स्मृतिबन्ध
सारी बातें अपने ही मन
को मनाने के लिए होती हैं ।
अभी तो साल शुरू हुआ था ! और अब, बस खतम...!
फिर नया वर्ष आने को है । एक नया वर्ष चैत में भी आएगा । जीवन का एक नया वर्ष जन्मदिवस से भी शुरू होगा । हम जीवन में नयेपन की तलाश में फिरते रहते हैं । कुछ नहीं तो ‘ई कोठी का धान उ कोठी’ ! कहते हैं कविता में भी कुछ नया होना चाहिए, तभी कविता होती है । नयापन उत्साह का संवाहक होता है । भय और संशय का भी हो सकता है, लेकिन भाता वही नयापन है जो मन को उत्साह और उमंग से भर दे ।
मनुष्य का जीवन स्मृतियों से बना हुआ है । जिसे हम ‘जीन्स’ कहते हैं, वह भी तो स्मृति-पुञ्ज ही है ! जाने कितनी पीढ़ियों की बातें हममें प्रकट होती रहती हैं । जीवन जाने कब कबकी बात याद कर ले ! हर क्षण प्रतिक्षण स्मृतियों में बदलता जाता है । यह साल भी !
विक्रम संवत् के महीने शुरू होते हैं कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से । लेकिन नया वर्ष शुरू होता है चैत के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से । ऐसा क्यों? इसीलिए न कि हम आगे देखें तो उज्ज्वलतर चीजों की ओर देखें ? हम जीवन में शुक्ल पक्ष के आकांक्षी हों । तो फिर महीने कृष्ण पक्ष से क्यों शुरू होते हैं ? वह इसलिए कि हम जीवन में थोड़ी कठिनाई, थोड़े संघर्ष सबको पार करते हुए पूर्णिमा के चाँद की तरह पूर्णता की ओर अग्रसर हों ।
स्मृतियाँ बन्धन नहीं होतीं । वे बाँधती नहीं मुक्त करती हैं । बाँधता तो मोह है । स्मृतियाँ ‘प्र’बन्ध हैं । हमें ऐसा लगता है कि जीवन का प्रत्येक दिन एक अलग मुक्तक है, लेकिन स्मृतियों का एक प्रबन्ध काव्य है हमारा जीवन । स्मृतियों से रचा हुआ प्रबन्ध काव्य । बस, इसमें यही है कि हम पन्ने पलट कर आगे नहीं जा सकते । जब समय आएगा, पन्ने तो तभी पलटे जाएँगे और तभी हम पढ़ पाएँगे कि उनमें लिखा क्या है । जिस तरह किताबों में कई लोग कुछ पंक्तियों को अंडरलाइन करते चलते हैं, हमारा मन भी कुछ स्मृतियों के नीचे लाइन खींच देता है । यह लाइन एक हाइपरलिंक बन जाती है । उस पर क्लिक कीजिए तो जीवन का एक अलग पृष्ठ खुल जाता है । फिर उस पृष्ठ पर कितनी सारी स्मृतियाँ। उनमें से कुछ के नीचे खिंची हुई लाइन, एक और हाइपरलिंक बनाती हुई ।
शैलेन्द्र ने एक गीत में लिखा है –“ कि मर के भी किसी को याद आएँगे/ किसी के आँसुओं में मुस्कुराएँगे ” । हम सभी याद आना चाहते हैं , और एक भले ,एक अच्छे व्यक्ति के रूप में याद आना चाहते हैं । ये यादें ही हमारी असली कमाई हैं । जावेद अख्तर कहते हैं –“ मुझे तुम याद करना और मुझको याद आना तुम” ।
किसी मंदिर के पास से गुजरते हुए अगरबत्ती की बहुत मीठी सुगंध नाक में भरती है, आपको कोई पुरानी जगह याद आ जाती है। किसी खिड़की से घी में बनते हुए परौठे की सुंगंध आपके कदम रोक लेती है , रात की रानी की खुशबू का झोंका मन-प्राण को सहला जाता है, रूई के फाहे पर इत्र की सुवास बचपन के किसी दुपहर की याद दिला जाती है । कोई पुराना ‘प्रिया’ स्कूटर पास से गुजरता है, किसी के बाल बनाने का अंदाज, किसी के मुस्कुराने का अंदाज – याद के कितने सारे ट्रिगर प्वाइंट हैं ! दरअसल हमारे अंग-प्रत्यंग में स्मृतियों का वास है ।
