गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

स्मृतिबन्‍ध

 




स्मृतिबन्‍ध

 

सारी बातें अपने ही मन को मनाने के लिए होती हैं ।

अभी तो साल शुरू हुआ था ! और अब, बस खतम...!

फिर नया वर्ष आने को है । एक नया वर्ष चैत में भी आएगा । जीवन का एक नया वर्ष जन्मदिवस से भी शुरू होगा । हम जीवन में नयेपन की तलाश में फिरते रहते हैं । कुछ नहीं तो ई कोठी का धान उ कोठी’ ! कहते हैं कविता में भी कुछ नया होना चाहिए, तभी कविता होती है । नयापन उत्साह का संवाहक होता है । भय और संशय का भी हो सकता है, लेकिन भाता वही नयापन है जो मन को उत्साह और उमंग से भर दे ।

मनुष्य का जीवन स्मृतियों से बना हुआ है । जिसे हम जीन्‍सकहते हैं, वह भी तो स्मृति-पुञ्‍ज ही है ! जाने कितनी पीढ़ियों की बातें हममें प्रकट होती रहती हैं । जीवन जाने कब कबकी बात याद कर ले !   हर क्षण प्रतिक्षण स्मृतियों में बदलता जाता है ।  यह साल भी !

विक्रम संवत् के महीने शुरू होते हैं कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से । लेकिन नया वर्ष शुरू होता है चैत के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से । ऐसा क्यों? इसीलिए न कि हम आगे देखें तो उज्ज्वलतर चीजों की ओर देखें ? हम जीवन में शुक्ल पक्ष के आकांक्षी हों । तो फिर महीने कृष्ण पक्ष से क्यों शुरू होते हैं ? वह इसलिए कि हम जीवन में थोड़ी कठिनाई, थोड़े संघर्ष सबको पार करते हुए पूर्णिमा के चाँद की तरह पूर्णता की ओर अग्रसर हों ।

स्मृतियाँ बन्‍धन नहीं होतीं । वे बाँधती नहीं मुक्‍त करती हैं । बाँधता तो मोह है । स्मृतियाँ प्रबन्‍ध हैं । हमें ऐसा लगता है कि जीवन का प्रत्येक दिन एक अलग मुक्‍तक है, लेकिन स्मृतियों का एक प्रबन्‍ध काव्य है हमारा जीवन ।  स्मृतियों से रचा हुआ प्रबन्‍ध काव्य । बस, इसमें यही है कि हम पन्ने पलट कर आगे नहीं जा सकते । जब समय आएगा, पन्ने तो तभी पलटे जाएँगे और तभी हम पढ़ पाएँगे कि उनमें लिखा क्या है । जिस तरह किताबों में कई लोग कुछ पंक्तियों को अंडरलाइन करते चलते हैं, हमारा मन भी कुछ स्मृतियों के नीचे लाइन खींच देता है । यह लाइन एक हाइपरलिंक बन जाती है । उस पर क्लिक कीजिए तो जीवन का एक अलग पृष्‍ठ खुल जाता है । फिर उस पृष्‍ठ पर कितनी सारी स्मृतियाँ। उनमें से कुछ के नीचे खिंची हुई लाइन, एक और हाइपरलिंक बनाती हुई ।  

शैलेन्‍द्र ने एक गीत में लिखा है –“ कि मर के भी किसी को याद आएँगे/ किसी के आँसुओं में मुस्कुराएँगे ” । हम सभी याद आना चाहते हैं , और एक भले ,एक अच्छे व्यक्ति के रूप में याद आना चाहते हैं । ये यादें ही हमारी असली कमाई हैं । जावेद अख्तर कहते हैं –“ मुझे तुम याद करना और मुझको याद आना तुम”

किसी मंदिर के पास से गुजरते हुए अगरबत्ती की बहुत मीठी सुगंध नाक में भरती है, आपको कोई पुरानी जगह याद आ जाती है। किसी खिड़की से घी में बनते हुए परौठे की सुंगंध आपके कदम रोक लेती है , रात की रानी की खुशबू का झोंका मन-प्राण को सहला जाता है, रूई के  फाहे पर इत्र की सुवास बचपन के किसी दुपहर की याद दिला जाती है । कोई पुराना प्रियास्कूटर पास से गुजरता है, किसी के बाल बनाने का अंदाज, किसी के मुस्कुराने का अंदाज – याद के कितने सारे ट्रिगर प्वाइंट हैं ! दरअसल हमारे अंग-प्रत्यंग में स्मृतियों का वास है ।

स्मृतियों का जितना महत्त्व है, उतनी ही बड़ी नेमत है भूलना भी ।  यदि हमें एक-एक बात याद रहने लगे तो जीना मुश्‍किल हो जाए । संगीत या कविता में यति-गति की बात करते हैं , ताल में मात्राएँ गिनने में ताली और खाली की गिनती करते हैं । ताल का सौन्‍दर्य ताली में तो है ही, खाली उस सौन्‍दर्य को बढ़ाता है, उभारता है । खाली जगहों की बहुत जरूरत होती है जीवन में । भूलना हमें स्पेस देता है । यह अलग बात है कि कुछ लोगों का भूलना सेलेक्टिव होता है ।

कुछ स्मृतियाँ अपने में दंश छुपाए भी होती हैं । स्मृति-दंश को जड़ से खत्म कर पाना लगभग असंभव है । उनको नियंत्रित किया जा सकता है, सुषुप्‍तावस्था में रखा जा सकता है । ऐसी स्मृतियाँ खींच-खींच कर हमें अपने गुजरे हुए समय में ले जाना चहती हैं। 

