शनिवार, 26 सितंबर 2026

अनिंद्य


                                                              चित्र : यूट्यूब से साभार

अनिंद्य


ट्रेड मार्क काजल
आँखों की कोरों से उठता
गति भरता
जैसे आँखें हिरण हों

आवाज खनकती
शोख

खुशमिजाजी से भरी-पूरी
मौजूदगी

सन् सत्तासी का
दिन था कोई
कि टीवी के परदे से
निकलकर नीली चाँदनी 
छा गई थी
बाग-बगीचों में
पौधों-फूलों पर
नर्म हरी घास पर
होशो-हवास पर

कायम है जादू अब तक 
गुनगुनाती हुई है हवा 
" वो हैं ज़रा 
खफ़ा खफ़ा... "

जीवन के कुछेक क्षण
स्फटिक-निर्मल मन-से
अजस्र स्रोत बन शुभ के
स्मृतियों में बस जाते हैं
पत्थरों से फूटती है नदी
मन पत्थर नहीं होने पाता
कोई अदा, कोई सदा सायरा *
कई-कई लोगों के जीवन में...

पता नहीं कितनों को
दी खुशमिजाजी
कितनी उम्मीदों को बचाया
उल्लास की लौ जुगाई कहाँ-कहाँ 
अंदाजा तक नहीं हो शायद
पर सच मानो,
सायरा बानो ! 
यह बिल्कुल सच है !!

और हाँ,
तुम नहीं आप !

* भ्रमणकारी 

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