जिस गीतकार के गीत अभी दहाई में ही सामने आए हों, उसका आकलन करना ठीक नहीं, सम्भव नहीं । और यह कोई आकलन है भी नहीं । कहा भी जाता है कि बढ़ते बच्चों की लंबाई नापनी नहीं चाहिए । तो गानों की गिनती की बात नहीं होगी । रंगरेज़ गाने पर पहले ही बात हो चुकी है पिछले लेख में ।
आज के हिंग्लिश दौर में कोई तो है जो हिंदी, बल्कि हिंदुस्तानी की ज़मीन कस के पकड़े हुआ है । आप राजशेखर के लिखे गानों को सुनिए । कई शब्द, कई मुहावरों की याद ताजा हो जाएगी । एकदम सरलीकरण और फटाक से हिंग्लिश पर उतर जाने वाले दौर में आपको हिंदी, उर्दू के ऐसे शब्द सुनने को मिल जाएंगे जिन्हें आप जानते तो हैं, पर भूल से चले हैं । मसलन लेने के देने, हवाबाज, सौ फीसदी शर्तिया, कासा-ताँबा,कुर्की-जब्ती, पाटों, बिंधा, दर ब दर, नसीहत, मशवरा, दफ़ा, उधड़े,विरह, रिहा, सोलह आना, दालचीनी, कलौंजी, पोस्ता, टॉकीज़, ठोड़ी, ताउम्र,चित भी मेरी पट भी मेरी, माथापच्ची । यह सूची लंबी तो हो गई, पर आपको भी कुछ देर मज़ा देने का लोभ संवरण न हुआ ! उसी तरह इन गीतों में जो उपमाएं हैं वो भी अलग रस देती हैं ।
मुझे याद है जब प्यार हुआ इकरार हुआ गाने में दसों दिशाओं सुना तो अचानक लगा कितनी अच्छी बात सीख ली । दस दिशाएँ । पहले कभी ध्यान गया ही नहीं था । शैलेन्द्र का कमाल कि यह बात कितनी सरलता से एक बढ़ते हुए लड़के को सिखा दी । उसी तरह मजरूह साहब का लिखा गाना ऐ मेरे हमसफ़र सुना तो जाना सदा भी कोई चीज़ होती है । यह उदाहरण इसलिए दिए जा रहे हैं कि इसकी बहुत संभावना है कि राजशेखर के गानों को सुनकर बहुत से लोग ऐसा सोचेंगे । अपने गीतों में वो लिखते हैं तीसों रात , नीम सा कड़वा, लफ़्फ़ाज़ी, सोलह आना - ऐसे और भी कई शब्द जो कम से कम नई पीढ़ी को इन शब्दों से परिचित तो करा देंगे । और जो कुछ थोड़ी पुरानी उम्र के हैं, वो उनके गानों को सुनकर थोड़े नॉस्टैल्जिक हो जाएंगे । पिछले लेख में भी लिखा था कि भाषाएँ ऐसे भी बचती हैं ।
जिस गीतकार ने अभी ज्यादा गाने न लिखें हो उसके गानों में कितनी विविधता ढूंढी जा सकती है ? कव्वाली भी है, पंजाबी भी है, हरयाणवी भी है, हरयाणवी एक्सेंट अंग्रेजी भी है, अंग्रेजी मुखड़े भी हैं । गानों को सुनते वक्त सोच ही रहा था कि राजशेखर साहिर के जैसा मन रे तू काहे न धीर धरे या कुछ ज्यादा हिंदी वाला लिख सकते हैं या नहीं कि पिया न रहे मन बसिया बजना शुरू हो गया । इस गाने में सेमि क्लासिकल गीत वाले ठाठ हैं । उनकी लिखी कव्वालियां सुनिए । रंगरेज़ मेरे , शहर महबूब है जी और तेज गति खतम कहानी । उर्दू जो एक रुमानियत लाती है, एक वज़न लाती है, वो इनके गानों में दिखता है । और अच्छी बात है कि शब्दों के चुनाव के लिए राजशेखर मशक्क़त करते नहीं जान पड़ते । हिंदी, उर्दू और क्षेत्रीय भाषाओं में जैसी सहज आवाजाही इनकी है वो गाने की रवानी को मजबूत करते हैं । हालाँकि तुकों या शब्दों को ढूंढने के लिए राजशेखर माथापच्ची करते नहीं जान पड़ते हैं , फिर भी दो-तीन शब्द उन्हें कुछ प्रिय मालूम पड़ते हैं , जैसे मशवरा, दफ़ा, सलवट । जो एकाधिक बार इस्तेमाल किए गए हैं। उनके गीतों को सुनिए तो कुछ पंक्तियाँ तो जैसे मुहावरे ही हैं जो गीतों में रचे गए हैं -
कितने दफ़े दिल ने कहा
दिल की सुनी कितने दफ़े
या फिर
