गुरुवार, 18 मार्च 2021

कुली लाइन्‍स

 



कुली लाइन्‍स : डॉ प्रवीण कुमार झा

 

कहते हैं हर किताब को पढ़ने का एक वक्‍त होता है । और यह किताब ही तय करती है कि आप उसे कब पढ़ेंगे । ‘ कुली लाइन्‍स’ – इस किताब के नाम, उसके कवर, उस पर पढ़ी हुई टिप्पणियों ने किताब को पढ़ने की इच्छा पैदा कर दी और जनवरी 2020 में किताब मँगा भी ली गई । लेकिन पढ़ी गई अब यानी मार्च 2021 में । आलस और धीरज हर जगह काम करते हैं – लिखने में भी, पढ़ने में भी !

करीब दो सौ सालों की कथा कहती किताब । कथा ही, इतिहास नहीं । जो बातें कही गई हैं, उनको आज के समय में सच मान लेना बड़ा मुश्किल- सा लगता है । ऐसा भी होता होगा ?

दूसरे यह किताब किसी इतिहासकार द्वारा नहीं लिखी गई है , इस कारण इतिहास पढ़ने की ‘ टेक्स्टबुकीय’ नीरसता से आप बचे रहते हैं ।

पाठक को जो चीज प्रथमदृष्‍टया खींचती है , वो क्या है ?

किताब का नाम – ‘ कुली लाइन्‍स’ , जो अपने आप में एक इतिहास समेटे हुए है पर किसी आधुनिक उपन्यास के शीर्षक-सा प्रभाव पैदा करता है । ‘कुली लाइन्‍स’ पढ़ते हुए एक ऐसा ही शब्द मन में उभरता है – ‘सिविल लाइन्‍स’ । ‘कुली लाइन्‍स’ , गाथा गिरमिटियों की । तो क्या उनके लिए हमारे यहाँ ‘सिविल लाइन्‍स’ और हमारे लिए उनके यहाँ ‘कुली लाइन्‍स’?

फिर कवर का डिज़ाइन – ‘हैंड मेड’ पेपर का आभास देता कवर । एक उतने ही भावपूर्ण चित्र के साथ ।

किताब का आकार – 270 पृष्‍ठ ( परिशिष्‍ट छोड़कर) जो पाठक के धीरज पर बोझ नहीं डालते ।

 लेखक , डॉ प्रवीण कुमार झा, आपको ले कर चलते हैं कई-कई देशों- द्वीपों की यात्राओं पर । आज जो ‘इंडियन डायस्पोरा’ एक चमक-दमक की छवि देता है उससे एकदम अलग ।

किताब की भूमिका में लेखक ने लिखा है –“ मैंने उत्तर कम ढूँढे हैं, प्रश्‍न अधिक” । इस किताब के कथा-प्रवाह में बहते हुए पाठक के मन में भी प्रश्‍न उठते चलते हैं । कई बार तो आज की परिस्थितियों से तुलना करते हुए पाठक सोचने लगता है – स्थितियाँ जस की तस ही हैं ।

 

इतने लंबे काल-खण्ड और इतने सारे देशों में मजदूरों को ले जाने से जुड़े तथ्यों को ढूँढना एक श्रम-साध्य काम रहा होगा। फिर उन सबको कथा के रूप में पिरोना तो और भी । कथा कहने का ढंग इतना सजीव है कि पाठक खुद को उन पात्रों- परिस्थितियों में पाने लगता है । बीच-बीच में लेखक के ‘प्रश्‍न’ भी हैं जो इस तादत्म्य को और भी बढ़ा देते हैं, मसलन, “आखिर कैसे कष्‍ट रहे होंगे जिन्हें पढ़कर ही मृत्यु हो जाय?”   लेखक की भाषा और शैली ऐसी है मानो वह इन सारी यात्राओं का साक्षी रहा है ।

