शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

घर की बातें

 

 

घर की बातें 

घर

घर हर लेता है

सब पीड़ा, दुख-तकलीफ;

जहाँ रहते हैं पिता,माँ

 

दीवारें तक बन जाती हैं

सुरक्षा कवच

और लड़े-थके, अस्त-पस्त मन

पहुँच कर हो जाते हैं महफूज,

निश्‍चिंत

 

नींद खुद-ब-खुद समय पर खुलती है

हवा महसूस होती है ताजा-ताजा

धूप भी लगती है खूब उजली,

गरमाहट से भरपूर, पुर-सुकून

और चाँद, रात में बरसाता है नेह

 

घर, घर होता है भाई

वो जहाँ आपका बचपन भटकता है

वो जहाँ कोई सिर पर हाथ रखता है।

 

घर की याद

यूँ फ्लैट भी घर है,लेकिन एक कमरा

थोड़ा ज़्यादा घर-घर लगता है

 

कमरे में है पलंग का एक जोड़ा

जिस पर बिछे हैं गद्दे, मोटे-मोटे

जिनमें भरी हुई है रूई ठसाठस

जिसके जरिए कभी याद आ जाती है धुनिया की

और धुनकी के टंकार की

 

एक तरफ रखे हैं लोहे के दो बक्से

एक के ऊपर एक

जिनको ढँक दिया गया है एक पुरानी-सी चादर से

 

उसी पलंग पर बैठे

दिख जाती है कभी,बाहर खिड़की से,

सामने की दीवार पर उतरती हुई

शाम की पीली-पीली धूप

और मन पहुँच जाता है बरसों पीछे खेल के मैदान में

डूबते सूरज से समय का अंदाजा लगाते

 

कमरे में ही है एक पुरानी तस्वीर,

स्टील के फ्रेम में ब्लैक एण्ड व्हाइट

मैं बैठा हूँ पिता की गोद में,

और माँ भी है, भैया भी, बहन भी

इसी तस्वीर ने वजन बढ़ा दिया है कमरे का

 

घर-गाँव जो होता है

वो तो पिता का होता है।

 

कसक

खिड़की के ठीक बीच

सिन्‍दूरी बिन्‍दी-सा सूरज

टिका है फुनगी पर नीम की

 

दो छोरों से होती है

कोयलों की बातचीत

 

अलग-अलग चिड़ियों का

फैलता है मिश्रित संगीत

 

हवा में घुल जाता है

मन

भावातीत

 

आ गई है याद

गाँव की

घर की

उस दुआर की

जो अब नहीं रहेगा  !  

 

ताकीद

अभी कल घर ने कहा

घर पर भी रहा करो कभी

पता तो चले

कहाँ क्या जरूरत है

 

माना, दुनिया सराय है

पर ऐसी भी क्या जल्दी है

कहाँ की भागदौड़ है ?

काहे की हाय-हाय है !

 

ग्लानि

कहते हैं तीनों गाँवों में

सबसे अच्छा था दुआर

 

चढ़ती सीढ़ियाँ और फिर

उतरती

अंदर की ओर

 

दरवाजे के ठीक ऊपर

घड़ी बड़ी-सी

रखी हुई कुछ कुर्सियाँ

काठ की,कभी-कभी

एक चौकी भी

 

एक तस्वीर बाबा

और छोटे बाबा की

सीढ़ियों पर बैठे

 

एक तस्वीर

बाबा-मामा की

 

एक तस्वीर पापा की

उनके बचपन के दिनों की

 

कुछ वैसी ही

गुस्से वाली , मेरी भी

किसी दूसरी जगह

 

और अब फिर

उसी गुस्से वाली तस्वीरें

बेटों की

 

हाल की एक सेल्फी

चाचा के साथ

घर के दुआर पर

 

आप घर में

नहीं रहते हैं

घर

आप में रहता है

 

अब जब

घर नहीं रहेगा

लगता है, मैं

किसी को

बचा नहीं पाया ! 

खुद भी कहाँ बचा मैं

कौन बच सका है

बोलो तो इस जहाँ में

सब मन का मामला है

मिट्‍टी है कैसी मन की...


 

पुनर्नवा

बागीचे में घर के

फूल बेगनबेलिया का

खिला...

 

खिलता हुआ वहीं

मन मिला

 

घर तो समझते हैं न ?!

 

वो नहीं

जिसे आपने बनाया है

बल्कि वो

जिसने

आपको बनाया है !!

