गुरुवार, 7 नवंबर 2024

दूसरा पक्ष : राही डूमरचीर का आलेख ‘ कुछ तो वजह है कि बचा हूँ इस पृथ्वी पर’

 

दूसरा पक्ष :

(सही,गलत या अच्छा,बुरा ठहराने को नहीं, सिर्फ एक दूसरा पक्ष)

 राही डूमरचीर का आलेख कुछ तो वजह है कि बचा हूँ इस पृथ्वी पर

 

राही डूमरचीर का आलेख कुछ तो वजह है कि बचा हूँ इस पृथ्वी पर’  विनय सौरभ के कविता संग्रह बख्तियारपुरपर केंद्रित है । सबसे पहली बात तो यह कि आलोचक और आलोच्य दोनों ही मेरे प्रिय हैं । राही को पहले मैंने कवि के रूप में जाना, बाद में आलोचक के रूप में । विनय सौरभ का कवि-रूप ही अभी तक पढ़ने को मिला है । राही डूमरचीर और विनय सौरभ के विषय में, जितना उनको पढ़ा और देखा-सुना-जाना है, विश्‍वास के साथ कह सकता हूँ कि दोनों के यहाँ व्यक्तित्व और लेखन में फाँक नजर नहीं आती ( इस वाक्य में ज्यादातर शब्द जोड़ देना व्यावहारिक होगा !) । यह एक दुर्लभ गुण है आज के युग में ।

राही जब भी लिखते हैं तो बहुत तैयारी के साथ, पूरे मनोयोग से और खूब विस्तार में । बख्तियारपुरपर उनके द्वारा लिखा गया यह लेख भी वैसा ही है । और जब वे बख्तियारपुरपर लिख रहे हैं, तब वे कविता के पूरे परिदृश्य पर भी लिख रहे हैं । जिसने भी यह लेख पढ़ा है, वह समझ सकता है ।  कवि विनय सौरभ और उनकी कविता के विभिन्न पहलुओं पर तो उन्होंने बातें की ही हैं । आलेख के शुरू में ही उन्होंने टेरी ईगलटन को उद्धृत किया है – सवाल यह नहीं है कि आप पाठ को कितनी दृढ़ता से पकड़ते हैं, बल्कि यह है कि ऐसा करते समय आप  खोज क्या रहे हैं। मेरी बात भी यहीं से शुरू होती है । उसमें यह बात भी जोड़ दी जाए कि आप कहाँ से खड़े होकर देख रहे हैं, और किस तैयारी के साथ। मुझे लगता है आलेख में कही गई कुछ बातों का एक दूसरा पक्ष भी हो सकता है । कई बार स्थान थोड़ा-सा बदलने से दृश्य बदल जाता है । परिदृश्य भी ।

आलेख में राही कहते हैं – यह एक तरह की राजनीति ही तो है, जो किसी को उसके सही नाम या उसके नाम के सही हिज्जे के साथ नहीं बुलाती और किसी के नाम को ‘जी’ लगाकर बुलाती है. किसी को पुकारने और सम्बोधित करने तक में राजनीति शामिल होती है, हमारा लहजा तक राजनीति से प्रभावित होता है. इसलिए कोई ‘लिट्टी’ हो जाता है और कोई ‘गंगेसरा’. यह एक तरह की राजनीति है कि वह बहुसंख्यकों में हीनता-बोध को रचती-पगाती है । जिस कविता को उन्होंने उद्धृत किया है, वह भी यही कह रही है । इस तर्क को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन बात यह भी तो है कि नामों को इस तरह थोड़ा बिगाड़कर बोलने का चलन ( कम-से-कम बिहार, खासकर उत्तर बिहार के इलाकों में ) सहज आत्मीयता या हँसी-मजाक के कारण से भी होता रहा है । क्या यह बात सही नहीं है कि ज्यादा करेक्ट होने के चक्कर में हमारे बीच से हास-परिहास का व्यवहार खत्म होता जा रहा है ? जो एक व्यंग्य करने की या तंज़ कसने की बात थी, वो सिरे से गायब होती जा रही है । यह ठीक है कि बहुधा यह व्यंग्य क्रूर भी हो जाया करता है, लेकिन इतना तो तय है कि इस तरह से हँसी-मजाक के खत्म होते चले जाने से आदमी का हँसना- हँसाना ही खत्म हो जाएगा । इसमें खुद पर हँस लेने की सामर्थ्य भी शामिल है । आदमी के समाज से कटे-कटे रहने और समाज के बँट जाने का यह एक सबसे बड़ा कारण हो सकता है ।

