शिष्टाचार
की परिभाषा
हॉल भरा हुआ
था । मंच सजा हुआ था । मंच पर विशिष्टजन आसीन थे । स्वागत आदि की रस्म पूरी कर ली गई
थी । बस अब मुख्य वक्ता को वक्तव्य देना था । उन्हें माइक पर बुलाया गया । भगत जी हाथ
जोड़े माइक तक पहुँचे । बुलाने वाली महिला को हाथ जोड़ आँखों-आँखों धन्यवाद कहा । उपस्थित
दर्शकों की ओर देखा, मंचासीन जनों की ओर देखा और आवाज को धीर-गंभीर बनाते
हुए नमस्कार कहा । भगत जी ने अपना व्याख्यान शुरू किया –
आज का विषय है ‘शिष्टाचार की परिभाषा’ । यह तो आप जानते ही होंगे, दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं , शिष्ट, अशिष्ट और जो ये दोनों नहीं हैं, बच गए वे अपशिष्ट । यह कहने के साथ ही भगत जी के होठों पर मुस्कुराहट तैर गई । लेकिन लोगों तक बात शायद पहुँची नहीं । प्रतिक्रिया से ऐसा पता चलता था । एक जुमला अपशिष्ट हो गया ! भगत जी ने कहना जारी रखा – जीवन में शिष्ट, श्लील और सभ्य बने रहना बहुत जरूरी है । अब जैसे देखिए, मुझे वक्ता के रूप में बुलाया गया, तो शिष्टता का तकाजा है कि कोई रिसीव करने आए, मंच पर उपस्थित विशिष्ट लोगों से परिचय करवाए और यथोचित स्वागत-सत्कार किया जाए । आप देखिए , जो शिष्ट होगा, वही विशिष्ट हो पाएगा । विशिष्ट होना इस देश में कितनी विशेष बात है, आपको तो पता ही होगा । वीआइपी, वीवीआइपी । जानते तो हैं ही आप, रोज तो देखंते हैं हम उनके जलवे । शिष्ट मंडल ही तो जाया करता है विचारों के आदान-प्रदान हेतु !
यह शिष्टता का व्यापार आखिर शुरू कब हुआ होगा ? शिष्ट शब्द तो न जाने कितना पुराना है ! मैं समझता हूँ शिष्टता का जन्म तभी संभव हुआ होगा जब दो से ज्यादा लोगों को आपस में एक दूसरे से जरूरत पड़ी होगी । सिर्फ दो लोग हों, तो विकल्प ही क्या बचता है, सिवा एक दूसरे को स्वीकार करने के । तो यह तय हुआ कि शिष्टता अकेले या दुकेले की चीज नहीं है । आपके मन में यदि चल रहा हो कि दो व्यक्ति भी तो आपस में शिष्ट-अशिष्ट व्यवहार रख सकते हैं । आप ध्यान दीजिए, भले ही मौका-ए-वारदात पर सिर्फ दो लोग ही हों, हमारे और आपके जैसे बहुत सारे लोग उत्सुक श्रोता-दर्शक के रूप में विद्यमान हैं – यत्र-तत्र-सर्वत्र ।
अच्छा, शिष्ट कहेंगे किसे ? आप तो जानते ही हैं , जीवन के हर क्षेत्र में सापेक्षता का सिद्धान्त लागू हो जाता है । मूल रूप से तो भले व्यवहार को शिष्टता कहेंगे । मेरे एक भाई साहब थे, जो अपने पिताजी के सामने चाय नहीं पी सकते थे । वह अशिष्टता हो जाती । आज मेरा बेटा है, मेरे कंधे पर अपनी बाँहें डाल कर कहता है – “जरा घूमा-फिरा भी कीजिए, सिर्फ चाय मत पीजिए ।”
शिष्टता का भी इवॉल्यूशन हुआ है । गैरजरूरी चीजें हटती गई हैं, नई-नई जमाने के अनुकूल चीजें जुड़ती गई हैं । पहले की फिल्में अगर याद हों, तो उनमें दोस्ती एक ‘वर्च्यू’ हुआ करती थी । वही जाँ निसार कर देने की बातें, ‘मेरी जीत, तेरी जीत/ तेरी हार, मेरी हार’ वाली बातें, तू तड़ाक का बातचीत का लहजा । और अब अपने जीवन को देखिए, कितना अदबो-लिहाज़ घुस गया है दोस्तों के बीच ! पहले के कलीग भी दोस्तनुमा हुआ करते थे । अब तो शिष्टाचार का जमाना है ! दफ्तरों का पदानुक्रम मेलों-ठेलों,खेल-वेल, भोज-भात तक घुस जा रहा है, वह भी सकल समाज-समेत यानी कि फुल बेंच, यानी कि एमबीबीएस !
आपने मेंहदी
हसन साहब का गाया यह शेर तो सुना ही होगा –
प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ़ मिट गए
आप से फिर तुम हुए फिर तू का उनवाँ हो
गए
अब तो यह शेर भी स्वत:परिवर्तित हो गया –
दोस्तों के कद बढ़े दरम्यां तकल्लुफ़ आ गए
तुम जो थे, गुम हुए, सब आप खामखाँ हो गए
शिष्टता की डिग्री होती है, दिशा होती है । शिष्टता हमेशा नीचे से ऊपर की ओर गमन करती है । बढ़ के हाथ मिलाना है, सिर्फ मुंडी हिला भर देना है, या उतना भी नहीं करना है – इसकी डिग्री भी बहुत सारे चर मानों पर निर्भर करती है । अचर या परम् तो वैसे भी कुछ नहीं होता ।
आपने यह कहावत तो सुनी ही होगी –
आप करें तो शिष्टाचार, हम करें तो भ्रष्टाचार
दरअसल, इस कहावत को उलटी तरफ से समझने की कोशिश कीजिए । या इसको इस तरह से समझने की कोशिश कीजिए कि आपके लिए करें तो भ्रष्टाचार, अपने लिए करें तो शिष्ट आचार यानी केवल अपना अधिकार ।
शिष्टाचार के बहुत सारे किस्से हैं । कुछ खास-खास रिश्तों/मौकों के शिष्ट आचार देखिए –
बॉस का शिष्ट आचार – अधीनस्थ के निवेदन के विपरीत काम करे, लेकिन अधीनस्थ को लगे कि उसे ईनाम मिला है !