अभी हाल में ‘विश्‍व महिला दिवस’ गुजरा है । इस किताब को पढ़ते समय एक बात जो बार-बार आपको सोचने को मजबूर करती है वह है स्त्रियों की दशा । और फिर आप सोचने लगते हैं कि आखिर बदला क्या है ? सिर्फ तारीख ! क्या स्त्रियाँ आज भी, अपने देश में ही, ‘गिरमिटिया’ ही हैं ? सारी तरक्की के बावजूद । लेखक ने कहा ही है “ प्रश्‍न अधिक ढूँढे हैं” । लेखक का विचार सामने आता है “ विवाहित महिला क्यों घर से भागी , इसके तमाम कारण हो सकते हैं । वे कारण आज भी कमोबेश हैं” ।

एक और बात को यह बात रेखांकित करती है कि जहाज पर चढ़ने के पहले ही जहाजियों की जाति छूट जाती थी । जाति का आग्रह साथ चलता नहीं था । शायद एकजुट होकर सहने और लड़ने के लिए जातियों की आवश्यकता ही नहीं । और धर्म की भी । एक ही परिवार में अलग-अलग धर्म को मानने वाले लोग भी हो सकते हैं ।   

इस किताब को पढ़ते हुए एक और बात पर ध्यान जाता है । सबसे ज्यादा मजदूरों की खेप बिहार और उत्तर प्रदेश के इलाकों से गई । वहीं गुजरात से लोग व्यापार करने के लिए गए, उस समय भी । क्या बिहार और उत्तर प्रदेश के पिछ्ड़े होने के कारण बहुत पुराने हैं ? क्या वर्तमान में बिहार से देश के दूसरे हिस्सों में मजदूरों के पलायन के बीज तभी के पड़े हैं ?

अलग-अलग देशों में, अलग-अलग परिस्थितियों में लोगों द्वारा अपनी भाषा और सँस्कृति को ज़िंदा रखने के प्रयास जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं । क्या इन्हीं बातों से सीखकर हम अपनी बोलियों के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए कुछ ज्यादा काम नहीं कर सकते ?  

किताब बहुत सारे अनकहे प्रश्‍न भी करती है ।

हिंदी में कथेतर लेखन थोड़ा कम हुआ है । हालाँकि इधर के कुछ सालों में चलन बढ़ा है । इस तरह के विषय पर यह एक जरूरी किताब है । बौद्धिकता का ह्ल्ला न मचाते हुए यह किताब हमें अपने एक ऐसे इतिहास से वाकिफ कराती है जिस पर कम लिखा गया है । लेखक ने इतिहास की बातों को , जहाँ तथ्यों की प्रस्तुति एकरसता पैदा कर सकती है,  हमारे लिए सहज-सुगम कथा-कहानी वाली भाषा में रखा है , उसके लिए वे बधाई और धन्यवाद के पात्र हैं । ऐसी किताबों से हिंदी के पाठक बढेंगे, ऐसा विश्‍वास है ।

 

बुधवार, 27 जनवरी 2021

 सूर्य

उत्तरायण

खुलते जाड़े के बंधन

प्रकृति का नियम है 

ऋतुओं का परिवर्तन


यति-गति 

जीवन की भी यही है -

परिवर्तन

परिवर्तन !

शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

द्वारा / विविध भारती

 द्वारा / विविध भारती 



आवाज़ की

दुनिया के

दो दीवाने

जिनकी आवाज़ के

हैं दीवाने कितने

न जाने

 

ये

शोरोगुल

भागमभाग

गलाकाट की दुनिया

दस बजे रात के

जैसे, ख़ासकर,

स्थिर हो जाती है

सफ़े खुल जाते हैं

ज़िन्दगी के...

 

खिल उठती हैं

हसरतें कितनी

जाग उठते हैं

फ़साने कितने

न जाने

 

गो

सामने नहीं

न आसपास

मगर

समाई है

ज़िन्दगी में छाई है

उपस्थिति

जैसे

जल उठे

अगरबत्ती कहीं

किसी मोड़ पर

महक उठे

रात की रानी जैसे !

 

एक सखी - एक दोस्त

कितनों के लिए

माने कितने

न जाने !   