आजकल आदिवासी जीवन को साहित्य में बहुत प्रमुखता दी जा रही है । और यह दी भी जानी चाहिए। लेकिन हमें सजग रहना होगा । कहीं ऐसा तो नहीं कि एक नया बाजार तैयार किया जा रहा हो, जिसका दोहन अब होगा ? जिस तरह कंज़्यूमर गुड्‍स का बाजार पहले बड़े शहरों से शुरू होता है, फिर धीरे-धीरे दूर-दराज के इलाकों तक फैल जाता है, साहित्य भी बहुत से लोगों के लिए सिर्फ और सिर्फ व्यवसाय है, इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए । बाजार के संदर्भ में देखें तो संख्या के हिसाब से सबसे बड़ा वर्ग मध्यवर्ग ही है । जो मध्यवर्ग से नीचे है, वह भी चाहे-अनचाहे उसी में शामिल होता जा रहा है । ऐसे में मध्यवर्गीय अनुरागया आभिजात्यवादी सौंदर्यबोधको नकार देना, उसे नकारात्मक समझना या उससे बच पाना कहाँ तक संभव है ? ‘टीन की छत पर बारिश की आवाजेंक्या आज के जमाने में भी आभिजात्य सौंदर्यबोध का द्योतक है? क्या दूसरों के अभावों से अपनी संपन्नता की तुलना करके खुश होना सिर्फ मध्यवर्ग का ही चरित्र है ? क्या सौंदर्य-मात्र ही आभिजात्य होने को इंगित नहीं करता ? क्यों, व्यक्ति चाहे किसी भी वर्ग का हो, खास मौकों पर सजना-सँवरना चाहता है ? शब्दकोश में आभिजात्य के दिए गए अर्थों में पांडित्य और सौंदर्य भी है । लोक की सौंदर्य-दृष्‍टि से आभिजात्यता के घेरे को तोड़ने से, हो न हो, एक अस्पृश्यता की भावना का एहसास मिलता है , किसी भी तरह की आभिजात्यता के खिलाफ । चाहे तो इसे विलोम अस्पृशयताकह लें । वैसे भी बजता है जलतरंग टीन की छत पे जब मोतियों जैसा जल बरसे फिल्मी गीतों में ही ज्यादा सुहाता है । बारिश का संगीत तो खुले में, घने पेड़-पौधों-पत्तों के बीच ज्यादा सम्मोहन पैदा कर सकता है ।  

हमारी भाषा में प्रकृति के प्रति अपार अघोषित हिंसा है, यह कथन चिंतित कर देनेवाला है । इस पर थोड़ा विचार किया जाए । प्रकृति में हर वस्तु अपनी एक उपयोगिता लिए हुए है, और उसी के अनुसार प्रकृति में संतुलन बना हुआ रहता है । न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी’ , इस कथन पर सोचने पर यह लग ही सकता है कि बाँसबेचारा बेवजह मारा जाता है । लेकिन, वस्तुत: ऐसा है क्या ? इस कहावत में संभवत: ज्यादा जोर न बजेगी बाँसुरीपर है । बाँस की अनुपल्ब्धता सिर्फ बाँस के समूल नष्ट कर दिए जाने से ही सुनिश्चित नहीं की जा सकती, और भी तरीके हो सकते हैं । फिर, यह जानी हुई बात है कि बाँस सबसे तेजी से उग आने वाली घास की प्रजाति है । गूगल पर प्राप्त जानकारी के अनुसार बाँस एक सपुष्पकआवृतबीजीएक बीजपत्री पोएसी कुल का पादप है। इसके परिवार के अन्य महत्वपूर्ण सदस्य दूबगेहूँमक्काजौ और धान हैं । घास,गेहूँ, मक्का,जौ, धान—इन सभी की फसल को भी काटा जाता है ही । दूसरी एक बात यह भी है कि एक 18 मीटर लम्बे पेड़ को काटने पर उसका पुर्ननिर्माण होने में 30 से 60 वर्ष लग जाते है। इसकी तुलना में 18 मीटर के बाँस को 59 दिनों में वापस उगाया जा सकता है। तो, संभव है कि न रहेगा बाँस से  बाँस के काट दिए जाने की बात न हो रही हो, और यदि हो भी, तो भी बाँस कुछ ही दिनों में फिर उगाए जा सकते हैं । हाँ, इतना जरूर है कि भाषा के प्रयोग में टोनबहुत कुछ इंगित कर जाता है । सीधी-सरल लगने वाली बात भी गाली मान ली जा सकती है, गालियों में प्रयुक्त होने वाले शब्द भी हँसी-ठट्ठा ! व्यक्ति की मंशा उसके द्वारा कहे गए शब्दों के अर्थ बदल दे सकती है । निहितार्थ भर सकती है ।

