27 मई 2017
जब से पूर्णियाँ तबादले की खबर मिली, तब से औराही हिंगना जाने की बात मन में चक्कर काटने लगी ।औराही हिंगना यानी फणीश्वरनाथ रेणु का गाँव । 16 को पूर्णियाँ पहुँचते ही रेणु की कहानियों का संग्रह मेरी प्रिय कहानियाँ खरीदा। और ज़ाहिर है पहली कहानी पढ़ी गई - मारे गए गुलफ़ाम अर्थात् तीसरी कसम । इंटरनेट थोड़ा बहुत खंगाला गया । दफ्तर में लोगों से दरियाफ़्त की गई । आज संजोग बना और निकल पड़े रेणु के गाँव के दर्शन करने । इतनी जल्दी मचाने का एक कारण पत्नी, नियति कल्प, का राँची से आना भी था शायद , जो हिंदी की सहायक प्रोफेसर हैं । खैर ।
सुबह पूर्णियाँ से रेणुग्राम के लिए रवाना हुए । औराही हिंगना को रेणुग्राम नाम दे दिया गया है । कोई 65-70 किमी का सफर । मौसम भी सहाय था । अररिया के पास टोल गेट से आगे बढ़ने के बाद यह तो अंदाजा था कि हाइवे से बाएँ उतरना है, पर कहाँ से यह अंदाजा नहीं था । सड़क के किनारे मक्का फैलाते हुए एक व्यक्ति से पूछा कि सिमराहा स्टेशन किधर से जाएँगे । थोड़ा और साफ करते हुए पूछा रेणु जी के गाँव किधर से जाएँगे । उसने तुरत रास्ता बता दिया । उसके बाद तो जिस किसी भी , बूढ़े, बच्चे, जवान से पूछा रेणुग्राम का रास्ता किधर है, सब ने बिना देर लगाए बताया ।
हाइवे से उतरते ही रेणु द्वार बना है । रेणुग्राम जाने का प्रवेश द्वार । यों तो रास्ता पक्का ही है, पर सम्भवतः बारिश और देख-रेख की कमी ने हालत बिगाड़ दी है । पर कमोवेश सड़क ठीक है । दोनों तरफ दूर दूर तक फैले हुए खेत । आसमान में छाई हुई घटाओं ने, दूर तक खेतों के विस्तार ने और यहाँ-वहाँ दो-एक सूखे हुए पेड़ों ने ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म का-सा असर पैदा कर दिया । तीसरी कसम टाइप । वैसे फ़िल्म तो अंदर चल रही थी - ठेस, तीसरी कसम, मैला आँचल, पलटू बाबू रोड .....।
पहली बार जाने का मौका था ,तो बार बार पूछ कर कन्फर्म हो रहा था कि सही रास्ते पर हूँ । इतनी दूर आ कर भटक जाना ठीक नहीं । एक किराने की दुकान पर पूछा । बताया बस आगे रेलवे फाटक से उतरते ही बाएँ रास्ता रेणु ग्राम जाता है । रेलवे फाटक बंद था किसी गाड़ी की प्रतीक्षा में ।रुकना पड़ा । बाएँ नजर गई तो स्टेशन का बोर्ड दिखाई पड़ा - सिमराहा । फिर लगा कहीं कोई तार जुड़ गया ।
आगे बढ़ने पर एक मोड़ पर फिर पूछा रेणुग्राम जाना है ।जवाब मिला, आप पहुँच चुके हैं । तो आगे पूछा, रेणु जी के घर जाना है । बताया गया दो कल्वर्ट के बाद पुलिया आएगी , उसके आगे बाएँ । सड़क सीधी रेणु जी के घर तक जाएगी । बीच में जहाँ कहीं भी पूछा , जवाब यही मिला सड़क रेणु जी के घर तक जाएगी ।
आखिर हम पहुंच ही गए । रेणु जी के घर के सामने खड़े । जीवन में पहली बार इतने बड़े लेखक के घर के सामने खड़े होने का सौभाग्य !