रविवार, 27 सितंबर 2020

मेरे एस पी बालासुब्रमण्यम

 मेरे एस पी बालासुब्रमण्यम

 

“ रफ़ी साहब के गाने को आप आँखें बंद कर के सुनिए... पूरी परिस्थितियाँ, पूरा माहौल , पूरी भावनाएँ आपके सामने उपस्थित हो जाती हैं, आप उनको महसूस कर सकते हैं”- रफ़ी साहब के बारे में बोलते हुए किसी टीवी शो में एस पी बालासुब्रमण्यम ने कुछ ऐसा ही कहा था । उनके चले जाने के बाद मैं एस पी बी की यही बात उनके बारे में सोच रहा हूँ । वे अपने गायन की बदौलत मेरे और मेरे जैसे कितनों के व्यक्तित्व में रच-बस गए हैं ।

       25 सितंबर के दिन में एस पी बालासुब्रमण्यम के निधन की खबर आई । हालाँकि उनकी तबीयत बहुत खराब चल रही थी, पर इस खबर का इंतज़ार कोई नहीं करता । थोडी देर के लिए करता हुआ काम छूट गया । यू ट्यूब ने गानों को कभी भी सुनने-देखने की सुविधा दे दी है । यू ट्यूब पर गाना सर्च किया – ‘ तूने साथी पाया अपना जग में इस जग में” । अप्पू राजा के इस गाने को जाने कितनी बार सुना होगा । दर्द पर इस गाने ने कितनी बार मरहम रखा होगा । गाने अपने मूल अभिप्राय से निकल कर हर तरफ फैल जाते हैं । दूसरा गाना सुना –‘ हम न समझे थे बात इतनी सी / ख्वाब शीशे के दुनिया पत्थर की’ । वह दौर था जब कुछ बनने की उम्मीद लिए कुछ न कर पाने, कुछ न हो पाने की बेचैनी मन में चक्कर काटने लगी थी । और वह बेचैनी बनी रहती है, और ज़ेहन में यह गाना भी ।  तीसरा गाना – ‘सच मेरे यार है, बस वही प्यार है’ फिल्म सागर से । कुछ-कुछ ‘तूने साथी पाया अपना’ जैसा ही ।  DDLJ और ‘मैंने प्यार किया’ के पहले के दौर का सिनेमा, जब प्यार का मतलब सह जाना भी था । ये तीनों गाने repeat पर डाल कर सुने । आँख भीगी-सी लगी । शायद कुछ कमज़ोर हो जाने का अहसास ! लेकिन ये गाने तो रहेंगे न !

          अब सोचता हूँ तो लगता है उनका पहला गाना जिसने अपनी ओर खींचा था , वह था –‘ बेखुदी का बड़ा सहारा है, वरना दुनिया में कौन हमारा है’ । फिल्म ‘एक ही भूल’ । इसके अलावा ‘ एक दूजे के लिए’ के गाने तो थे ही । उसमें भी ‘ हम तुम दोनों जब मिल जाएँगे /एक नया इतिहास बनाएँगे” । बिनाका गीत-माला में बहुत बार सुना हुआ ‘रास्ते प्यार के’ फिल्म का गाना ‘ ये वक़्त न खो जाए’ भी ।  

      क्या है एस पी बालासुब्रमण्यम में जो अपनी ओर खींचे रहता है ?  रफ़ी साहब की वही खासियत जिसके बारे में एस पी बी  चर्चा करते थे । इसके अलावा मुझे लगता है एस पी बालासुब्रमण्यम में यह खासियत है कि वे आपके अंदर उतर जाते हैं, आप में समा जाते हैं । वे आपके साथ-साथ चलते हैं । दर्द आपका होता है पर गाते वे हैं । मुझ जैसे हिंदी मीडियम बिहारी लड़के के लिए, जो सिर्फ़ सोचता ही था कि “ हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं”, एस पी बालासुब्रमण्यम ने पूछा भी और हाल सुनाया भी । उनके गायन में कुछ तो है जो दर्द को बयां भी करता है और उससे उबरने की ताकत भी देता है । उसमें डुबाए नहीं रखता है ।

