, सिर्फ भारतीय स्त्रियों की बात नहीं कर रही, उसके जेहन में संसार की हर वह स्त्री है जिसके मन में उन्मुक्तता के लिए छटपटाहट है । स्त्री-शक्ति के बंधन-मुक्त होने में ही कल्‍याण है । कथा है कि गायत्री मंत्र का सदैव सदुपयोग ही हो, इसलिए उसे शापों के बंधन से बाँध दिया गया । शाप के विमोचन के बाद ही गायत्री मंत्र की शक्ति असरकारिणी होगी । स्त्रियों के लिए इसी रूपक का उपयोग लेखिका ने किया है । स्त्रियों के लिए शाप कौन से हैं? और उनसे मुक्ति कैसे संभव है ? यह प्रश्न हम सबके लिए विचारणीय है । लेखिका का बार-बार नदी के समीप जाना । मन में विचारों के बवंडर का उठना । और वही अहौतुक संयोग कि लेखिका सरस्वती नदी के समीप है । उसके मन में गायत्री शाप विमोचन मंत्र उच्चरित हो रहा है—

                         “ अहो देवि महादेवि संध्ये सरस्वती

                         ....

                        वि...मु...क्ता...भ...व!!”

 उसे मुक्ति चाहिए । ध्यान दीजिए, यह मुक्ति व्यक्ति-विशेष की नहीं है, हर उस व्यक्ति की है, जिसे अपने जीवन-उद्देश्य की खोज है, जिसे व्यर्थ के बंधनों की जकड़न को तोड़ फेंकना है ।  

     इस किताब के लेखक का स्त्री होना नि:संदेह किताब को एक स्त्री-दृष्‍टिसे लैस करता है । यह संयोग भी हो सकता और इस स्त्री-दृष्‍टिका नतीजा भी कि इस किताब में आने वाले ज्यादातर चरित्र स्त्री-पात्र ही हैं । लेखिका और उन पात्रों का बहुत सहजता से घुलमिल जाना भी संभवत: इसी कारण है । लेखिका से मिलने वाली विदेशी स्त्रियाँ उसे स्ट्रांग वुमन समझती हैं, तो स्थानीय स्त्रियाँ लेखिका को राइटर जानकर आदर के भाव से देखती हैं । लेकिन लेखिका तो एकांत की तलाश में है ! जगह-जगह पर लेखिका ने आपने पाण्डित्य का प्रदर्शन भी किया है, बिना रौब गाँठे। बालक पण्डित से सवाल-जवाब हो, मंदिर में दिखने वाले चाँदी के मंत्र का उल्लेख हो, बांग्ला साहित्यकारों का उल्लेख हो या फिर गायत्री मंत्र के शापित होने का ही उल्लेख । और फिर बिना चर्चा किए गायत्री मंत्र की शाप-मुक्ति के विमोचन मंत्र का उद्धरण ! पाठक के मन पर छवि बनती चली जाती है, कि वाग्विलासिता नहीं अर्थभारिता है इस कहानी में ! यह एक स्त्री की अभ्यस्त आँखें ही हैं जो यह नोट कर लेती हैं कि सब्जी सूखी और सड़ी है, कि चूल्हे को छोड़कर बाकी घर पुराना और काला है । लेखिका की सूक्ष्म निरीक्षण-दृष्‍टि का पता भी पाठकों को लगातार मिलता जाता है , जैसे-जैसे वह किताब के पन्नों पर आगे बढ़ता है ।

     लेखिका ने किताब के शुरू में ही लिखा है अहैतुकी कृपा । इस बात को इस तरह भी समझ सकते हैं कि बहुत सारी जगहों पर लेखिका के साथ जो घटित हो रहा है, उसे किसी कार्य-कारण संबंध में बाँध पाना संभव नहीं दिखता । जब तर्क बातों की जड़ तक न पहुँचा सकें, तो शायद भावनाएँ वहाँ तक पहुँचा देती हैं । इस किताब में इसके दो उदाहरण सबसे प्रबल हैं । एक तो पाठक को थोड़ा विचलित भी कर जाता है, वह है बिना किसी प्रत्यक्ष स्रोत के चिता की चिरायंध गंध का अनुभव ।  दूसरा, लेखिका के साथ भैरू का होना और अंतिम दिन बिना किसी सूचना के गायब हो जाना ।