स्मृतियों का जितना महत्त्व है, उतनी ही बड़ी नेमत है भूलना भी । यदि हमें एक-एक बात याद रहने लगे तो जीना मुश्किल हो जाए । संगीत या कविता में यति-गति की बात करते हैं , ताल में मात्राएँ गिनने में ताली और खाली की गिनती करते हैं । ताल का सौन्दर्य ताली में तो है ही, खाली उस सौन्दर्य को बढ़ाता है, उभारता है । खाली जगहों की बहुत जरूरत होती है जीवन में । भूलना हमें स्पेस देता है । यह अलग बात है कि कुछ लोगों का भूलना सेलेक्टिव होता है ।
कुछ स्मृतियाँ अपने में दंश छुपाए भी होती हैं । स्मृति-दंश को जड़ से खत्म कर पाना लगभग असंभव है । उनको नियंत्रित किया जा सकता है, सुषुप्तावस्था में रखा जा सकता है । ऐसी स्मृतियाँ खींच-खींच कर हमें अपने गुजरे हुए समय में ले जाना चहती हैं।
कई बार ऐसा लगता है कि समय नहीं गुजर रहा, हम गुजर रहे हैं । अलग-अलग समय खड़े रहते हैं, हम उनमें से होकर निकलते चलते हैं । एक ही साथ कई-कई समय उपस्थित रहते हैं । कुछ साल पहले, बरसों बाद ट्रेन के अनारक्षित डब्बे में सफर करने की स्थिति बनी । उस सफर के दौरान बार-बार यह लगता रहा है कि वह समय तो उपस्थित है – अपनी आवाजों मे, अपनी बातचीत के मुद्दों और तरीकों में, अपनी चिंताओं और योजनाओं में । मैं अब उस समय से निकल कर किसी और समय में पहुँच चुका हूँ । आपने ध्यान दिया होगा कि जब हम अपनी स्मृतियों में प्रवेश करते हैं तो हमारी देह-दशा, हमारी काया तो अभी की रहती है लेकिन स्मृति में आने वाले व्यक्ति, वस्तु और स्थान वैसे ही रहते हैं , जस का तस । स्मृतियाँ हमारे जीवन के दो अलग-अलग समयों को एक साथ खड़ा कर देती हैं । क्या स्मृतियाँ सन्धिकाल हैं? क्या वे जागा हुआ सपना हैं ? अपने निकटतम से निकटतम एवम् प्रिय से प्रिय व्यक्तियों और स्थानों को हम अपने जीवन का कितना हिस्सा दे पाते हैं ? हम सब अपने-अपने जीवन को अपने तईं सार्थक बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसमें छोटे-बड़े और सही-गलत का कोई प्रश्न नहीं होता । जो भी है, वह बस ‘होता’ है । यह तो स्मृतियाँ हैं जो हम जीवन-मात्र से ही जुड़ाव महसूस करते चलते हैं ।
हमारे अनुभव स्मृतियों को बनाते हैं । स्मृतियाँ हमें । हम किस ‘छाप’ के हैं, यह तय करने में हमारी स्मृतियों का बहुत बड़ा हाथ होता है । हम कहते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । क्यों कहते हैं ? हमारे ‘जीन्स’, हमारे गुणसूत्र में छपा हुआ है । हमें साथ चाहिए । यह फेसबुक, व्हाट्सेप, एक्स, इन्स्टा इतनी व्यापकता के साथ क्यों उपस्थित हैं ? हमें साथ चाहिए । हम अपनी यादों को, अपने होने की यादों को एक-दूसरे की यादों में दर्ज करना चाहते हैं । हम जुड़ना चाहते हैं। जिस परिवार, जिस मुहल्ले, जिस समाज का लोप होता जा रहा है, हम उसे बचा लेना चाहते हैं । हमारे ‘जीन्स’ की छाप हमारे निष्ठुर होते जा रहे परिवेश से बगावत कर रही है ।
अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार साल खत्म हो रहा है । तो, नया शुरू भी तो हो रहा है । फिर चैत है, फिर जन्मदिन है ...एक कैलेण्डर तो मन के भीतर भी है । उसमें रोज एक नया साल शुरू होता है ।