       ‘मैंने प्यार किया’ से सलमान खान को आवाज़ मिली, पर उसके पहले मेरे लिए वे कमल हासन की आवाज़ बन चुके थे । कमल हासन गाएँ तो उन्हीं-जैसा गाएँगे । अप्पू राजा का ‘ राजा नाम मेरा’ गाना सुन कर देखिए । कुछ वैसा ही कि राज कपूर गाते तो मुकेश के जैसा ही गाते । ‘दीवाना’ के आखिरी सीन में राज कपूर दो लाइनें गुनगुनाते हैं “ सब ठाठ धरा रह जावेगा / जब लाद चलेगा बनजारा” ।  

       रफ़ी साहब के जन्मदिन के अवसर पर जुलाई में जारी किए वीडियो में वे रफ़ी साहब के बारे में कहते हैं “ He is like a flower. I would say he is, not was.” यही बात उनके खुद के लिए भी कितनी सही है !! 

मंगलवार, 22 सितंबर 2020

राज शेखर होने के मायने

  
(चित्र : सौजन्य - गिरींद्रनाथ झा )







   

राज शेखर होने के मायने

  

बरसों पहले कोसी की एक कथा पर एक फिल्म बनी थी । नाम तो आप जानते ही होंगे – तीसरी कसम । इस फिल्म में एक गीत था –‘ पान खाए सैंया हमारो’ । इस गाने में दो लाइनें कुछ ऐसी थीं –

 

      हमने मँगाई सुरमेदानी , ले आया ज़ालिम बनारस का ज़र्दा

      अपनी ही दुनिया में खोया रहे वो, हमरे दिल की न पूछे बेदरदा

 

आज एक गीत सुन रहा था तो बरबस यह गीत याद आ गया । गाना है 2019 में आई फिल्म ‘साँड की आँख’ का । झुन्ना, झुन्ना, झुन्ना । इस गाने की एक लाइन है – “ सैंया बेदरदा फूँके है ज़र्दा” । आप बताइए कि बेदरदा और ज़र्दा शब्द हिंदी फिल्म के किस गाने में आपने सुना है, कम से कम इधर के 20-25 बरसों में ? आप सवाल पूछ सकते हैं कि ये शब्द क्यों याद रखे जाने चाहिए ? वाजिब सवाल है । अच्छा यह बताइए कि कातिक, अगहन, फागुन जेठ, काँसा, पीतल, सिलवट, रूई, रेशा, अरदास, मच्छरदानी, गाँव-जवारी, सदाबहार, चमकदार, उजला, हुक्का, गुड़गुड़, बुलबुला, माथापच्ची,जुगनू, रफ़ा-दफ़ा, बवंडर, गँड़ासा, टिमटिम – ऐसे शब्द याद रखे जाने चाहिए या नहीं ? जब सारी दुनिया ‘ ओ या’, ‘ आइ नो’, ‘यू नो’ में लगी हुई है तब ऐसे शब्द क्यों याद रखे जाने चाहिए ?

 

      हम देखें तो सँस्कृति के निर्वहन और निरंतरता में हमारी भाषा का बहुत बड़ा योगदान होता है । और सरकारी या किताबी भाषा नहीं बल्कि लोक की भाषा । ऊपर जो शब्द उदाहरण के तौर पर रखे गए हैं, आप ग़ौर करेंगे तो पाएँगे कि ये लोक से उठाए हुए शब्द हैं । हम अगर अपनी भाषा, अपने शब्दों से दूर होते जाएँगे तो हम धीरे-धीरे अपनी सँस्कृति से भी दूर होते जाएँगे । हमें अपनी भाषा का सम्मान करना ही होगा, उसे बचा कर रखना ही होगा ।  ‘तीसरी कसम’ के गीत को लिखा था शैलेन्‍द्र ने और ‘साँड की आँख’ के गीत को लिखा है राज शेखर ने । वही राज शेखर जो कोसी के हैं, मधेपुरा के हैं । वही राज शेखर जिनका आज जन्मदिन है । 

 