कई बार ऐसा लगता है कि समय नहीं गुजर रहा, हम गुजर रहे हैं । अलग-अलग समय खड़े रहते हैं, हम उनमें से होकर निकलते चलते हैं । एक ही साथ कई-कई समय उपस्थित रहते हैं ।  कुछ साल पहले, बरसों बाद ट्रेन के अनारक्षित डब्बे में सफर करने की स्थिति बनी । उस सफर के दौरान बार-बार यह लगता रहा है कि वह समय तो उपस्थित है अपनी आवाजों मे, अपनी बातचीत के मुद्दों और तरीकों में, अपनी चिंताओं और योजनाओं में । मैं अब उस समय से निकल कर किसी और समय में पहुँच चुका हूँ । आपने ध्यान दिया होगा कि जब हम अपनी स्मृतियों में प्रवेश करते हैं तो हमारी देह-दशा, हमारी काया तो अभी की रहती है लेकिन स्मृति में आने वाले व्यक्ति, वस्तु और स्थान वैसे ही रहते हैं , जस का तस ।  स्मृतियाँ हमारे जीवन के दो अलग-अलग समयों को एक साथ खड़ा कर देती हैं । क्या स्मृतियाँ सन्धिकाल हैं? क्या वे जागा हुआ सपना हैं ?  अपने निकटतम से निकटतम एवम् प्रिय से प्रिय व्यक्तियों और स्थानों को हम अपने जीवन का कितना हिस्सा दे पाते हैं ? हम सब अपने-अपने जीवन को अपने तईं सार्थक बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसमें छोटे-बड़े और सही-गलत का कोई प्रश्‍न नहीं होता । जो भी है, वह बस होताहै । यह तो स्मृतियाँ हैं जो हम जीवन-मात्र से ही जुड़ाव महसूस करते चलते हैं ।

हमारे अनुभव स्मृतियों को बनाते हैं । स्मृतियाँ हमें । हम किस छापके हैं, यह तय करने में हमारी स्मृतियों का बहुत बड़ा हाथ होता है । हम कहते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । क्यों कहते हैं ? हमारे जीन्‍स’, हमारे गुणसूत्र में छपा हुआ है । हमें साथ चाहिए । यह फेसबुक, व्हाट्‍सेप, एक्स, इन्‍स्टा इतनी व्यापकता के साथ क्यों उपस्थित हैं ? हमें साथ चाहिए । हम अपनी यादों को, अपने होने की यादों को एक-दूसरे की यादों में दर्ज करना चाहते हैं । हम जुड़ना चाहते हैं। जिस परिवार, जिस मुहल्ले, जिस समाज का लोप होता जा रहा है, हम उसे बचा लेना चाहते हैं । हमारे जीन्‍सकी छाप हमारे निष्ठुर होते जा रहे परिवेश से बगावत कर रही है ।

 नदी, पहाड़, पेड़, जंगल, खनिज, पोखर-ताल, फूल, फल, ऋतुएँ, जाने क्या-क्या हमारी सामूहिक स्मृतियाँ हैं । हमारी सामूहिक स्मृतियाँ इन्हीं से बन भी रही हैं । हम इनसे बन रहे हैं । इसके साथ-साथ वैज्ञानिक, आर्थिक, भौतिक जगत में हमने खासी तरक्की कर ली है, और लगातार आगे बढ़ते जा रहे हैं ।  कुछ बातें स्मृति-पटल से मिटती भी जा रही हैं । पंचम वर्णों में ,,का चलन बंद होता जा रहा है । चन्‍द्रबिन्‍दु गायब ही हो चुका है । संस्कृत उपेक्षा का शिकार हो चुकी है । संस्कृत तो जैसे आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपु:जैसी चंद सूक्तियों में सिमट गई है । कहावतें और मुहावरे अपनी आभा खो चुके-से हैं । जिन चीजों को हम उपयोग से बाहर कर देते हैं, वह हमारी स्मृतियों से भी बाहर हो जाती हैं ।

 कोयल कूक उठती है, आम के मंजर की सुगंध मदमाने वाली लगती है, सेमल का एक फूल धप् से गिरता है । गूगल ने  मेरी टूटी-फूटी अंग्रेजी के वाक्य “ Believe it to Have it” का संस्कृत में मोटामोटी अनुवाद किया है --  यत् भावो तत् भवति। नीति वाक्य के रूप में यह जँच गया है । मन को मनाने के ये सारे प्रॉम्प्टहैं । जिंदगी एक नाटक है न !

 सारी जुगत तो मन को मनाने की ही है । ऐसा लगता है जैसे परीक्षाएँ चल रही हैं और हर पेपर के बाद मन को यह समझाया जा रहा है कि अब आगे के पेपर अच्छे से देना है ! परीक्षा देकर  फेल करना हमेशा ज्यादा अच्छा है बिना परीक्षा दिए फेल करने से। और जीवन की परीक्षा में तो फेल होने का चक्कर भी नहीं है । जैसा चाहो, वैसा पाओ । यत् भावो तत् भवति!

अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार साल खत्म हो रहा है । तो, नया शुरू भी तो हो रहा है । फिर चैत है, फिर जन्मदिन है ...एक कैलेण्डर तो मन के भीतर भी है । उसमें रोज एक नया साल शुरू होता है ।


शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

प्रज्ञा गुप्‍ता अपने मुहल्ले की ही हैं !