मन्नू भइया का करिहैं
बीच का एक दौर ऐसा था जब सारी फिल्में तकरीबन घिसे पिटे ढर्रे पर बन रही थीं और गाने और भी घिसे पिटे । अभी फिर से विविधता है । दूसरी बात यह हुई है कि कहानियाँ छोटे शहरों की तरफ गई हैं । यह गानों को भी एक बंधे बँधाए फ्रेम से बाहर निकाल रहा है । हाल की रिलीज़ फ़िल्मों का ध्यान कर देखिए । लेकिन ऐसे दौर में भी राजशेखर जैसे गीतकार के गाने कम आ रहे हैं तो कुछ तो निर्माता निर्देशकों को भी ध्यान देना चाहिए । और अगर राजशेखर थोड़ा ज्यादा ही फिक्रमंद हैं गानों के स्तर को लेकर तो उनको भी सोचना चाहिए । शैलेन्द्र ने पहले गाने लिखने से राज कपूर को मना कर दिया था । फिर बाद में उन्होंने लिखा । और क्या लिखा यह बताने की जरूरत नहीं । मजरूह साहब भी नई शायरी के प्रतिनिधि शायर थे पर जब फिल्मों के लिए लिखा तो फिल्मो हिसाब से लिखा । साहिर की तो कई नज़्में फिल्मों में इस्तेमाल कर ली गईं , इतना जरूर किया गया कि कुछ कठिन शब्दों को सरल किया गया बिना अर्थ पर प्रभाव डाले । अभी हाल की फ़िल्म उड़ता पंजाब में बटालवी साहब की कविता गाने के तौर पर इस्तेमाल की गई । मसान में दुष्यंत कुमार का एक शेर गाने का मुखड़ा बना । मुक्कबाज़ में भी पहले से लोकप्रिय हिंदी के एक गीत को गाने के रूप में इस्तेमाल किया गया । कहने का तात्पर्य यह कि दर्शक-श्रोता गानों को स्वीकार करते हैं , उनके सामने प्रस्तुत करने की बात है । एक और बात यह भी हुई है कि मेन स्ट्रीम और आर्ट फिल्मों का अंतर खत्म हो गया है । यह फिल्मों को नए प्रयोगों के लिए ज्यादा मौका दे भी रहा है ।
राजशेखर ने शायद जान बूझ कर कम फिल्में की हैं । 2011 में तनु वेड्स मनु जैसी सफल फ़िल्म के बाद और ज्यादा फिल्में करनी चाहिए थीं उन्हें । कलम की रवानी बनी रहनी चाहिए । अभी शुरुआती दौर ही कहा जाए । लेकिन उनकी कलम संभावनाओं से भरी है । और संभावनाएं ज़िम्मेदारी भी डालती हैं । संख्या की भी और गुणवत्ता की भी । यह ध्यान में रखते हुए कि दिए गए संसाधनों,और दी हुई सीमाओं में रहते हुए भी सबसे अच्छा दे पाना ही तो असल चीज़ है । अभी कहीं से भी उनके गानों में कृत्रिमता नहीं झलकती है । तनु वेड्स मनु , दोनों भागों में, तो जैसे गाने घुले हुए हैं कहानी में । इसके लिए फ़िल्म के निर्माता निर्देशक भी बधाई के पात्र हैं । करीब करीब सिंगल में भी, खास कर जाने दे ।
हिंदी फिल्मों के गानों ने कई शब्दों को एक तरह से लोकप्रिय और लकतांत्रिक बनाया है । गुलज़ार साहब ने पंजाबी के शब्दों को इस्तेमाल कर हमारे शब्द भंडार को बढ़ाया ही है । उर्दू के शब्द तो पहले से ही गानों के ज़रिए हम तक पहुँच अपनी पैठ बना चुके हैं ही । अब फिल्में जैसे जैसे छोटे शहरों की ओर जा रही हैं आँचलिक शब्दों के इस्तेमाल किए जाने की संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं । संगीतकारों द्वारा लोकधुनों का इस्तेमाल तो हमेशा से किया गया है । राजशेखर जिस क्षेत्र से आते हैं वहाँ लोकगीतों की बहुत दृढ़ परंपरा है । वो कथाएँ, वो उपमाएं , वो शब्द भंडार फिल्मों में भी आने चाहिए । उनके संरक्षण और गानों के संवर्द्धन के लिए । ऐसा इसलिए भी कि जब व्यस्तता बढ़ती है तो आदमी और उसके काम व विचार के मैकेनिकल हो जाने की आशंका बढ़ जाती है । शायद इसी से बचने के लिए राजशेखर ने उतने गीत नहीं लिखे जितने लिखने चाहिए थे । लेकिन चैलेंज तो यही है । प्रतिभा का निखार और विस्तार भी एक जिम्मेदारी है ।