      बकौल राज शेखर वो एक ‘एक्सीडेंटल’ गीतकार हैं । उस ‘एक्सीडेंट’ के भी दस वर्ष पूरे हो चले हैं । उनके लिखे गीतों की सूची देखें तो कुल जमा चालीस- इकतालीस गीत हैं , यानी कि साल के तकरीबन चार गीत । आज के इस ‘ जो दिखता है वो बिकता है’ के दौर में यह सूची काफी छोटी लगती है । लेकिन बावजूद इसके वे बराबर फिल्मों में बने हुए हैं । उनके गीत पसंद किए जा रहे हैं – जनता के द्वारा भी और फिल्म-वाले लोगों के द्वारा भी । उनके द्वारा लिखे गए पहले गीत ‘ ऐ रंगरेज़ मेरे’ ने ही अपार सफलता का स्वाद चखा दिया । अमूमन ऐसा होता नहीं है । फिल्म थी ‘तनु वेड्‍स मनु’ । इस फिल्म में उनके लिखे सारे गीत एक से बढ़कर एक । साल था 2011 । एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया है कि ‘ऐ रंगरेज़ मेरे’ और ‘ मन्नू भैया का करिहैं’ एक ही दिन बल्कि एक ही बैठक में लिखे गए गीत हैं । अगर आपने दोनों गाने सुने हैं तो राज शेखर की ‘रेंज’ पर विस्मित हुए बिना नहीं रह पाए होंगे ।  उसके बाद 2013 में एक गाना आता है फिल्म ‘इसक़’ में – ‘ एन्ने-ओन्ने’ । होली का मस्ती भरा गाना । इस गाने को देखें तो इसमें गीतकार द्वारा होली के नाम पर छूट लेने की पूरी संभावना थी , पर उसको जिस नज़ाकत से वो संभाल ले गए हैं वह देखिए – “ तुझे सिलवट-सिलवट चख लें /हम पारा- पारा पिघलें” । गुलज़ार राज शेखर के पसंदीदा गीतकार हैं, मालूम नहीं उन्होंने यह गीत सुना है कि नहीं ? ‘इसक’ के बाद 2105 में ‘तनु वेड्‍स मनु रिटर्न्‍स’ । इस फिल्म का एक गीत, जो शायद उतना चर्चित नहीं हुआ, - “हो गया है प्यार तुमसे / तुम्हीं से एक बार फिर से” । प्यार की एक नई व्याख्या । और इतनी मखमली! 2016 में आई ‘ क्यूट कमीना’ । इसके गानों की भी चर्चा उतनी नहीं हुई । भोपाल शहर पर लिखी गई कव्वाली भोपाल शहर के किरदार को आँखों के सामने रख देती है । ‘ सिंगल चल रिया हूँ’ गीत में एक पंक्ति है ‘ मालवा के आसमाँ पे / किसने की फुलकारियाँ ये’ । किसी जगह , किसी प्रदेश को इतने रोमांटिक रूप में गाने में शामिल कर लेना गाने में एक अलग कशिश पैदा कर देता है । कशिश तो इसी फिल्म के एक और गीत ‘ शाम होते ही’ में यह लाइन भी पैदा करती है – ‘ नीले सैटिन में लिपटा ये शहर / चमके जुगनू-सा’ । ‘  तनु वेड्‍स मनु रिटर्न्‍स’ का एक गीत ‘ ओ साथी मेरे’ , उसके गायक सोनू निगम को हद से ज्यादा पसंद है । 2017 में एक फिल्म आई थी ‘ फ्रेंडशिप अनलिमिटेड’ इसमें भी सोनू निगम का गाया , राज शेखर का लिखा एक गीत है – ‘ तेरे बिन ओ यारा’ । यह गीत भी ‘ ओ साथी मेरे’ की टक्कर का ही है । इसी साल एक फिल्म आई ‘ करीब करीब सिंगल’ । इसमें राज शेखर के दो गीत थे । ‘ जाने दे’ जो लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया, और उतरा ही नहीं । पर इसी फिल्म का एक दूसरा गीत ‘ खतम कहानी’ एक अलग ही चोखे रंग का गीत है ।  2018 में एक छोटी-सी फिल्म आई ‘ मेरी निम्मो’ । यह उस समय भी ओ.टी.टी पर ही रिलीज़ हुई थी । इस फिल्म में तीन गीत । एक गीत की कुछ लाइनें देखिए – “ आते-जाते पल से न जी लगाओ...क्या ये भी बीत जाएगा / हाँ ये भी बीत जाएगा” । यह गीत अंग्रेज़ी की एक कविता “ This, too, shall pass away”  ( Paul Hamilton Hayne) की बरबस ही याद दिलाता है जैसे शैलेन्‍द्र का लिखा गीत “ हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं” , “ Our sweetest songs are those that tell of saddest thought” ( P.B. Shelley)  कविता की  । शैलेन्‍द्र भी राज शेखर के पसंदीदा गीतकार हैं ।

