चित्र : यूट्यूब से साभार
अनिंद्य
ट्रेड मार्क काजल
आँखों की कोरों से उठता
गति भरता
जैसे आँखें हिरण हों
आवाज खनकती
शोख
खुशमिजाजी से भरी-पूरी
मौजूदगी
सन् सत्तासी का
दिन था कोई
कि टीवी के परदे से
निकलकर नीली चाँदनी
छा गई थी
बाग-बगीचों में
पौधों-फूलों पर
नर्म हरी घास पर
होशो-हवास पर
कायम है जादू अब तक
गुनगुनाती हुई है हवा
" वो हैं ज़रा
खफ़ा खफ़ा... "
जीवन के कुछेक क्षण
स्फटिक-निर्मल मन-से
अजस्र स्रोत बन शुभ के
स्मृतियों में बस जाते हैं
पत्थरों से फूटती है नदी
मन पत्थर नहीं होने पाता
कोई अदा, कोई सदा सायरा *
कई-कई लोगों के जीवन में...
पता नहीं कितनों को
दी खुशमिजाजी
कितनी उम्मीदों को बचाया
उल्लास की लौ जुगाई कहाँ-कहाँ
अंदाजा तक नहीं हो शायद
पर सच मानो,
सायरा बानो !
यह बिल्कुल सच है !!
और हाँ,
तुम नहीं आप !
* भ्रमणकारी

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