     कहते हैं कविता का स्वभाव बिम्बात्मक होना है । और यदि गद्य वैसा हो तो ? जिन्होंने इस किताब को पढ़ा है, वे इस किताब की काव्यात्मकता पर विस्मित हुए बिना नहीं रह सकते । उदाहरण के तौर पर कुछ पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं :-

             “ अंधकार..पूरा परिसर !! पूरा कालीमठ !! सारे पहाड़, नदी सब एकदम काले !!”

             “ मुस्कुराते होठों के पास अनदेखे स्पर्श की लकीर झिलमिला रही थी ।”

             “ बरामदे में आओ तो नदी बहती दिखाई दे रही थी,कमरे में जाओ तब बहती सुनाई दे रही थी ।”

             “ समय का कोई अस्तित्व नहीं है । जो है उसे काल कहते हैं और यह अविभाज्य है!”

             “ वह जैसे रुई-सी उड़ती हुई, नदी-सी उछलती हुई, थिरकती हुई, हवा-सी बहती हुई लौटी।”

     कितने सारे बिम्ब अंकित हो जाते हैं मन पर ! नदी, खास तौर पर रात की नदी के बहाव का वर्णन,नदी के पत्थर को प्रेतशिला कहना, पुल पर बँधी घंटियों का और उन्हें भरी बारिश में बजाने का वर्णन, सीढ़ियों पर हफ्फ-हफ्फकरते चढ़ने का वर्णन । लेखिका ने देखा, मह्सूसा और उसे चित्रित किया – सब उसी शिद्दत के साथ ! लेखिका के लेखन में यही शिद्दत है जो एक कशिश पैदा करती है , वरना लिखने को तो लोग मनों नहीं टनों लिख रहे हैं !

     दो-एक जगहों पर लेखिका ने अपने ही बारे में लिखते समय इस तरह वर्णन किया है, मानो किसी और के विषय में बता रही हो। इसे चाहे तो द्रष्टा-भाव कह लें । ऐसा करने से वह दृश्य और भी ज्यादा प्रभावोत्पादक हो उठा है ।

     किताब का अंदाज़े-बयाँ इतना अच्छा है कि पाठक इस नॉन फिक्शनमें फिक्शनका आनंद ले सकता है । देखा जाए तो है यह एक कहानी ही, जिसके पात्र और स्थान वास्तविक हैं, बस यही तो !

 इस किताब के खत्म होने के बाद जो केंद्रीय अनुभूति रह जाती है पाठक के साथ, उसे लेखिका ने किताब में लिख ही दिया है –

             “ वह शांति ढूँढ़ रही है ।

-    और तुम ?

-    खुद को !”

     एकांत, मानवीयता, अज्ञात की खोज, संबंधों की उष्णताखोजने की ही तो यह यात्रा है लेखिका की । और एक तरफ वह जहाँ व्याकुल है अपने स्वर्गिक एकांतको ढूँढ़ने और पाने के लिए, वह बुद्धि को ताक पर भी नहीं धर देती । उसके मन में ढेरों प्रश्न, प्रतिप्रश्न हैं जिन्हें पूछ्ने में वह हिचकती नहीं । बालक पुजारी के संग लेखिका के वार्तालाप में पाठक इसका अनुभव अच्छे से करता है ।   