 

प्रज्ञा गुप्‍ता अपने मुहल्ले की ही हैं !

[ प्रज्ञा गुप्‍ता के काव्य-संग्रह काँस के फूलों ने कहा जोहार !

की एक निजी व्याख्या ]

 

 

            आपने सेमल के फूल के पेड़ से गिरने की आवाज तो सुनी ही होगी – धपाक् ! मैंने भी सुनी है, लेकिन अब बरसों बीत चुके हैं सेमल के उतने करीब गए और वहाँ कुछ देर रुके । घर की छत से सेमल का एक पेड़ दिखता जरूर है । सेमल के फूल के गिरने की आवाज टनकती या खनकती हुई नहीं होती, बस जज़्ब हो जाती है धरती में जैसे ।  मेरे भीतर भी यह आवाज जज़्ब हो चुकी है । काँस के फूलों ने कहा जोहार!की बहुत सारी कविताओं की तासीर भी वैसी ही है, आपके भीतर जज़्ब हो जाने वाली । वैसे जिक्र तो पलाश का भी है किताब में । लेकिन पलाश के साथ एक तो आग-अंगार जुड़ गया है और दूसरे यह कि उसकी इतनी चर्चा हुई है ! वह राज्यों का राजकीय फूल भी घोषित हो चुका है । पलाश का ओहदा ऊँचा हो चुका है । सो, वह थोड़ा पहुँच के बाहर हो गया-सा लगता है । सेमल तो सबकी पहुँच में है। इसके फूलों में अंगारे नहीं दहकते हैं, इससे जंगल में आग नहीं लगती है । इसके फूलों में फागुन की पिचकारी से छूटे ताजा, चमकते रंगों के फव्वारे हैं । खिले-खिले  सेमल के फूल लाल-लाल,  टह-टह खूब लाल-लाल ! प्रज्ञा गुप्‍ता यही खिलनाअपनी कविताओं में लेकर आईं  हैं ।   कास के फूल भी  केतकी, गुलाब, जूही , चम्पा, चमेलीनहीं हैं ! उनका उजलापन जादुई-सा होता है । देखें, तो देखते ही जाएँ ! मन न अघाए । अच्छी कविताओं से भी मन नहीं अघाता।  

             अनुनासिकता लाड़-दुलार, मनुहार और किसी को मानने का द्योतक है ।  अनुनासिकता शब्दों को एक मुलायमियत, एक सहज अपनेपन से भर देती है । माँ में चन्‍द्रबिन्‍दु आखिर क्यों है ? लिखने को कासभी लिखा जा सकता है, लेकिन इसमें वो बात कहाँ ! कितनी अजीब बात है कि  हम हिन्‍दी से अनुनासिक ( चन्‍द्रबिन्‍दु) को हटाने पर तुले हुए हैं !

             जीवन में हर चीज एक लय में , एक रिदम में है । कविता या गीत हमें इसलिए इतना भा जाते हैं क्योंकि उनके अन्‍दर भी एक लय होती है, और वह लय जीवन की लय से मेल खाती है । कविता में यह लय आ कैसे सकती है ? जो कवि जीवन से जुड़ कर चलेगा, वही इसे संभव कर पाएगा । पोथी पढ़ने से यह नहीं सध सकता । इस संग्रह की कविताओं में जीवन  वही लय विद्यमान है,  जो  कविता को कविता बना देती है । यह लय है सहजता की । कविताएँ आरोपित या प्रत्यारोपित नहीं लगतीं । दूसरी खास बात जो कविता में होती है, वह यह कि वह पढ़ने वाले को आईना दिखा देती है । साहित्य समाज का दर्पण होगा, पर वह पाठक के लिए भी एक दर्पण है और वह भी आदमकद । पाठक नजरें बचा नहीं सकता । दरअसल, हम  हर रचना में लेखक या अपने किसी जाननेवाले या किसी जानेमाने व्यक्ति के जीवन की घटनाओं या परिस्थितियों को ढूँढ़ने लगते हैं । उसका एक कारण यह भी है, कि हम चाहते हैं कि कोई मिल जाए तो हम खुद को तसल्ली दे सकें कि यह हम नहीं ! हम अपने करतूतों की जिम्मेदारी लेने से बचते हैं । लेकिन इस संग्रह की कुछ कविताएँ बहुत तीक्ष्ण दृष्‍टि के साथ पाठक के चेहरे पर सवालिया निगाह डालती हैं, खासकर यदि पाठक पुल्लिंग है ! हूबहू घटनाएँ या संवाद  हों न हों, पाठक अपने जीवन की बहुत-सी बातों को तुरंत याद कर जाता है  और एक अपराधबोध या ग्लानिबोध उस पर तारी जरूर होता है । अपनी माँ, बहन, चाची, भाभी  के सामने उसने कभी खाने की थाली फेंकी हो या नहीं, उनके हँसने के तरीके पर कभी टोका हो या नहीं, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उन्हें कभी औड़म-बौड़म कहा हो या नहीं, वह जानता है कि ऐसी ही कोई न कोई बात तो वह कर चुका है या कभी भी कर सकता है ! मेल-ईगोकिसी से दबाया जा सका है कभी ! दो-एक साल पहले एक फिल्म आई थी डॉक्टर  G’ । इस फिल्म में, परिस्थितियों के फेर से, फिल्म का नायक मेडिकल कॉलेज में गायनाकोलॉजी की पढ़ाई करने आता है । फिल्म के नायक का विभाग बदल नहीं पा रहा, और उसका मन इस विभाग में लग नहीं रहा । ऐसे में एक दिन उसकी प्रोफेसर उससे कुछ ऐसा कहती है “ अपने अंदर से मेल टचको निकालो और डॉक्टर-टचको लाओ, तभी तुम स्त्रियों के डॉक्टर यानी गायनाकोलॉजिस्ट बन सकते हो” । एक भाई या पिता के रूप में हमारी सशंकित निगाहें बहनों-बेटियों के साथ रास्ते में कुछ दूर तक जाती हैं । एक बच्ची अपनी माँ से हिम्मत माँगती है कि वह बड़ी होकर अकेली बस स्टॉप से घर आ सके । यह सारा मसला मेल-टचऔर मेल-गेज़का है । पति, पिता, भाई -- कोई भी इसलिए निश्‍चिंत नहीं हो पाता कि वह भी अपने भीतर के मेल टचऔर मेल-गेज़की करतूतों को बखूबी जानता है । मेल-ईगो’, मेल-टचऔर मेल-गेज़की त्रयी जीवन को सहज-सरल नहीं रहने दे रही । और सुधरना उसे आता नहीं !  स्त्रियों को हमने रोज एक खबरमें बदल कर रख दिया है । पुरुष के अंदर का पशु क्या सचमुच नहीं मर सकता ?