 

जहाँ लौट कर

मन जाता है बार-बार !!           

 

स्थायी पता

ग्राम वलिपुर

पोस्ट जमालपुर

जिला मुंगेर

आठ

एक

एक

दो

एक

चार

जीवन का कितना भी

हो जाए फैलाव

कितना भी विस्तार ....

 

वो कुएँ का पानी

आबो-हवा,पूरब रुख का दुआर

साथ-साथ चलता है

चेतन-अवचेतन में

झलक जाता है मुझमें

रंग-रूप,चाल-ढाल

आचार-विचार-व्यवहार

मेरे पुरखों का

यदा-कदा

 

रहूँ कहीं भी

जबकि,अब कहीं का भी नहीं

पूछे जाने पर कहीं

“कहाँ के हो?”

उत्तर एक यही –

ग्राम वलिपुर

पोस्ट जमालपुर

जिला मुंगेर ! 

 

जीवन-सफर

सारा सफर

जिन्‍दगी का

घर पहुँचने तक का है

 

घर कहाँ है !

घर कहाँ है !!

घर कहाँ है !!!

 

 

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

फिर कही बात ...४

 

फिर कही बात ...४


गलत समय पर सही काम करते हो

बहुत  अपने   को   बदनाम करते हो 


तुम्हारी मुहब्बत का यकीन क्यों हो 

तुम  तो  सबको   सलाम  करते  हो 


आने वाली है इधर बहार मियाँ 

अब देखें क्या इंतजाम करते हो 


दूध  की मक्खी   हो  फेंक देंगे  वो 

बढ़-बढ़ के सबसे कलाम करते हो 


कि कोई भी होता   ऊब ही  जाता

 एक ही बात सुबह-शाम करते हो 


तुम्हारी न तन्हाई है,  तुम   भुगतो

 क्या सबका जीना हराम करते हो


शनिवार, 26 सितंबर 2026

अनिंद्य


                                                              चित्र : यूट्यूब से साभार

अनिंद्य


ट्रेड मार्क काजल
आँखों की कोरों से उठता
गति भरता
जैसे आँखें हिरण हों

आवाज खनकती
शोख

खुशमिजाजी से भरी-पूरी
मौजूदगी

सन् सत्तासी का
दिन था कोई
कि टीवी के परदे से
निकलकर नीली चाँदनी 
छा गई थी
बाग-बगीचों में
पौधों-फूलों पर
नर्म हरी घास पर
होशो-हवास पर

कायम है जादू अब तक 
गुनगुनाती हुई है हवा 
" वो हैं ज़रा 
खफ़ा खफ़ा... "

जीवन के कुछेक क्षण
स्फटिक-निर्मल मन-से
अजस्र स्रोत बन शुभ के
स्मृतियों में बस जाते हैं
पत्थरों से फूटती है नदी
मन पत्थर नहीं होने पाता
कोई अदा, कोई सदा सायरा *
कई-कई लोगों के जीवन में...

पता नहीं कितनों को
दी खुशमिजाजी
कितनी उम्मीदों को बचाया
उल्लास की लौ जुगाई कहाँ-कहाँ 
अंदाजा तक नहीं हो शायद
पर सच मानो,
सायरा बानो ! 
यह बिल्कुल सच है !!

और हाँ,
तुम नहीं आप !

* भ्रमणकारी 

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

ऐसा लगता है आँगन में चाँद-तारे उतरते हैं


                                                                                                    चित्र : गिरीन्‍द्रनाथ झा            


ऐसा लगता है आँगन में चाँद-तारे उतरते हैं

 

कुछ दिन पहले गिरीन्‍द्र जी ( गिरीन्‍द्रनाथ झा) ने हरसिंगार के एक फूल का चित्र पोस्ट किया था । यहाँ गली के मोड़ पर सुबह-सुबह हरसिंगार के फूल बिछे दिख जाते हैं । यदि आपने हरसिंगार के फूलों को देखा है तो उनकी सुन्‍दरता, सुगन्‍ध और स्निगधता से प्रभावित हुए बिना नहीं रहे होंगे । झर कर भी हरसिंगार हमारे जीवन को सुंदरता से भर देते हैं । मन को हल्का कर देते हैं हरसिंगार । कभी-कभी कोई कविता या गीत मन पर ऐसा ही प्रभाव डाल जाते हैं , हरसिंगार-सा । एक गीत की ये पंक्तियाँ देखिए –