आज के हिंग्लिश दौर में कोई तो है जो हिंदी, बल्कि हिंदुस्तानी की ज़मीन कस के पकड़े हुआ है । आप राजशेखर के लिखे गानों को सुनिए । कई शब्द, कई मुहावरों की याद ताजा हो जाएगी । एकदम सरलीकरण और फटाक से हिंग्लिश पर उतर जाने वाले दौर में आपको हिंदी, उर्दू के ऐसे शब्द सुनने को मिल जाएंगे जिन्हें आप जानते तो हैं, पर भूल से चले हैं । मसलन लेने के देने, हवाबाज, सौ फीसदी शर्तिया, कासा-ताँबा,कुर्की-जब्ती, पाटों, बिंधा, दर ब दर, नसीहत, मशवरा, दफ़ा, उधड़े,विरह, रिहा, सोलह आना, दालचीनी, कलौंजी, पोस्ता, टॉकीज़, ठोड़ी, ताउम्र,चित भी मेरी पट भी मेरी, माथापच्ची । यह सूची लंबी तो हो गई, पर आपको भी कुछ देर मज़ा देने का लोभ संवरण न हुआ ! उसी तरह इन गीतों में जो उपमाएं हैं वो भी अलग रस देती हैं ।
मुझे याद है जब प्यार हुआ इकरार हुआ गाने में दसों दिशाओं सुना तो अचानक लगा कितनी अच्छी बात सीख ली । दस दिशाएँ । पहले कभी ध्यान गया ही नहीं था । शैलेन्द्र का कमाल कि यह बात कितनी सरलता से एक बढ़ते हुए लड़के को सिखा दी । उसी तरह मजरूह साहब का लिखा गाना ऐ मेरे हमसफ़र सुना तो जाना सदा भी कोई चीज़ होती है । यह उदाहरण इसलिए दिए जा रहे हैं कि इसकी बहुत संभावना है कि राजशेखर के गानों को सुनकर बहुत से लोग ऐसा सोचेंगे । अपने गीतों में वो लिखते हैं तीसों रात , नीम सा कड़वा, लफ़्फ़ाज़ी, सोलह आना - ऐसे और भी कई शब्द जो कम से कम नई पीढ़ी को इन शब्दों से परिचित तो करा देंगे । और जो कुछ थोड़ी पुरानी उम्र के हैं, वो उनके गानों को सुनकर थोड़े नॉस्टैल्जिक हो जाएंगे । पिछले लेख में भी लिखा था कि भाषाएँ ऐसे भी बचती हैं ।
जिस गीतकार ने अभी ज्यादा गाने न लिखें हो उसके गानों में कितनी विविधता ढूंढी जा सकती है ? कव्वाली भी है, पंजाबी भी है, हरयाणवी भी है, हरयाणवी एक्सेंट अंग्रेजी भी है, अंग्रेजी मुखड़े भी हैं । गानों को सुनते वक्त सोच ही रहा था कि राजशेखर साहिर के जैसा मन रे तू काहे न धीर धरे या कुछ ज्यादा हिंदी वाला लिख सकते हैं या नहीं कि पिया न रहे मन बसिया बजना शुरू हो गया । इस गाने में सेमि क्लासिकल गीत वाले ठाठ हैं । उनकी लिखी कव्वालियां सुनिए । रंगरेज़ मेरे , शहर महबूब है जी और तेज गति खतम कहानी । उर्दू जो एक रुमानियत लाती है, एक वज़न लाती है, वो इनके गानों में दिखता है । और अच्छी बात है कि शब्दों के चुनाव के लिए राजशेखर मशक्क़त करते नहीं जान पड़ते । हिंदी, उर्दू और क्षेत्रीय भाषाओं में जैसी सहज आवाजाही इनकी है वो गाने की रवानी को मजबूत करते हैं । हालाँकि तुकों या शब्दों को ढूंढने के लिए राजशेखर माथापच्ची करते नहीं जान पड़ते हैं , फिर भी दो-तीन शब्द उन्हें कुछ प्रिय मालूम पड़ते हैं , जैसे मशवरा, दफ़ा, सलवट । जो एकाधिक बार इस्तेमाल किए गए हैं। उनके गीतों को सुनिए तो कुछ पंक्तियाँ तो जैसे मुहावरे ही हैं जो गीतों में रचे गए हैं -
कितने दफ़े दिल ने कहा
दिल की सुनी कितने दफ़े
या फिर
मन्नू भइया का करिहैं