             भारत का लगभग हर व्यक्ति ही विस्थापित है । वह गाँव से निकला हुआ व्यक्ति है । यदि वह खुद नहीं तो उसके एक पीढ़ी ऊपर के लोग गाँव से ही निकल कर आए हुए हैं । वह गाँव से निकल तो आता है, गाँव उससे निकल नहीं पाता। लेकिन वह गाँव कभी लौट भी नहीं पाता ।  एक कवि के लिए राजेश जोशी इसे ही कवि का दोहरी नागरिकताका होना कहते हैं । साहिर लुधियानवी ने एक शेर में कहा है “ मैं और तुमसे तर्क-ए-मुहब्बत की आरज़ू/ दीवाना कर दिया है ग़मे-रोज़गार ने” । हमारी स्मृतियों की चीजें गायब होती चली जा रही हैं ।  विस्थापन तो हो ही रहा है, प्रतिस्थापन भी हो रहा है । कोई पन्‍द्रह वर्ष पहले की बात है, साइकिल पर ले जाए जाते हुए कोयले को दिखाकर अपने बेटे को बताया था कि देखो कोयला यही होता है । कुछ परिवर्तन जीवन में अवश्यम्भावी होते हैं ! मँझली मौसी’, ‘सँझली मौसी’, ‘बड़के चाचा’, ‘बड़की भौजी’—हो सकता है आने वाले दिनों में इन सम्बोधनों के अर्थ समझने-समझाने वाले ही न बचें । भइया और भाई के या दीदी और बहन के अन्‍तर को समझाने के लिए उदाहरण कम पड़ जाएँ । मौसेरे, ममेरे, चचेरे, फूफेरे – ये सारे रिश्‍ते ही कज़नमें समाहित हो जाएँ । भारतीय संस्कृति में सबसे छोटी इकाई परिवार है । इसका भी अस्तित्व खतरे में है । परिवार यानी कुटुम्ब । कुटुम्ब या तो अब कुटुम्ब न्यायालयके सन्‍दर्भ में याद आता है, या वसुधैव कुटुम्बकम्को जपने में ! गाँव तो छोड़िए,शहरों में मुहल्ले अपना अर्थ खो चुके हैं । लोग अपने-अपने मकानों, फ्लैटों में सिमट कर रह गए हैं । बात अब तो मकानों के अलग-अलग कमरों और उसमें भी मोबाइल के स्क्रीनों तक सिमटती जा रही है ।

             काँस के फूलों ने कहा जोहार!की कविताओं में परिवार बार-बार , अलग-अलग बहाने से आता है । भाँति-भाँति से, अपनी तरह से परिवार को बचाने के प्रयास में भी हैं ये कविताएँ । इन कविताओं में पारिवारिक-सामाजिक ताना-बाना अपने सौन्‍दर्य के साथ उपस्थित है । उड़द की बड़ियाँहैं, तो उसके साथ-साथ प्लास्टिक पर धूप में  सूखने के लिए रखे हुए आलू-चिप्स की छवियाँ भी आँखों में उतर आती हैं । बोइयामों में रखे अचारों की याद मुँह में पानी ले आती है । बहन के हाथ के बुने स्वेटर के बहाने आप अपने बक्से से माँ या नानी का बुना कोई स्वेटर निकाल कर धूप में डाल आते हैं, इन सर्दियों में पहने जाने के लिए ।  वेजिटेरियन मटनकटहल की सब्जी बहुत जोरों से याद आने लगती है । नेनुआ के फूल खिले दिखने लगते हैं । मालती की भीनी खुशबू नासिका-रन्‍ध्रों में जाने कहाँ से भर जाती है । ओस की छुअन की याद आनंद से भर देती है मन को । एक कविता संग्रह से आप क्या-क्या चाहेंगे भाई !