ऐसी ही बात पानी पड़ जाना’, इस कहावत को लेकर भी है । पानी तो हमारे पंचतत्वों में एक है। पानी का गुण है भिगाना, शीतल कर देना, बुझा देना । पानी जीवनदायी है, तो कभी वह सजा भी दे सकता है । पानी पड़ा है अगर तो किसी न किसी प्रज्वलित चीज पर ही । प्रज्वलता आशा, सपने और उत्साह का प्रतीक है । पानी पड़ने या पानी फिर जाने से उत्साह के बुझ जाने का जो अर्थ प्रकट होता है, वह सीधे-सीधे तथ्यात्मक वाक्यों से तो नहीं हो सकता है । कविता पढ़ते समय अगर यह प्रतीत हो कि इसकी कोई उक्ति जबरन अपनी बात सिद्ध करने के लिए, किसी को नीचा दिखाने के लिए आई है, तब हम जरूर कहें कि कवि ने भाषा का दुरुपयोग किया है । कवि तो अपनी चेतना के स्तर से, अपने मनोभावों की भूमि पर खड़ा होकर बात करता है । अगर वह अपने उद्गारों के प्रति ज्यादा ही सतर्क होने लगे तो भाषा में कृत्रिमता आने का खतरा रहेगा । कवि का पॉलिटिकली करेक्ट होना कितना आवश्यक है, और यह कितना संभव हो सकता है ? भाषा के प्रयोग के द्वारा हिंसा न हो जाए, यदि इस बात पर बहुत ही ज्यादा जोर दिया जाने लगे, तब तो हमारे जीवन की बहुत सारी बातों में- खाने-पीने से लेकर पहनने-ओढ़ने, बातचीत से लेकर उठने-बैठने में – हमें यह खटका लगा रहेगा कि कुछ गलत न हो जाए । यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि भाषा क्या है, अभिव्यक्‍ति का साधन और साहित्य या कविता जीवन की अभिव्यक्‍ति। जीवन में जो कुछ है, उसकी अभिव्यक्ति होगी, और उस अभिव्यक्ति का माध्यम है भाषा । भाषा से हटाने से पहले किसी भी बात को जीवन से हटाना होगा । कवियों को ज्यादा कड़ाई वाली नजरों से देखने का एक मतलब तो यह है कि हमें उनसे सर्वोत्तम की अपेक्षा है, अत: उनकी छोटी-से-छोटी कमी भी सुधारे जाने का प्रयास हर स्तर पर हो । दूसरी बात यह भी है कि हो सकता है हम उनके यानी कवियों के प्रति थोड़ा अनुदार भी हो रहे हों ।

अपने बहुचर्चित निबंध कविता क्या है?’ में आचार्य रामचन्‍द्र शुक्ल कहते हैं कि मनुष्य जिस अवस्था में अपने आपको भूलकर विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, उस अवस्था को प्राप्त करने के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं । यानी कविता प्रथमत: और अन्‍तत: अनुभूति ही है । हर कवि अपनी कविता में अनुभूति को ही पकड़ना चाहता है । कविता अनुभूत किए जाने की चीज है, यदि यह नहीं सधे, तो बस शब्दों का खेल बचता है। और यह जो अनुभूति है वह सार्वभौमिक है, वह यक्ति-विशेष की नहीं, मनुष्य-मात्र की है । उसका प्रकट होना हर कवि के यहाँ देश-काल-संदर्भ-सापेक्ष है । अनुभूति वही है, प्रकटीकरण भिन्न-भिन्न। नीचे तीन कविताओं के उद्धरण दिए गए हैं । कवियों के नाम बाद में बताए जाएँगे । हम यह देखें कि क्या तीनों कवि एक-सी संवेदना को ही शब्द नहीं दे रहे । अलग-अलग बैकग्राउंड से आए कवि क्या एक ही अनुभूति तक पाठक को नहीं ले जा रहे? –

             अब जिसकी छत है

  पतंग भी उसी की है  [1]


  जिसके पास चली गई मेरी ज़मीन

  उसी के पास अब मेरी

  बारिश भी चली गई  [2]  


  बोलते हैं लोग केवल बोलने के लिए

 

  लड़ रहे हैं आदिवासी

  अघोषित उलगुलान में

  कट रहे हैं वृक्ष

  माफियाओं की कुल्हाड़ी से और

  बढ़ रहे हैं कंक्रीटों के जंगल से

 

  दांडू जाए तो कहाँ जाए

  कटते जंगल में

  या बढ़ते जंगल में?  [3]

 

कवि हैं क्रमश: विनय सौरभ[1], नरेश सक्सेना[2] और अनुज लुगुन[3] ।

कविता की जमीन को समझने के लिए कवि की जमीन को भी समझना होगा । कई बार रंग-रूप और स्वाद अलग होने के बाद भी तासीर एक-सी हो सकती है । कवि की जमीन के साथ-साथ पाठक की मनोभूमि को भी जोड़ देना चाहिए । कोई भी रचना पाठक के मर्म-स्थल तक पहुँच कर ही पूरी होती है । कविता को चेतना के किस स्तर से, किस मनोभूमि पर खड़ा होकर और किस तैयारी के साथ देखा जा रहा है, ग्रहण किया जा रहा है, कविता का अर्थ इस पर भी निर्भर करता है । कविता, कवि और पाठक दोनों के लिए स्वांत: सुखायहोनी चाहिए । राही डूमरचीर का यह आलेख भी इस बात का साक्षी है ।   

1 टिप्पणी:

  1. चेतन जी, आपकी यह दृष्टि भी, कविता ही नहीं, प्रकृति और इस संसार को देखने के लिए भी कई खिड़कियाँ खोलती हैं। आभारी हूँ कि यह पढ़ने को मिला है।

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