सामने एक बड़ा और ऊँचा दुआर या बैठकी । जो अभी खाली पड़ी थी । हम लोग ऊपर चढ़े । रेणु जी और उनकी पत्नी की तस्वीरें टँगी थीं । एक तरफ हाल ही में सम्पन्न हुए लोकरत्न सम्मान-समारोह का बैनर । इस साल यह सम्मान जानेमाने पत्रकार रवीश कुमार को दिया गया है। अप्रैल में रवीश कुमार सम्मान प्राप्त करने गाँव आए थे ।
थोड़ी देर बैठने के बाद भी कोई आया नहीं तो दरवाजे से झांक कर देखा । अंदर एक पक्के का घर जिसमें बरामदे पर एक सज्जन सो रहे थे । मैं तो लौट चलने को उद्यत था;किसी की निजता में हस्तक्षेप करना ठीक नहीं लग रहा था । पर नियति का मन नहीं मान रहा था किसी से बात किए बगैर लौटने को । ज़रा सा सोच-विचार और थोड़ी झिझक के साथ आखिर ग्रिल खटखटा ही दी गई । सोए हुए सज्जन ने आँखें खोलीं । हमने अपना परिचय दिया । उन्होंने बाहर बैठने को कहा । पीछे से निकल कर वो भी आए । परिचय हुआ । वो रेणु जी के बड़े सुपुत्र पद्म पराग वेणु जी थे । उन्होंने रेणु जी के विषय में बताया । बहुत सहजता के साथ उन्होंने बताया कि रेणु जी की तीन शादियाँ थीं । पहली पत्नी से एक संतान । दूसरी, यानी कि उनकी माँ, से तीन बेटे और चार बेटियाँ । तीसरी पत्नी लतिका जी ने निर्णय लिया कि उनकी कोई संतान नहीं होगी ।
रेणु स्मृति भवन जो रास्ते में दिखा था उसके बारे में उन्होंने बताया कि अभी और भी काम होना बाकी है । पूरी तरह तैयार हो जाने पर , रेणु जी पर शोध आदि के लिए उपयोग में आएगा । भवन के आकार को देखते हुए कहा तो जा सकता है कि दिशा तो ठीक है और भगवान करे दशा भी ठीक रहे ।
बातों के सिलसिले के बाद हमने विदा ली । कार तक पहुँचे ही थे कि पीछे से आवाज़ दे कर उन्होंने बुलाया - रेणु जी जहाँ रहते थे, लिखते थे वो जगह तो देख लीजिए । फिर वो हमें पक्के मकान के पीछे ले गए । एक फूस की छत वाला कमरा । उसमें रेणु जी के एक पुत्र का परिवार रहता है । कमरे में दाखिल होते ही रेणु-लतिका जी की तस्वीर है। उसके ऊपर, पहली पत्नी पद्मा जी की । दो-एक पल को उस दृश्य, उस वातावरण को आत्मसात करते हम खड़े रहे ।
फिर हमने विदा ली ।
एक फ्लैश बैक सा चलता रहा । गाँव का विस्तार । आँखों में उतर आने वाली हरियाली जो इस पूरे इलाके की ही खासियत है । एक भीगी हुई -हरियाली । पेड़-पौधे , जन-मवेशी, बोली-आवाज़ें । सबकुछ तो वही जो रेणु की कहानियों-रचनाओं में भरा हुआ है । बल्कि ये कि इलाका ही रेणुमय है ।
लोग पढ़ने वाले, साहित्यिक रुचि वाले हों न हों लेकिन रेणु जी का नाम लेते ही उनका पता बताने को उद्यत । शायद रेणु जी के पात्र ही अभी भी बिखरे पड़े हैं ।
गाँव अभी भी गाँव जैसा ही है । शहर की चिल्ल-पों से दूर , शांत । शुद्ध हवा । कुछ घर पक्के हैं, लेकिन ज्यादातर घर फूस , टीन की छत वाले । यहाँ-वहाँ कुछ दुकानें जरूरत के सामान की । किसी भी गाड़ी के गुजरने पर कौतूहल- भरी नज़रें । रास्ता पूछने पर पूरे डिटेल से बताने की फुर्सत ।
गाँव में बाज़ार उतरा हुआ नहीं दिखा उतना । इक्का-दुक्का दुकानों को छोड़कर । लेकिन गाँव से शहर जाने का सिलसिला तो होगा ही , सुविधाओं की खोज में । सुख तो वैसे भी स्टेट ऑफ माइंड है !
रेणु की रचनाओं में पूरा इलाका फैला हुआ है लेकिन तथ्यों से हूबहू मिलाने की कोशिश करने पर इधर का उधर मिल जाएगा । हालाँकि यह महसूस होता रहता है कि यही है, यहीं है लेकिन ठीक ठीक उँगली नहीं रखी जा सकती । साहित्य शायद जीवन की प्रतीती है । आप समझें, महसूस करें पर पकड़ न पाएँ ।
यही बात साहित्यिक रचनाओं पर बनी फिल्मों के बारे में कही जा सकती है । फ़िल्म लाइन दर लाइन साहित्यिक रचना नहीं हो सकती । लेकिन समग्रता में उस रचना को जीवंत करती है । निर्देशक उन बातों को भी सामने ले आता है जो साहित्यिक रचनाओं में पाठकों के समझने के लिए अनकही छोड़ दी जाती हैं । तीसरी कसम देखें । भारत में किसी साहित्यिक कृति पर बनी और रचना के बिल्कुल करीब एक बेहतरीन फ़िल्म । लेकिन यहाँ भी मारे गए गुलफ़ाम है, पर उससे थोड़ी अलग तीसरी कसम भी है ।
निर्देशक का अपना इंटरप्रेटेशन । या शायद फिल्में ज्यादा सरलीकृत साहित्य होती हैं ।
थोड़ा विषयांतर है, लेकिन यह खयाल कई बार आता है , खासकर तीसरी कसम के ज़िक्र के साथ, कि रेणु जी की कहानी ठेस पर किसी ने फ़िल्म क्यों नहीं बनाई !
रेणु जी का घर देखा तो बिहार के और भी साहित्यकारों के गाँव/घर को देखने की इच्छा जगने लगी है । बल्कि यह खयाल भी कि पर्यटन विभाग धार्मिक स्थलों के लिए तो यात्राएँ कराता है, साहित्यकारों की जन्मस्थली को केंद्र में रखकर ट्रिप क्यों नहीं डिज़ाइन करता ।
रेणु साहित्य को फिर पढ़ने की इच्छा भी । उनकी रचनाएँ अभी भी पनप रही होंगी यहाँ के जन जीवन में । कालजयी रचनाओं की प्रासंगिकता बनी रहती है ।