             इस संग्रह की कविताओं को पढ़कर एक लड़की के जीवन का पूरा आर्कआपके सामने खिंच जाता है । बस जरा-सा ध्यान से आप कनेक्टिंग द डॉट्‍सकरते चलें । जीवन का स्त्री-पक्ष जीवन की तरलता है, हृदय की नमी है, आँखों का पानी है । उस जीवन की कल्पना भी कितनी भयावह है जब कवि को कहना पड़े “ सोचती हूँ वह अंतिम पुरुष कौन होगा/ जिसका रोना सुनने के लिए नहीं बचेगी कोई स्त्री । स्त्रियों के शाप से तो देवता भी नहीं बच सके।

             साहित्य की हर अच्छी रचना का एक काम यह भी है कि वह अपने लोक के शब्दों का स्मरण कराए, उनका संरक्षण करे । इस संग्रह में ऐसे बहुत-से उदाहरण हैं । मेर मन अटक रहा है संग्रह में आए शब्दों – सूप, करइत, बइर, खोइंछा, गाछ – पर और नेनुआ के फूल’  पर । आपका मन कहीं और अटकेगा !

             कभी-कभी हम वैसी बातों का कहना जरूरी समझते हैं , जिसे कहने से हमारी उपस्थिति खास मौकों या स्थानों पर दर्ज हो सके । हो सकता है ऐसी बातें बहुत लोग बहुत बार कर भी चुके हों, फिर भी हम कह देने का एक नैतिक दबाव महसूस करने लगते हैं ।  जितनी तानाशाहदिल्ली है, उससे कम पटना या राँची भी नहीं । बल्कि हमारे आसपास, घर-परिवार, जान-पहचान, दफ्तर-वफ्तर  हर जगह तानाशाही के किस्से हैं । कहीं प्रकट, कहीं अप्रकट । और बहुत सारी जगहों पर, बहुत सारी बातों में हम खुद को तानाशाहोंकी जी-हुजूरी करते, उनकी लल्लो-चप्पो करते हुए पा सकते हैं। इसे स्वीकार कर पाना एक अलग बात है ।

             कोई आइडिया, कोई विचार, कोई आन्‍दोलन एकबारगी उठ खड़ा नहीं होता । कोई एक बात यहाँ, दो बातें वहाँ इस तरह कर-करके बात आगे बढ़ती है । फिर एक ऐसा समय आता है जब वह बात अपने टिपिंग प्वाइंटपर पहुँच जाती है । फिर वही बात हमें चारों तरफ होती हुई दिखने लगती है । इस संग्रह की कविताओं में ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जो जिस दिन अपने टिपिंग प्वाइंटपर पहुँचेंगी, चारों ओर दिखने लगेंगी । चाहे वो बातें पर्यावरण संबंधी हों, चाहे गाँव-घर-परिवार संबंधी हों, चाहे एक लड़की के सम्मान और अधिकार संबंधी हों ।

             मैं अपनी बेटी से ककहरा सीख रही हूँ’ ,‘मेरी बेटी इन दिनों मेरी दोस्त हैऔर स्पर्शसरीखी कविताएँ बताती हैं कि माँ-बेटी के संबन्ध एक अलग ही धरातल पर होते हैं । ये कविताएँ इस तरह से मन में उतरती हैं कि उजास भर जाता है मन में । एक बच्ची की नन्हीं हथेलियों के कोमल स्पर्श को महसूस करने लगते हैं आप अपने चेहरे पर  । वहीं बचा हुआ है वह मुझमेंकविता का दर्द, सब खो देने का भाव, अवशता और एक मौन आर्तनाद पाठक के हृदय को स्तब्ध कर जाता है। वह जड़वत् बैठा रह जाता है कुछ क्षण ।

               ये कविताएँ मन के इतने करीब, हमारे इतने आसपास की हैं । यह लगता ही नहीं कि कवि और हमारी ज़िंदगियाँ अलग-अलग हैं । कविता को यही बात तो खास बना देती है । मुझे तो यह लगता है कि प्रज्ञा गुप्‍ता अपने मुहल्ले की ही  हैं । वे देख-समझ रही हैं हमारा सारा हाल । और मेरा विश्‍वास है कि हर पाठक को यही लगेगा । हाँ, आलोचकों की बात मैं नहीं जानता ।   

 

             


शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

कुछ भोजपुरी में

 


कुछ भोजपुरी में  

 

 

 

       (१)


हिरना भागल जा ता हो
कस्तूरी मिलते नइखे

केतनो जोर लगाव हो
बोझवा त हिलते नइखे

कइसन तोर निसाना हो
गोटिया त पिलते नइखे

खाली सुतले-सुतला हो
घसवो ले छिलते नइखे

पनिया केतना डलब हो
फुलवा सन खिलते नइखे

घाव दरद बड़ देता हो
कोनो ऊ सिलते नइखे

 

          (२)

चैत के महिनवा हे रामा

कइसे बीते दिनवा

माने नहि मनवा हे रामा

करे का जतनवा

 

साँझ परत रोवत

दिने-दिन ही खोवत

सोचत रहत काहे

न निकसे परनवा हे रामा

चैत के महिनवा

 

करत रहत काहे

जे मन ना चाहे

दौरत भागत का

जोरे तु समनवा हे रामा

चैत के महिनवा

 

    (३)

चैत के महीनवा में

देह के दरदवा

मन के दरदवा से

कम नइखे रामा

 

के ले के जाई हमरा

के ले के आई हो

मन ओझरायल, कोनो

कम नइखे रामा

 

नीमवा के फलवा से

खूनवा त होला साफ

मनवा के साफ करी ?