                        आजकल ऐसा लगता है

                        थोड़ा ज्यादा सँवरते हैं

                        ऐसा लगता है आँगन में

                        चाँद तारे उतरते हैं

 

यह गीत 2022 की फिल्म नज़र अंदाज का है । संगीत विशाल मिश्रा । गीत के दो वर्जन हैं,  गायक  हैं जुबिन नौटियाल और परम्परा टण्डन । गीतकार हैं राज शेखर ।

 

गीत की इन पंक्तियों कों पढ़ कर या सुन कर मन की आनन्‍दमग्न अवस्था का सहज अंदाजा हो जाता है । बल्कि सुनने वाला खुद उस अवस्था में पहुँच जाता है । राज शेखर के गीतों को सुनते समय बार-बार उनके शब्दों के चयन या वाक्यों के गढ़न पर ध्यान जाता है । फिलहाल बात इस गाने की । ऊपर की पंक्तियाँ गीत के लड़की वाले वर्जन की हैं । दोनों वर्जन के पहले अन्‍तरे अलग हैं, बाद के अन्‍तरे एक हैं । पुरुष स्वर में गाए हुए वर्जन का पहला अन्‍तरा ऐसा है –

                        एक आधी कहानी थी

                        जो मिल के सुनानी थी

                        हमें मिलना था फुर्सत में

                        हसरत ये पुरानी थी

 

 

जीवन में सबसे जरूरी बात जीवन को यथारूप स्वीकार कर लेना है । इसका यह अर्थ नहीं कि प्रयास करना छोड़ देना चाहिए । “ जो मिल के सुनानी थी” इसी प्रयास को इंगित करता है । लेकिन जब हम जीवन को सहज रूप में स्वीकार कर पाते हैं , ‘हृदय की मुक्तावस्था’ भी हमें सहज प्राप्त हो जाती है  -- “ ऐसा लगता है आँगन में चाँद तारे उतरते हैं”।

            जिसे हम दुनिया कहते हैं, वह किसी भी व्यक्ति के लिए अपने आप में पूर्ण नहीं होती । दरअसल, एक दुनिया के अन्‍दर कई सारी आधी-अधूरी दुनियाँ हैं । हर व्यक्ति अपने भीतर अपनी अधूरी इच्छाओं-आकांक्षाओं, ख्वाहिशों की दुनिया लिए फिरता है । वह लाख प्रयास कर ले, अन्‍तत: उसे अपने इस अधूरेपन को स्वीकार कर ही लेना पड़ता है । इस स्वीकार के बाद  “मन की दराजों में अधलिखे कितने खत” उसे परेशान नहीं करते , हमसफर बन जाते हैं । साहिर ने कहा था “ वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन” । साहिर के इस गीत में एक कचोट, एक निराशा और एक गुस्से का पुट है । शायद यहाँ स्वीकार कर पाना सम्‍भव नहीं हो पा रहा । राज शेखर के इस गीत की पंक्तियों में स्वीकार है –

                        फिर मिलेंगे हम पहले-से

                        बात ये ना ज़रूरी है

                        आधे-आधे रहें हम, पर

                        ना कहानी अधूरी है

 

यह अन्‍तरा दोनों वर्जन में है । यानी स्त्री-पुरुष दोनों की ओर से स्थिति का स्वीकार है । बल्कि यह किन्हीं भी दो व्यक्तियों के बीच आ जाने वाले अंतराल का स्वीकार है । जीवन रुकता नहीं, चलता जाता है ।

राज शेखर के गीतों में जीवन के स्वीकार का भाव खास है । शायद इसीलिए प्रेम की अनुभूतियों के विभिन्न रंग उनके गीतों में बिखरे हुए हैं । प्रेम स्वीकार करने का मामला होता है, प्रश्न और प्रतिकार का नहीं । उनके गीतों में प्रेम की बातें लीक पकड़ कर नहीं, लीक छोड़ कर चलती हैं । ‘बम्फाड़’ फिल्म का एक गीत है ‘मुनासिब है इश्क का हो जाना’ । उसकी इन पंक्तियों को देखिए –

            तू मुझे जो आँख-आँख भर के देखे

            सब सही लगे

            मिला तू लगा ये हाय

            मुनासिब है इश्क का हो जाना

 

‘तनु वेड्‍स मनु रिटर्न्स’ का गीत “तुम्हीं से एक बार फिर से” भी लीक पकड़ कर नहीं चलता –

 

                        हो गया है प्यार तुमसे

                        तुम्हीं से एक बार फिर से

                        बोलो अब क्या करें

                        ...