बीच का एक दौर ऐसा था जब सारी फिल्में तकरीबन घिसे पिटे ढर्रे पर बन रही थीं और गाने और भी घिसे पिटे । अभी फिर से विविधता है । दूसरी बात यह हुई है कि कहानियाँ छोटे शहरों की तरफ गई हैं । यह गानों को भी एक बंधे बँधाए फ्रेम से बाहर निकाल रहा है । हाल की रिलीज़ फ़िल्मों का ध्यान कर देखिए । लेकिन ऐसे दौर में भी राजशेखर जैसे गीतकार के गाने कम आ रहे हैं तो कुछ तो निर्माता निर्देशकों को भी ध्यान देना चाहिए । और अगर राजशेखर थोड़ा ज्यादा ही फिक्रमंद हैं गानों के स्तर को लेकर तो उनको भी सोचना चाहिए । शैलेन्द्र ने पहले गाने लिखने से राज कपूर को मना कर दिया था । फिर बाद में उन्होंने लिखा । और क्या लिखा यह बताने की जरूरत नहीं । मजरूह साहब भी नई शायरी के प्रतिनिधि शायर थे पर जब फिल्मों के लिए लिखा तो फिल्मो हिसाब से लिखा । साहिर की तो कई नज़्में फिल्मों में इस्तेमाल कर ली गईं , इतना जरूर किया गया कि कुछ कठिन शब्दों को सरल किया गया बिना अर्थ पर प्रभाव डाले । अभी हाल की फ़िल्म उड़ता पंजाब में बटालवी साहब की कविता गाने के तौर पर इस्तेमाल की गई । मसान में दुष्यंत कुमार का एक शेर गाने का मुखड़ा बना । मुक्कबाज़ में भी पहले से लोकप्रिय हिंदी के एक गीत को गाने के रूप में इस्तेमाल किया गया । कहने का तात्पर्य यह कि दर्शक-श्रोता गानों को स्वीकार करते हैं , उनके सामने प्रस्तुत करने की बात है । एक और बात यह भी हुई है कि मेन स्ट्रीम और आर्ट फिल्मों का अंतर खत्म हो गया है । यह फिल्मों को नए प्रयोगों के लिए ज्यादा मौका दे भी रहा है ।
राजशेखर ने शायद जान बूझ कर कम फिल्में की हैं । 2011 में तनु वेड्स मनु जैसी सफल फ़िल्म के बाद और ज्यादा फिल्में करनी चाहिए थीं उन्हें । कलम की रवानी बनी रहनी चाहिए । अभी शुरुआती दौर ही कहा जाए । लेकिन उनकी कलम संभावनाओं से भरी है । और संभावनाएं ज़िम्मेदारी भी डालती हैं । संख्या की भी और गुणवत्ता की भी । यह ध्यान में रखते हुए कि दिए गए संसाधनों,और दी हुई सीमाओं में रहते हुए भी सबसे अच्छा दे पाना ही तो असल चीज़ है । अभी कहीं से भी उनके गानों में कृत्रिमता नहीं झलकती है । तनु वेड्स मनु , दोनों भागों में, तो जैसे गाने घुले हुए हैं कहानी में । इसके लिए फ़िल्म के निर्माता निर्देशक भी बधाई के पात्र हैं । करीब करीब सिंगल में भी, खास कर जाने दे ।
हिंदी फिल्मों के गानों ने कई शब्दों को एक तरह से लोकप्रिय और लकतांत्रिक बनाया है । गुलज़ार साहब ने पंजाबी के शब्दों को इस्तेमाल कर हमारे शब्द भंडार को बढ़ाया ही है । उर्दू के शब्द तो पहले से ही गानों के ज़रिए हम तक पहुँच अपनी पैठ बना चुके हैं ही । अब फिल्में जैसे जैसे छोटे शहरों की ओर जा रही हैं आँचलिक शब्दों के इस्तेमाल किए जाने की संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं । संगीतकारों द्वारा लोकधुनों का इस्तेमाल तो हमेशा से किया गया है । राजशेखर जिस क्षेत्र से आते हैं वहाँ लोकगीतों की बहुत दृढ़ परंपरा है । वो कथाएँ, वो उपमाएं , वो शब्द भंडार फिल्मों में भी आने चाहिए । उनके संरक्षण और गानों के संवर्द्धन के लिए । ऐसा इसलिए भी कि जब व्यस्तता बढ़ती है तो आदमी और उसके काम व विचार के मैकेनिकल हो जाने की आशंका बढ़ जाती है । शायद इसी से बचने के लिए राजशेखर ने उतने गीत नहीं लिखे जितने लिखने चाहिए थे । लेकिन चैलेंज तो यही है । प्रतिभा का निखार और विस्तार भी एक जिम्मेदारी है ।