तम नइखे रामा

 

दूसरा के का कहीं

अपने थकल बानी

अपना से होई का

भरम नइखे रामा

 

सोचले त का रहीं

करले त बानी का

मन कठुआइल, कोनो

कम नइखे रामा

 

उमरिया पे मत जा

डगरिया पे मत जा

केहु कहले होइ

हम नइखे रामा

 

जीते के बा, जीतऽ खुद के

लड़े के बा, लड़ऽ खुद से

औरो कोनो गत के

करम नइखे रामा

 

    (४)

बेलिया के फूलवा से

मनवा न महके

मनवा त महके

बतिया से तोहरे

 

बेलिया के का हऽ

मुरझा जाला

मनवा त रहे ताजा

बतिया से तोहरे

 

बेलिया के देख- देख

बेलिया के छू के

जइसे सुन लेनीं

बतिया के तोहरे

 

बेलिया के खुसबू

साँसे-साँसे घुल के

जइसे बइठे संगे, सुने

बतिया के तोहरे

 

बेलिया के रख के

पन्‍नवा के बीच में

रख लेनी मन में जइसे

बतिया के तोहरे

 

 (५)

उठलो बानी

सुतलो बानी

करतानी का ?

 

बुतलो बानी

जरलो बानी

मन बा कहाँ ?

 

कहलो बानी

सुनलो बानी

के सुनऽ ता ?

 

भितरो बानी

बहरो बानी

धुकेधुक बा

 

करलो रहनी

मरलो रहनी

का जानी का ?

 

रुसलो रहनी

हँसलो रहनी

उ दिनवा कहाँ ?

 

  (६)

बात पुरान

घात पुरान

कर दीं छमा

जाय दीं ना !

 

उनकर भाग

गुस्सा आग

बुझा लीं ना

जाय दीं ना

 

कोनो दाग

कोनो राग

केकरो ना

जाय दीं ना

 

मन के फाँस

इ जरल साँस

केहु के ना

जाय दीं ना

 

खुस रहीं ना

चुप रहीं ना

के मानी ना ?

जाय दीं ना

 

  (७)

त चले के बा

अब जाए के बा

दुनिया ओहि बाटे

ह रस्ता नया

सोचे के नइखे

ढेर झुके के नइखे

तनि खोए के बा

तनि पाए के बा

 

का केहु साथ आई

के साथे भात खाई

सोचे के नइखे, इ ना

गाए के बा

 

जे बाटे काम देख

जाए के धाम देखऽ

चलबकहाँ से, कहँवा

जाए के बा

 

छोड़े से छूटी ना

तोड़े से टूटी ना

मन में जुगा के सब, अब

जाए के बा

 

मन ले के , मान ले के

पूरा धन- धान ले के

बदले में हाथ जोड़े

जाए के बा

 

    (८)

बीतें जल्दी दिनवा हे रामा

कि लागे नाहि मनवा

 

देस-बिदेस के छूटल ठिकनवा

का होइ काहे बिचलित परनवा

रामे भरोसे, रामे सहारे

सब जिए के समनवा

सब जिए के समनवा हे रामा

बीते जल्दी दिनवा

 

रोग-बियोग से बचें सब कइसे

बँध-बँध के कुछो रचें अब कइसे

रामे कराए, रामे बचाए

सबे राते दिनवा हे रामा

कि लागे नाहि मनवा

 

भोर भए जेहि टूटल सपनवा

साँझ परत सेहि खोजे उ मनवा

रामे दिखाए, रामे पुराए

का सोचे के करनवा हे रामा

का सोचे के करनवा

 

पंछी डोलें, बोले कोयलिया

सूना परल सब सहर के गलियाँ

रामे भराए, खाली कराए

फिर भरे रे अँगनवा हे रामा

भरे रे अँगनवा

 

     (९)

कौनो जुगत से, कौनो जतन से

जिया नहीं माने हे रामा

जिया नहीं माने

 

झूठ बने सच, सच बने झूठा

ई दुनिया के रीत अनूठा

करे सब बहाने हे रामा

जिया नहीं माने

 

एक दूसर के केहू न माने

अपनेहू के भी तो ना जाने

खुदे के बखाने हे रामा

जिया नहीं माने

 

नियम तोड़ें उ करें मनमानी

समझें अपना के ढेरे ज्ञानी

मूढ़े के माने हे रामा

जिया नहीं माने

 

जे आँधर बनें मोह के मारे

भल मोह से उनका के उबारे

के बिधि उपराने हे रामा

जिया नहीं माने


(१०)

 बेड़ा पार लगा दीं मैया

सब सुख-दुख बिसरा दीं मैया

मन भरमावल फिरऽ ता सगरे

मन के भरम मिटा दीं मैया

 

ना सरीफ जे खाली ऐंठे

बड़ ऊ ना जे खाली बैठे

हाथ से अपना काम करे में

मन के सरम मिटा दीं मैया


    (११)

कहल नइखे जात, सहल नइखे जात

एतना डरा के रहल नइखे जात

 

देस के हालत देखल नइखे जात

हमरा से अँखिया मुँदल नइखे जात

 

साहब आ हाकिम जिए नइखे देत

हमरा से रोजे मुअल नइखे जात

 

मनवा के डर कहऽ कब ले डरइबऽ

रुकल नइखे जात, चलल नइखे जात

 

ऊपर वाला देखत काहे नइखे

सूतल बा कइसन जगल नइखे जात

 

कइला से होला, बूझत नइखे का

ई बुझियो के जे बुझल नइखे जात

 

ऊ खानी हमरा उठल नइखे जात

उठला के खातिर गिरल नइखे जात

 

     (१२)

खिंचत बानी गाड़ी खिंचत बानी हो

जिनगी के गाड़ी खिंचत बानी हो

 

दगवा ई कोनो करम से न जाए

कपड़ा हम रोजे  फिंचत बानी हो

 