      इस किताब के संस्मरण तिथिवार सजाए नहीं लगते हैं । बल्कि यों कहें कि लहरों की तरह यादें दिल से टकराती हैं। यही इस किताब की खूबसूरती भी है । बाँधे रखती है पाठक को । एक और खूबसूरती है इसके लहजे का अनौपचारिक होना । ये संस्मरण फेसबुक पोस्ट के रूप में पहलेपहल सामने आए थे । कुछ अनौपचारिकता तो उस कारण भी है । कुछ लेखक की शैलीगत विशेषता । किताब में थोड़ा ही आगे बढ़ने पर पाठक पाता है कि तिथियाँ गौण हो गई हैं । यहाँ तक कि लेखिका की उपस्थिति भी पार्श्‍व में चली जाती है । बस एक अनुभूति बचती है, जो जीव-मात्र की है, उसी की यात्रा बचती है । वह जीव पाठक भी है, लेखक भी है, और भैरूभी है !  पढ़ते वक्त पाठक यह महसूस कर लेता है कि लेखिका आग्रही नहीं है कि उसकी बातों को अक्षरश: स्वीकार कर लिया जाए । वह स्वयं भी अक्षरश: स्वीकार नहीं कर लेती बातों को । बालक पुजारी को महज इसलिए बात करने से मना कर दिया जाता है कि फोन से उस समय एकांत भंग हो रहा है लेखिका का । किताब में शब्द, प्रसंग , संदर्भ सभी सहज गति से चले आते हैं । हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है “साहित्य में सहज होना ( मैं सरल नहीं कहता ) भी मौलिकता का श्रेष्‍ठ प्रमाण है ।” यह किताब इस मानदण्ड के करीब पहुँचती हुई है । लेखिका की अभिव्यक्ति की सहजता उसके लेखन को पाठकों के लिए संप्रेषणीय और प्रिय बनाने की क्षमता रखती है ।

     किताब के शुरू में काली मठ का परिचय दिया गया है । मैं समझता हूँ यह यात्रा और उसके संस्मरण बाह्य रूप से शक्ति के दर्शन और अनुभव से ज्यादा भीतर की शक्ति के दर्शन और उसे अनुभव करने से संबंधित हैं । ये संस्मरण अंतर्यात्रा के संस्मरण हैं । भौतिक संसार इस पुस्तक में उपस्थित है किन्‍तु वह आंतरिक संसार की पुष्‍टि के लिए ज्यादा है ।

     प्रकाशक की पहल से ही ये संस्मरण पुस्तकाकार प्रकाशित हो पाए, इसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं । लेकिन किताब को बेहतर बनाने की गुंजाइश रहती है । संपादन और प्रूफ का काम शायद बहुत ध्यानपूर्वक नहीं किया गया है । हिन्‍दी पढ़ते रहने वालों के लिए कुछ भूलें तुरंत पकड़ में आने और खटकने वाली हैं । आजकल यह चलन भी हो गया है कि जितना लेखक देख सके उतने भर की ही जिम्मेदारी है । इस स्थिति से बचा जा सकता था । कुल 102 पृष्‍ठों की किताब का मूल्य दो सौ रुपए रखा जाना भी थोड़ा ज्यादा है । किसी भी लेखन को श्रेष्ठ बनाने में कंटेंट और इन्‍टेंटदोनों का हाथ होता है । इसीलिए एक प्रॉडक्टके रूप में कुछ कमियाँ रह जाने के बावजूद यह किताब अपने कंटेंटऔर इन्‍टेंटके कारण अच्छी बन पड़ी है ।  

     काली मठ से लौटते समय पहाडों के सौन्‍दर्य से अभिभूत होती हुई लेखिका खतरनाक मोड़ों से गुजरते हुए अनुभव करती है “ सौन्‍दर्य को देखना महसूसना भी जीवट का काम है ।” मैं इस बात  को इस तरह कहना चाहूँगा “ जीवन के सौन्‍दर्य को देखना महसूसना भी जीवट का काम है !” हमारी सारी यात्राएँ , बाहरी या भीतरी, इसी सौन्‍दर्य के साक्षात्कार के लिए हैं ।

सारा शाप-विमोचन, सारी मुक्ति इसी में है –

 विमुक्‍ता भव !


शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

साहित्य वृत्त १ : साहित्य के चीयर लीडर


          साहित्य वृत्त : १

साहित्य के चीयर लीडर

 

वह साहित्य का चीयर लीडर है । यहाँ साहित्य का तात्पर्य हिन्‍दी साहित्य से है । वैसे, कोई भी साहित्य या जीवन का कोई भी क्षेत्र पुराने दिनों के क्रिकेट के टेस्ट मैच सा नहीं बचा है । हर जगह टी-ट्‍वेंटी का बोलबाला है ।

 आपको बताऊँ, साहित्य चीयर लीडरों के कंधों पर ही बैठा हुआ है इन दिनों !

 शहर में कोई भी गोष्ठी हो, सभा हो, सम्मेलन हो, पुस्तक विमोचन हो, व्याख्यान हो, सम्मान समारोह हो – छोटा या बड़ा जैसा भी आयोजन हो, वह ढूँढ़- ढूँढ़ कर उपस्थित हो जाता है । मंचस्थ साहित्यकारों को तालियों के नैतिक समर्थन की बहुत जरूरत होती है । कवि अपने श्रोताओं की व्यवस्था स्वयं करे ! वह यानी कि चीयरलीडर कार्यक्रम समाप्त होने के बाद साहित्यकारों से मिल-मिलकर आशीर्वाद प्राप्त करता है । यदि साहित्यकार आशीर्वाद देनेवाले उम्र के न हुए, तो नमस्कार, प्रणाम से गुजारा कर लेता है , दंतुरित मुस्कान के साथ ! हर साहित्यकार को बाकमाल और लाजवाब होने की बधाई देता है । उनके व्याख्यानों, भाषणों, कविता पाठों आदि को रिकॉर्ड करने और फिर उन्हें सही नम्बरों तक फॉरवार्ड करना उसका नित्यकर्म है । इसी बहाने वह लेखकों के नम्बर प्राप्त कर लेता है । सुप्रभात,शुभ प्रभात, शुभकामना संदेश भेजना शुरू कर देता है । क्या पता कभी सम्पर्क सध ही जाए !

 बार-बार आते-जाते, आशीर्वाद पाते-पवाते कुछ लोगों की मुस्कान परिचित होने लगती है । फिर उनसे निकटता बढ़ाने का उपक्रम शुरू होता है । निकटता बढ़ाने का सबसे कारगर तरीका है परनिन्‍दा – लेखकों के सामने किसी और लेखक की शिकायत, उसकी बुराई करना – क्या लेखन और क्या व्यवहार , इस परनिन्‍दा के लपेटे में सब आ जाता है । वह यह भली-भाँति समझता है कि यह सारा कार्य-व्यवहार इतने जेनुइन तरीके से होना चाहिए कि सुनने वाले को उसके सद्‍चरित्र होने पर भरोसा हो जाए । इस तरह की शिकायतों को परोसने के बाद वह और भी जेनुइन तरीके से उनकी प्रशंसा करता है । इसी तरह की प्रशंसा को मुक्त कंठ से की गई प्रशंसा कहा जाता है ।

 इस तरह जब थोड़ी जान-पहचान बढ़ जाती है, तो वह उनके यानी लब्धप्रतिष्ठित समझे जाने वाले साहित्यकारों के अन्य कार्यों के लिए भी खुद को प्रस्तुत करने लगता है । किसी को कहीं पहुँचा देना है, किसी को कहीं से ले आना है आदि- इत्यादि ।  कभी-कभार वह एकांत में भी मौका निकाल कर उनकी प्रशंसा कर देता है । एकांत में की गई प्रशंसा विशेष महत्त्व रखती है । इस प्रकार वह श्रेष्ठ जनों की प्रशंसा और विश्‍वास दोनों का ही पात्र बन जाता है ।