                        दिल रूई का रेशा

                        तू हवा जैसा

                        तेरी तरफ ही उड़े

 

बहुत साधारण-से शब्दों के प्रयोग से भी राज शेखर बातों मे असर पैदा कर लेते हैं । ‘ आँख-आँख भर के देखे’, ‘मुनासिब है’ , ‘ थोड़ा ज्यादा सँवरते हैं’ , ‘मन की दराजों’ , ‘यादों की शाखों पे दर्द के कितने गुल खिले’ – ऐसे ही कई प्रयोग उनके गीतों में दिख जाते हैं ।

            फिल्मी गीत किसी एक व्यक्ति के प्रयास से तैयार नहीं होते । संगीतकार, गायक, निर्माता-निर्देशक का भी बराबरी का ही योगदान रहता है । इन सबके बीच, सारी बातों को साधते हुए गीतकार अपने मन की बात भी धीरे से अपने गातों में उतार देता है । इसी में उसका कमाल है । साहिर, शैलेन्‍द्र, महजरूह, शकील बदायूँनी, गुलज़ार , राजेन्द्र कृष्ण, भरत व्यास, इंदीवर, अनजान, योगेश,आनद बख्शी, अमिताभ भट्टाचार्य, कौसर मुनीर जैसे अनेक अच्छे गीतकारों ने हिंदी फिल्मों और हमारे जीवन को समृद्ध किया है । उनके गीतों को सुनिए तो उनकी छाप उनके गीतों पर दिख जाएगी। राज शेखर के गीतों को सुनकर भी उनमें ‘राज शेखर टच’ को पहचाना जा सकता है । हिन्‍दी फिल्मी गीत हमारे जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं । जीवन के हर मौके के लिए हम अपने हिसाब से गीत ढूँढ़ लेते हैं । दुख में सांत्वना और धीरज का तो खुशी में उल्लास और सेलिब्रेशन का सामान बन जाते हैं गाने । फिल्मी गीतों के असर को हम सभी जानते हैं, पर पूरी तरह संभवत: स्वीकरते नहीं । हिन्‍दी फिल्मी गीतों का साहित्यिक मूल्यांकन किया जाना भी अभी बाकी है । यह शायद ‘गुड़ खाए, गुलगुले से परहेज’ वाली स्थिति है । दूसरी तरफ यह भी हो रहा है कि फिल्मों में गीतों के लिए जगह कम होती जा रही है , जबकि हिन्‍दी फिल्में अपने गीतों के लिए जानी और मानी जाती रही हैं ।  ज्यादातर गीत अब बैकग्राउण्ड में चलते हैं , पर्दे पर उसे गाने वाले नहीं होते । जिगर मुरादाबादी का शेर याद आता है —

 

                        वही है ज़िंदगी लेकिन ‘जिगर’ ये हाल है अपना

                        कि  जैसे  ज़िंदगी से ज़िंदगी  कम होती जाती है

 

            राज शेखर के गीतों का जितना प्रचार-प्रसार होना चाहिए था, उतना हुआ नहीं है । बहुत से गीत तो एल्बम के रूप में रिलीज ही नहीं हुए । वेब-सीरिज के लिए लिखे गए कई गीत भी सुनने वालों तक ढंग से पहुँच नहीं पाते । इसमें राज शेखर के स्वभाव का भी हाथ है संभवत: । पिछले करीब पन्द्रह वर्षों से वे गीत लिख रहे हैं, और अच्छे गीत लिखने के बावजूद गीतों की संख्या शायद ही सौ तक पहुँची हो । मजाज़ का एक शेर है –

                        कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी

                        कुछ मुझे भी ख़राब होना था

 

उनका ‘मजनू का टीला’ (गीतों और कविताओं की प्रस्तुति का कार्यक्रम) भी स्थगित है इन दिनों । राज शेखर के जीवन का एक नया साल शुरू होने का दिन है । गीतों का हरसिंगार झरता रहे , उनके आँगन में चाँद-तारे उतरते रहें !

गीत के दोनों वर्जन सुनने के लिए लिंक :- 

https://youtu.be/NAyKCiMcT9w?si=vrFxiy2RnaCo_ibr

https://youtu.be/UQR1ZruioCk?si=mNf4yAZ2pvCvJASN