  

      2018 में तीन फिल्में और चार गीत और आए । ‘हिचकी’ में ‘ खोल दे पर’ और ‘मैडम जी गो ईज़ी’, ‘वीरे दी वेडिंग’ में ‘आ जाओ ना’ और ‘तुम्बाड’ का टाइटिल सॉन्‍ग । ‘ तुम्बाड’ का गीत जरूर सुना जाना चाहिए । इसमें शब्दों से जो ध्वनियाँ उत्पन्न की गई हैं  वो एक दूसरे ही लोक में ले जाती हैं । ऐसा कर पाना भी संभवत: राज शेखर के बस का ही था । 2019 में तीन फिल्में । ‘उरी’ , ‘जबरिया जोड़ी’ और ‘ साँड की आँख’ । ‘उरी’ के गीत ‘बह चला’ की यह लाइन देखिए –“ छोटी-सी ज़िद होगी, लंबी-सी रातें /फिर भी प्यार रह जाएगा” । यह पंक्ति चमत्कृत कर देती है । ‘जबरिया जोड़ी’ के ‘ मच्छरदानी’ में एक तरफ तो मच्छरदानी शब्द का इस्तेमाल होता है तो दूसरी तरफ ‘क्वीन, स्वीटी, पासवर्ड’ जैसे शब्द । यानी कि शब्द सहज रूप से ही चले आते हैं गीतों में बेखटके, बिना किसी को खटके । ‘ साँड की आँख’ पूरा एल्बम ही खास है । गीतों की विविधता के कारण और आशा भोंसले के गाए गीत ‘ आसमाँ’ के कारण । इस गीत के बारे में आशा जी ने किसी साक्षात्कार में कहा है कि ऐसे गाने अब बनते नहीं हैं । 2020 में फिर से एक बार ‘बम्फाड़’ सिनेमाघरों में न रिलीज़ हो कर ओ.टी.टी पर हुई , हालाँकि तब तक देश में लॉकडाउन भी लग गया था । मालूम नहीं इस फिल्म के गानों का एल्बम क्यों नहीं रिलीज़ किया गया है अब तक । यू ट्यूब पर बिखरे हुए इसके गानों को सुनिए , या फिर फिल्म देख कर सुनिए । ‘बम्फाड़’ के गीतों की कुछ पंक्तियाँ – “ ऐसे तो कोई खास बात है नहीं / तू है तो ज़िंदगी ये कीमती लगे” , “ ज़िक्र गुलाबी तेरा जितना है / उतना ही मैं भी गुलाबी अब हो रहा” , “ मैं मुंतज़िर नहीं / पर इंतज़ार-सा” या फिर “ जीभ है गँड़ासा इनकी” । एक तरफ नर्मो-नाज़ुक इश्क की बातें तो दूसरी तरफ गँड़ासा – उतनी ही सहजता से । ओ.टी.टी पर ही रिलीज़ हुई ‘ रात अकेली है’ में राज शेखर का एक गीत है ‘ आधे-आधे-से हम’ । इस गीत को सुनिए और सोचिए कि कविता और क्या होती है ? राज शेखर ने एक ‘शॉर्ट फिल्म’ ‘द गाइड’ के लिए भी एक गीत लिखा है , उसका भी उल्लेख जरुरी है । 2016 में आई इस ‘शॉर्ट फिल्म’ के गीत की कुछ पंक्तियाँ – “ अगहन, फागुन , तुमसे ही जेठ” , या फिर “ बँध गए हैं मौसमों के / सारे ही अब छोर तुमसे” – क्या यह कविता नहीं है ?