 यदि पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम हो, तो पुस्तक खरीद कर लेखक के ऑटोग्राफ लेना नहीं भूलता । किसी भी कार्यक्रम में लेखकों, आयोजकों के कार्यक्रम -स्थल छोड़ने के बाद ही वह कार्यक्रम-स्थल से टलता है । वह साहित्य का सच्चा टहलुआ है।

 कुछ लेखक, जो बड़े हो चुके हैं या  जिनके बड़ा हो जाने की संभावना दिख रही होती है , उनकी किताबें खरीद कर उनमें से कुछ अच्छी पंक्तियाँ चुनता है । पत्र-पत्रिकाओं में छपी खबरों/ समीक्षाओं से और गूगल की मदद से किताब के विषय में कुछ अच्छी-अच्छी बातें जमा कर एसएमएस, व्हाट्‍स एप, ईमेल आदि सभी उपलब्ध साधनों के द्वारा लेखक को प्रेषित कर देता है । प्रशंसा की गैस जब गुब्बारे में भरी जाए तो वह फूलेगा ही और उड़ेगा ही । वह यह बात समझता है । वह मानता है कि उड़ने का अधिकार हर व्यक्ति को होना चाहिए ।

 वह बड़े लेखकों की ज्यादा तारीफ करता है , छोटे लेखकों की थोड़ी कम । अगर बड़े लेखक ने भूमिका लिख दी है, तो बड़े लेखक की तेरह पृष्ठों की भूमिका असल किताब के एक सौ तीस पन्नों पर भारी पड़ जाती है । वह भूमिका की तारीफ के बहाने किताब की भी थोड़ी-बहुत तारीफ कर देता है । यदि लेखक थोड़ा ज्यादा ही बड़ा हुआ , फिर तो फ्लैप पर लिखा एक अनुच्छेद भी हीरे जैसा चमकदार हो जाता है ।  चीयर लीडर यह जानता है कि 'बड़ा है तो बेहतर है' और 'चमकदार है तो ईमानदार है' ।  

 साहित्य के क्षेत्र में प्रोत्साहन और प्रशंसा ऐसी वस्तुएँ हैं जिनकी जरूरत नए से नए और परिपक्व से परिपक्व, हर तरह के साहित्यकारों को होती है और यह जरूरत  बार-बार पड़ती रहती है । यह जरूरत सदा बनी रहने वाली होती है । वह इस नब्ज को पकड़ चुका है ।

 वह ढेर सारी पत्रिकाएँ खरीदता है । किताबें भी कम नहीं खरीदता । वह जानता है कि किताबें उसे उपहार स्वरूप मिलने से तो रहीं ! हो सकता है कुछ लेखक उसे कुछ जानने भी लगे हों, लेकिन मानने का तो सवाल ही नहीं होता । लेखक किताब तो उसी को सौंप सकते हैं जिसे वे किताबों के लिए सुपात्र मानें, भले ही पीठ फिरते ही वे सुपात्र किताब किसी और की ओर सरका दें ।

 वह पुस्तक मेलों में भी जाता रहता है । कभी-कभी तो दूसरे शहर में लगे पुस्तक मेलों में भी । किताबें तो  खरीदता ही है, श्रेष्ठ साहित्यकारों के चरणवंदन कर पुण्य भी खूब कमा आता है ।

 साहित्य के ये चीयर लीडर आते कहाँ से हैं, और काहे आते हैं ? बस थोड़ा ध्यान से अपने आसपास देखने की जरूरत है ।

 किसी दिन कोई कह रहा था – पुराना चीयर लीडर कवि हो जाता है ।

 किसी ने टोका – कवि क्यों, कथाकार क्यों नहीं ?

 जवाब मिला – कविता ऑफ स्पिन गेंदबाजी है । इसे कोई भी कर सकता है ।

 विक्रम संवत् २०८२, मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा

तदनुसार ई.स. 2025, 21 नवम्बर, शुक्रवार