आलोचक/बड़े लेखक का शिष्ट आचार छोटे लेखक के प्रति – कम-से-कम सौ-दो सौ मनुहारों के बाद प्रशंसानुमा एक शब्द बोलना और जरा-सा मुंडी डुलाना !
बड़े लेखक/ ढीठ लेखक का शिष्ट आचार परिचित पाठकों के प्रति – अपने लेखन की बमबारी करते रहना । सामने वाला कभी तो थक कर तारीफ कर देगा । यदि सामने वाले ने यह भी लिखा कि “ क्या लिखा है?” तो इस बात को इस तरह प्रकाशित कर देना – “ क्या लिखा है !”
भार्या का भरतार के प्रति – तेरा सबकुछ मेरा, मेरा तो है ही मेरा !
पिता का बच्चों के प्रति – “ हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल कर, रखना मेरे बच्चो इसको संभाल कर ।”
बच्चों का माता-पिता के प्रति – “ हमको मालूम है जन्नत की हकीकत ...”
सूची तो लंबी है, पर आपकी सेहत का भी खयाल है मुझे ।
ऐसी सभाओं में शिष्टता की जो सबसे विशिष्ट बात होती है , वह यह कि हर वक्ता अपने अलावा किसी और को नहीं सुनता, बस प्रशंसा में मुस्कुराता रहता है । हाँ, संचालक को इतना शिष्ट बना रहना पड़ता है कि सबको सुने, और क्रमानुसार बुला ले । मुख्य वक्ता कुछ ऊँचा-नीचा बोल भी जाए तो लोग कुछ प्रतिक्रिया नहीं देते । प्रतिक्रिया नहीं देने से सबका समय बच जाता है । कभी-कभी क्या होता है, कि आयोजक जो संयोगवश सभा का अध्यक्ष भी हो, उसे अपनी विशिष्टता का विशेष भान हो जाता है । वह आदरणीय अतिथि वक्ता की बेतुकी बात ( हालाँकि सापेक्षता के हिसाब से अतिथि वक्ता के लिए वह बात एकदम तुक में होती है) बर्दाश्त नहीं कर पाता । अपनी गली का शेर गरज उठता है । थोड़ी देर तक गरजता रह जाता है । अब शिष्टता की कमान अतिथि वक्ता के हाथों आ जाती है । उसकी शिष्टता बिना कुछ कहे निकल जाने में होती है । सभा में उपस्थित बाकी लोगों की शिष्टता भी चुपचाप बैठे रहने में है । मौके पर चुप रहना कुछ लोगों के लिए शिष्टता की निशानी होती है । महाभारत की एक सभा में भी तो सब चुप बैठे रह गए थे !
भगत जी कुछ और कहते इससे पहले दर्शकों में से किसी ने पूछा – ये सारी बातें आपके व्यक्तिगत अनुभव से निकली हैं? और आप किस तरह के शिष्ट व्यक्ति हैं ?
भगत जी ने हँस कर बात टाली – अब शिष्टता इसी में है कि मैं आप सब से विदा ले लूँ । मेरे बाद मंच पर उपस्थित इस कार्यक्रम के आयोजक और अध्यक्ष महोदय को भी वक्तव्य देना है । उम्मीद है मेरी बातें उन्हें शिष्ट ही लगी होंगी । आप सबने इतना समय दिया, इसके लिए धन्यवाद ।
***
शाम में होटल के कमरे में भगत जी और बुतरू ।
बुतरू – मंच पर अध्यक्ष बैठा हो, और आप किसी अध्यक्ष को शिष्टता का पाठ पढ़ाने लगे ! यह तो अच्छा हुआ कि मैं भीड़ में बैठा था । आप पर सवाल दाग कर बात को मोड़ दिया मैंने ।
भगत जी – कभी-कभी रिस्क ले लेना चाहिए । भाई, शिष्टता का पाठ ही तो पढ़ा रहा था ।
बुतरू – कभी-कभी शिष्टता की परिभाषा से शिष्टता की समस्या उठ खड़ी होती है ।
भगत जी – अब शिष्टता यही होगी कि शिष्टता के साथ इस विशिष्ट होटल का विशिष्ट भोजन कर लिया जाए।

भाई चेतन का लिखा हुआ भगत बुतरू संवाद मुझे हमेशा से ही आकर्षित करता है। इसकी एक-एक कड़ी अपने आप में एक अनमोल रचना है, जिसमें शब्दों का ऐसा जाल बुना गया है कि लगता है जैसे हर शब्द अपने पूरे अर्थ को उजागर कर रहा हो। उनकी लेखनी में एक अद्भुत क्षमता है जो पाठकों को अपने साथ जोड़ लेती है.
जवाब देंहटाएंपूर्ण सत्य : सहमत हूँ
हटाएंशिष्टाचार भी