का कहीं सगरे सुखाड़े सुखाड़ बा

मनवा के कइसे सिंचत बानी हो

 

ओझरा गइल चदरिया लागल खोंच

हम बइठल अकेला सिअत बानी हो

 

जिअला के खातिर मूअत बानी हो

मूअले के खातिर जिअत बानी हो

 

    (१३)

होली कइसन बिदेस में

होली कइसे बिदेस में

अरे मन अँकुसल देस में

 

ऊ टोली मोहल्ला के

रे ऊ हल्ला गुल्ला के

न मजा भूलल बिदेस में

 

मनवा सुखल मुरझा गइल

पूआ बड़ा सपना भइल

खाना खा तानि मेस में        २१०३२०२३


    (१४)

फागुन चढ़े द

निरगुन पढ़े द

मन के करे द

 

दुख बा, हँसे द

भितरे भरे द

 

फूले फले द

मनवा  फरे द

 

हरि के हेरऽ

हरि के हरे द

 

तहरा बा का

उनका डरे द

 

जिनकर बा मन

उनका चरे द

 

फागुन-रँगल-

रमले धरे द         ०२०३२२

 

(१५)

बैगन के पकला के

खुसबू भरल

लिट्टी मिली

कि रोटी सतुआ भरल

 

पीजा बा बरगर बा

औरि मोमो

रह जा ला इहवाँ

एहिंगे धरल

 

कहत रहलें बाबूजी

ध्यान धरे

चाही काम आपन

समय पर करल

 

दिने-दिन हो तानी

उनके लेखा

खोजेनी बेटवा के

साँझ ढरल             

 

समझेनी बूझेनी

तबहुँ काहे

सोना के हिरना के

पीछे परल           २१.०३.२०२२

 

      (१६)

जिंदा रहीं त का बा जे मर जाईं हम त का

दुनिया बा चुऽपे से गुजर जाईं हम त का

 

बानी हम कोन चीज आगे जमाना के

सपना हईं इहाँ जे बिखर जाईं हम त का

 

के बा जे खोजsता हमरा के अब उहाँ

साँझ हो गइल बा लौटि के घर जाईं हम त का

 

दिल के लगल त साथ रही ई भर उमिर

दरिया बा गम के पार कर जाईं हम त का

 

 

[ ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या

 

दुनिया से ख़ामुशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या

 

हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने

 

इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या

 

अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ

 

शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या

 

दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र

 

दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या  -- मुनीर नियाज़ी ]

 

      (१७)

 

देखीं,कइसन कइसन राजा ,कइसन कइसन मेठ

भितरि जे जेतना भिखमंगा,उहे कहावे सेठ

जो गी रा सा रा रा रा

 

कुछ पइला से मन ना लागे,कइसन राग- बिराग

भरल जवानी बूढ़ भइल बा,ठंढाइल बा आग

जो गी रा सा रा रा रा

 

हम बोलीं तहरा तू बोलs हमरे मनवा चोर

रोजे रोजे गल्ती होला,रोज पराला भोर

जो गी रा सा रा रा रा

 

केकरा के हम संघी कहीं, केकरा बामपंथि

खाली लेके बइठल बाड़ें, आपन आपन ग्रंथि

जो गी रा सा रा रा रा

 

मूस मुटइहें लोढ़ा बनिहें, फिर भी रहिहें मूस

कतनो खुस हो जाई तब्बो, परजा घासे-फूस

जो गी रा सा रा रा रा

 

काम करावे खातिर देखीं,सब रस्ता बा सेट

दाम चुकाईं मेवा पाईं,जइसन सुतरे रेट

जो गी रा सा रा रा रा

 

जे ना बूझे ऊहे बोले,खूब अलापे राग

कोयल बन बइठल मुस्कावे,मुँहवा खोले काग

जो गी रा सा रा रा रा

 

सोझ के मुँह त कुतवो चाटे, रहे टेढ़ से सोझ

दुनिया चाँपल चाहे देके,माथे भर-भर बोझ

जो गी रा सा रा रा रा

 

हाथ जोर जे करे निहोरा,बोली बोले मीठ

काम पुरे पर देखीं ओही,कतना बड़का ढीठ

जो गी रा सा रा रा रा                                                      २०२२

  

   (१८)

 ए दोस, का कहीं

मन नइखे लागत

मन नइखे लागत

मन नइखे लागत

 

नींद के ठिकान ना

रात के बिहान ना

रस्ता देखा पाइ

केहू बतला पाइ

और कुछो हो पाइ

कुछो ई गुमान ना

अइसहि घुमत बानि

मन नइखे लागत

 

उमरिया त रुके ना

डगरिया त रुके ना

कुले जना भाग ता

कुले मना भाग ता

इ बतिया त रुके ना

हमहुँ दौरत बानि

मन नइखे लागत

 

सभे लोग दीन बा

सेवे में लीन बा

कोनो मालिक भइल

कोनो सेवक भइल

कुछो ना एक भइल

इहे गोरमीन बा

बुझत-झींकत बानि

मन नइखे लागत

 

आपन औकात का

अपना में बात का

आव दिखावल जाव

ई समझावल जाव

मने जगावल जाव

दीया जज्बात का

कि बस सपरत बानि

मन नइखे लागत

 

रोजे ई आव ता

रोजे ऊ जाव ता

रोयलो ना समझे

देखलो ना समझे

जानलो ना समझे

मने के मनाव ता

भितरे झरत बानि

मन नइखे लागत              २०१९

             

     (१९)

