मंगलवार, 15 अक्टूबर 2019



ये जिसने भी
तैयार किया,
सिखाया है
बच्चों को
उसे
खुद भी
पता नहीं होगा
क्या काम हो गया है

सुनते हैं
दिन में एक बार
सरस्वती विराजती हैं
जिह्वा पर

इस
तस्वीर के साथ
ऐसा ही कुछ हुआ है
यक़ीनन !!


हँसी-खेल में
खेल -खेल में
यह
तस्वीर खिंचाई है
किसको होगा पता
कि यह
कितनी जीवनदायी है

देखो
बच्चों के
मुख को देखो
हाव-भाव को
सुख को देखो
पोर-पोर से
छलक रहा है
हर ओर-छोर से
झलक रहा है

सच कहते हैं
बिल्कुल सच
बच्चों में
बसते हैं भगवान



लगने को
तो
एक
स्वांग भर
लग सकता है
यह
दृष्टि पर
निर्भर है,मगर
देवी
कभी
मुस्काती होंगी
तो
ऐसे ही
मुस्काती होंगी


बाल- वदन
मोहक- मगन
मुस्कान

जीवन-अमृत-निर्झर
झर-झर
फूँके
कण-कण में प्राण


जीवन
दो दिन का मेला
जीवन
बच्चों का खेला
जीवन फिर भी
गरब-गहेला....

दुर्गा दुर्गति दूर कर
मंगल कर सब काज *....



* हरि ओम शरण के भजन की पंक्ति

चाँद के बहाने



चाँद
दरिया में
उतर आया है
वही
छत पे भी
चढ़ आया है

दूर, दूर, दूर तक
फैली है चाँदनी
दरिया में आके
जैसे, पिघल
रही है चाँदनी

पारे-सी
जैसे पानी पे
छिहल रही है चाँदनी

आकंठ डूब जाएँ
कि
भर लें नज़र में हम
इतनी हसीन रात है
करें तो क्या करें

आओ,
चलो बैठे रहें
देखते रहें
जागते रहें
साथ चाँद के
और
हो सके तो हो
साथ में , कॉफ़ी
तुम्हारे हाथ की....!

चाँद के बहाने




शरद पूर्णिमा है
बरसती हुई
चाँदनी है
जहाँ
आँगन नहीं है
खीर
छत पे रखी है

खीर के
भगोने में
चलनी से
छन के
घुल जाएगा ,
अनगिनत शरीरों को
थोड़ा-थोड़ा-सा
लग जाएगा
चाँद
शरद पूर्णिमा का

चाँद के बहाने


छत पर चलो
आसमान
देखेंगे बैठ के
बातें करेंगे चाँद से
चौकी पे लेट के
रात की रानी को
लिवा लाएगी हवा
पत्तियाँ चुपचाप से
देंगी कोई सदा
कुछ दूर तक
कुछ देर तक
फिर देखते रहेंगे
बैठे रहेंगे
बस,
यूँही बैठे रहेंगे
ना करेंगे कुछ
ना कुछ कहेंगे
क़ायनात
कहती रहेगी
सुनते रहेंगे हम
कुछ देर
अपने आप से
मिल लेंगे
हम ज़रा...

चाँद के बहाने


एक चाँद
आसमाँ में है
एक सबके पास है
नज़र
जिसने रखी चकोर की
वो जानता है ये

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

Resemblance



तब भी थी
अब भी है
अदा
निगाहे-नाज़ की
पुर-सोज़ भी
पुर-साज़ भी...

मेरी
तुम्हारी
उसकी, शायद
हमदर्द भी
हमराज़ भी...

खो चुके-से
मानी, सारे
अल्फ़ाज़ भी
आवाज़ भी
गो टँकी- सी रह गई
इक अदा
निगाहे- नाज़ की !

भोलाराम जीवित [ भगत -बुतरू सँवाद 2.0]

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