 

      राज शेखर के गीतों में उनका लोक उनके साथ चलता है । लोक जहाँ पर वे रमते हैं, लोक जहाँ से वे आते हैं । बिहार के , खास कर मिथिला/कोसी क्षेत्र के शब्दों को वे अपने गीतों में बड़ी सहजता से ले आते हैं । खिसियाना, धकधकाना, हकबकाना – जैसे शब्द मुख्य धारा की हिंदी फिल्मों में आ रहे हैं और स्वीकार किए जा रहे हैं । इसका कुछ श्रेय राज शेखर को भी जरूर जाता है । अंग्रेज़ी और पंजाबी शब्दों को हम पहले ही हिंदी फिल्मों के गीत में स्वीकार कर चुके हैं । राज शेखर ने संख्या की दृष्‍टि से कम ही गीत लिखे हैं । यह दो बातों को इंगित करता है – एक कि राज शेखर हड़बड़ी में नहीं हैं दूसरे उनके काम की गुणवत्ता लोगों को उनसे बाँधे रखी है । अब जबकि फिल्मों में एक तरह से गानों की जगह कम होती जा रही है, राज शेखर के गीतों का आते रहना और भी जरुरी है ।

 

शैलेन्‍द्र ने अपने आत्म-परिचय में लिखा था –“ फिल्म-गीत लिखना अधिकतर बहुत आसान समझा जाता है । सीधे-सादे शब्द , घिसी-पिटी तुकें, कहा जाता है कि फिल्म-गीत और है क्या ?  मेरा अनुभव कुछ और है । फिल्म-गीत-रचना मेरी समझ से एक विशेष कला है” । शैलेन्‍द्र पर चर्चा करते हुए डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने लिखा है – “ मेरी बड़ी इच्छा है कि शैलेन्‍द्र के गीतों की साहित्यिक व्याख्या की जाए । ... यदि शैलेन्‍द्र के गीतों को समुचित ढंग से व्याख्यायित किया जाता तो यह दुरवस्था फिल्मों भी नहीं आई होती” ।

 

हालाँकि यह कहना अभी शायद जल्दी होगा, लेकिन जिस तरह से वे चल रहे हैं, शैलेन्‍द्र और डॉ, बुद्धिनाथ मिश्र , दोनों, की बात भविष्य में राज शेखर पर भी लागू होगी ।

 

राज शेखर खूब लिखें, खूब अच्छा लिखें ।   

 

शनिवार, 5 सितंबर 2020

हिरना भागल जा ता हो
कस्तूरी मिलते नइखे

केतनो जोर लगाव हो
बोझवा त हिलते नइखे

कइसन तोर निसाना हो
गोटिया त पिलते नइखे

खाली सुतले-सुतला हो
घसवो ले छिलते नइखे

पनिया केतना डलब हो
फुलवा सन खिलते नइखे

घाव दरद बड़ देता हो
कोनो ऊ सिलते नइखे

सोमवार, 31 अगस्त 2020

सूरज डूबा...

चित्र : साभार - चिन्मयानंद


सोना पिघला
नभ जल में घुला
धरा अपरा

।।।

सूरज डूबा
पिघल गया नभ
धरती स्तब्ध 

।।।।

नभ का दुख
धरती स्याही-सोख
संध्या क्लान्त-सी 

।।।

अस्त-व्यस्त-सा
आकाश, धरा चुप
मन उन्मन 

।।।

बेचैन नभ
धरती स्थित-प्रज्ञ
मौन दर्शन 

।।।

आकाश बेबस-बेचैन
धरती निश्चल-निष्चेष्ट
सूरज चला गया है, तो
उदास-सी है शाम...