कोयलिया गावऽ तिया

भरल रतिया

मनवा पिरावऽ तिया

भरल रतिया

 

का दुख बा दुनिया के

गा गा सुनावऽ तिया

भरल रतिया

 

का से का छूट गइल

दुखवा जगाव तिया

भरल रतिया

 

हम ना रहनी कोई

हमरा बतावऽ तिया

भरल रतिया

 

जे भितरे फाँक रहे

हमरा दिखावऽ तिया

भरल रतिया

 

सगरे सब पइसा के

खेला जनावऽ तिया

भरल रतिया                    ०८.०४.२०२३

             

   (२०)

चैत मासे सुनीं

बोलेली कोयलिया

न जाने न जाने

न जाने मोरा पिया

 

काहे कित छूटल

जे साथी-संघतिया

न जाने न जाने

न जाने मोरा जिया

 

बाहर सगरे जे

कुल रंग-बिरंगा

बस मनवे जइसे

भारी कारी रतिया

 

होला दुख गाढ़ा

चाही पातर करि के

जरा-जरा पिअला

जे दुखे नहीं छतिया

 

दू दिन रहनीं हम

कि अब चार दिना इहाँ

केहू  ना   पूछी

हम जानेली  बतिया

 

जे साँसे-साँसे

जहर घुलल बा हे

पुरबा चले कि अब

चले रे कती पछिया

 

घड़ी बेर बइठल

आती जाती बेला

सुख के दिनवा के

साखी टाटी झरिया                     २९.०३.२०२४


   (२१)

 भोरे भोर देखीं कि

बोलेली कोयलिया

बोलेली कोयलिया हो रामा

कहाँ आवे निंदिया

 

बिसरायल रहे, रहे

जिनकरे रे निसनिया

जिनकरे रे निसनिया हो रामा

याद उनकरे बतिया

 

धूल परल दरपन सब

लागे धुँधला अँखिया

लागे धुँधला अँखिया हो रामा

काहे अँखिये पनिया

 

जे बीतल बीत गइल

बदले रोजे दुनिया

बदले रोजे दुनिया हो रामा

दुखे न दीहिं कंठिया                      ०२.०४.२०२४

              

    (२२)

 मत झारऽ टिकोरवा हो रामा

रहे द पेड़वे में

भरल अँखियो में हो रामा

रहे द डेरवे में

 

आँधी आई पानी आई

सँग टिकोरा के सपनो झर जाई

मत तूड़ऽ सपनवा हो रामा

कि सजे द घरवे में

 

घेरवा टूटी डेरवा छूटी

मोह के सगरे धागा टूटी

कि बाँधीं एगो धगिया हो रामा

मने के पेड़वे में                             १४.०४.२०२४

     

    (२३)

 नाला कुल साफ रहे

बीस बरीस  पहले

जे माछ  मलाह  रहे

बीस बरीस पहले

 

चकचक सीसा जइसन

उपरो   से   देखीं   सन

पइसा   झलकात   रहे

बीस बरीस पहले

 

कम भइल ऑक्सीजन

मर जालीं  मछली सन

अइसन  ना  बात   रहे

बीस बरीस पहले

 

जमुना-रच्छक  हमनीं

दिल्ली  आइल  रहनीं

मछरी    भेंटात     रहे

बीस बरीस पहले

 

कूड़ा करकट   फेकल

कइसे जाला    देखल

     कार-धार    रहे

बीस बरीस पहले

 

बड़का  जहाज   आई

नदी  के  परान   जाई

सब न लोभ-लाभ रहे

बीस बरीस पहले

 

एगो    परम्परा    

जिए के  आसरा ह 

शान  से   मलाह   रहे

बीस बरीस पहले           १०.०१.२०२५

 

     (२४)

दुनिया  बा    कुम्भ   के   मेला

भीड़े     भड़क्का      रेले    रेला

 

मेलवे     में      हेरायल     बानी

का   जानी   ओझरायल    बानी

मनवा    पिरावे      रोजे     रोजे

रोजे      रोजे      रोजे    झमेला

 

एके   दुनिया   प्रेम   के   दुनिया

एके    बानी     प्रेम    के    बानी

जानेनी       समझौलो    बानी

कौनो   केकरो     कहाँ    सुनेला

 

गोदना    ताबीज     मिलौला   से

ना   उपरे  उपर    झमकौला   से

मन  के  रस्ता    अलग  बा   भाई

मन   खाली   मनवे    से   चुनेला

 

आपन  आपन  कइल  देखीं  सन

का  से  का  बा  भइल  देखीं सन

जेतना    भितरे     बा    कठिनाई

बहिरा    ओतने    दिनो     दुहेला                २८.०१.२०२५

    (२५)

बगुलवा खोऽजता देखीं

बगुलवा बौऽखता देखीं      

निसाना पाका बाऽ कि ना

निसाना साऽधता देखीं

 

इहे कुल बाऽत बा देखीं

फिकिर दिन राऽत बा देखीं

दरद के जानेला जन के

खुदे के हाँऽकता देखीं     ३०.११.२०२५

    (२६)

 अगहन बीते मनवा रीते

बरसऽता मन चाँद सरीखे

के देखी बा का मन के भीते

दुखवा कहीं त

कहीं हम कइसे

अगहन बीते...


का चाहीं जानि अउरि का माँगीं

मनवा के जाने कतना धाँगीं

डेगे डेगे सपनेहि रूआँ गिरऽता

सपना के बाँधीं

गहीं हम कइसे

अगहन बीते...                     ०४.१२.२०२५